देष में लालबत्ती कल्चर को समाप्त करना मोदी सरकार का साहसिक कदम है। बुधवार को भारत सरकार ने ऐलान किया कि पहली मई से केन्द्र का कोई भी मंत्री, नेता और आला अधिकारी लालबत्ती इस्तेमाल नहीं करेगा। इतना ही नहीं मोदी सरकार ने कानून की किताब (मोटर व्हीक्ल एक्ट) में लालबत्ती के प्रावधान को ही हटाने का निश्चय किया है। यानी “न रहेगा बांस, न बजेगी बांसुरी“। एबुलेंस, फायर ब्रिगेड और पुलिस की गाडी पर नीली बत्ती लगाना जारी रहेगा। लालबत्ती “ वीआईपी“ कल्चर का प्रतीक है और लोकतंत्र में जनता जर्नादन ही “वीआईपी“ मानी जाती है। जनसेवक (पब्लिक सर्वेंट) जनता से ऊपर खुद को वीआईपी माने, यह लोकतंत्र का घोर अपमान है। प्रधानमंत्री ने खुद माना है कि “सभी भारतीय खास हैं, और सभी भारतीय वीआईपी हैं“। सुप्रीम कोर्ट भी कह चुका है कि लालबत्ती का इस्तेमाल गलत है और देश में जनता ही वीआईपी है। केन्द्र से एक माह पहले पंजाब में अमरेन्द्र सिंह सरकार भी वीआईपी कल्चर की प्रतीक “लालबत्ती“ को समाप्त कर चुकी है। अब केन्द्र की देखादेखी उतराखंड सरकार ने भी लालबत्ती कल्चर को समाप्त करने का ऐलान किया है। राज्य के मुख्यमंत्री त्रिवेन्द्र सिंह रावत ने टिवटर पर लालबत्ती बगैर अपनी गाडी की तस्वीर पोस्ट भी की है। महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेन्द्र फडनवीस ने भी सोशल मीडिया पर लालबत्ती लगाए बगैर अपनी गाडी पोस्ट की है। दोनों राज्यों की तरह भाजपा-शासित अन्य राज्य भी वही करेंगे जो केन्द्र सरकार करेगी। लालबत्ती फिरंगी मानसिकता का प्रतीक भी है। फिरंगी सरकार भारतीयों को गुलाम मानते थे और इसीलिए अपनी गाडियों पर लालबत्ती लगाकर अपने वीआईपी स्टेटस को बघारते थे। दुर्भाग्यवश, आजादी के बाद स्वदेशी नेताओं को यही वीआईपी कल्चर खूब भाया और अदने से लेकर बड़े नेता तक सभी खुद को वीआईपी बताने में कोई कसर नहीं छोडते। देश ने लगभग सात दशक तक ब्रिटिशकालीन वीआईपी कल्चर झेला है। देश को आजाद कराने का श्रेय लेने वाली कांग्रेस सरकार ने आज तक इस वीआईपी कल्चर को तिलांजलि नहीं दी। केद्र सरकार के साथ-साथ पंजाब की कांग्रेस सरकार बधाई की पात्र है कि सात दशक से देश जिस “घमंडी“ और राजसी कल्चर की पीडा झेल रहा था, अततः उससे निजात मिली है। मगर सवाल यह है कि क्या “ लालबत्ती” का चलन खत्म कर देने भर से वीआईपी कल्चर समाप्त हो जाएगा। विदेशों में राष्ट्रपति से लेकर मंत्री, सांसद तक सभी आम आदमी की तरह काम करते हैं। कुछ दिन पहले सोशल मीडिया पर एक तस्वीर वायरल हुई थी, जिसमें रुस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन को अपनी गाडी में स्वचालित पेट्रोल पंप खुद फ्यूल भरते हुए दिखाया गया था। कुछ साल पहले इग्लैंड के प्रधानमंत्री के वाहन द्वारा टेªफिक नियमों का उल्लघंन करने पर पुलिस ने चालान काट दिया था। भारत में भी कभी ऐसा हो सकता है, आज के हालत में इसकी कल्पना तक नहीं की जा सकती। देश के नेता कितने घमंडी और वीआईपी कल्चर प्रेमी हैं, इसके प्रमाण आए दिन मिलते रहते हैं। हाल ही में शिवसेना के सांसद रवीन्द्र गायकवाड ने एयर इंडिया के कर्मचारी को चप्प्पलों से पीटा था और इस पर इस एयरलाइंस ने आरोपी को अपनी फलाइट्स से ही बैन कर दिया था। इस घटना के एक दिन बाद तेलंगाना के एक वरिष्ठ कांग्रेस नेता विधानसभा परिसर में पुलिस से ही उलझ पडे जबकि बह अपनी डयूटी निभा रहा था। टोल नाकाओं पर नेताओं द्वारा कर्मचारियों से बदसलूकी करना आम बात है। समस्या देश के नेताओं की ”राजसी” मानसिकता है। संसद अथवा विधानसभा का सदस्य चुने जाते ही वे ”जनप्रतिनिधि“ से “ वीवीआईपी“ बन जाते हैं। इस बात के दृष्टिगत जनता पूछ सकती है कि अगर हम वीआईपी है, ओ फिर हमें भी एयरपोर्ट पर कतार से निजात मिलनी चाहिए। अस्पताल में वीआईपी ट्रीटमेंट और सरकारी दफ्तरों में बेरोकटोक प्रवेश मिलना चाहिए। टवीटर पर किसी ने प्रतिकिरया व्यक्त की है “मोदी जी बस से दफ्तर आएं तो मानें।
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