शुक्रवार, 7 अप्रैल 2017

दलाई लामा से क्यों डरता है चीन?

 81 साल के  तिब्बती आध्यात्मिक नेता दलाई लामा की अरुणाचल प्रदेश  यात्रा पर ड्रैगन लाल-पीला हो रहा है? दलाई लामा इन दिनों अरुणाचल प्रदेश  की यात्रा पर हैं। चीन पूर्वोतर भारत के इस राज्य को विवादास्पद मानता है और इसी बिला पर चीन को तिब्बती नेता की यात्रा पर सख्त ऐतराज है। मगर हकीकत यह भी है कि  दलाई लामा कहीं भी चले जाएं, चीन के कान खडे हो जाते हैं। वे जिस देश  की यात्रा पर जाते हैं, चीन फौरन अपनी आपत्ति जता देता है। दलाई लामा को पूरी दुनिया में “शांति  दूत“ माना जाता है और वे जहां भी जाते है, शांति  का ही संदेश  देते हैं। उनकी न तो चीनी नेताओं जैसी उपनिवेशवादी महत्वाकांक्षाएं हैं और न ही तिब्बती आध्यात्मिक नेता काइयां कूटनीतिज्ञ हैं। फिर भी चीन इस वयोवृद्ध नेता  से हमेशा  चिढा रहता है। 2010 में जब दलाई लामा अमेरिकी यात्रा पर गए थे, तब भी चीन ने अपनी कडी आपत्ति जताई थी मगर तत्कालीन  राष्ट्रपति  बराक ओबामा ने इस विरोध के बावजूद दलाई लामा से मुलाकात की थी। चीन के डर से ही श्री लंका ने दलाई लामा को वीजा देने से इंकार कर दिया था। 2016 में दलाई लामा की मंगोलिया यात्रा पर भी चीन खासा लाल-पीला हुआ था और  चीन ने इस मुल्क के खिलाफ आर्थिक प्रतिबंध तक लगाए थे। यह जानते हुए भी कि दलाई लामा की अरुणाचल प्रदेश  यात्रा, भारत का आंतरिक मामला है, चीन ने भारत को धमकी दी है कि इस यात्रा से बींजिग और भारत के संबंधों में खासा तनाव आया है। यही बात चीन ने दलाई लामा की अमेरिकी यात्रा के दौरान भी कही थी और हर उस देश  से कहता है, जहां भी तिब्बती आध्यात्मिक गुरु जाते हैं।  दलाई लामा से चीन आखिर क्यों इतना डरा हुआ रहता है? तिब्बत में बौद्ध धर्म का इतिहास काफी पुराना है। 1409 में बौद्ध धर्म  के प्रचार के लिए जेलग स्कूल की स्थापना के बाद से बौद्ध और तिब्बतियों के बीच लडाई जारी रही है। 1609 में तिब्बत के एकीकरण के बाद यह लडाई बंद हुई और तिब्बत पूरी दुनिया में सांस्कृतिक सपन्न क्षेत्र के रुप में उभरा। 13वें दलाई लामा ने 1912 में तिब्बत को स्वतंत्र  घोषित  कर दिया। चीन इसे पचा नहीं पाया और चालीस साल बाद चीन ने तिब्बत पर तब आक्रमण किया जब 14वें दलाई लामा के चुनने की प्रकिया चल रही थी। तिब्बत को इस आक्रमण में हार का सामना करना पडा। कुछ सालों बाद तिब्बतियों ने चीन के खिलाफ बगावत का बिगुल बजाया पर वे इसमें सफल नहीं हुए। 1959 में दलाई लामा चीन के चंगुल से बचने के लिए अपने समर्थकों समेत भारत की शरण में आ गए और तब से हिमाचल प्रदेश  के धर्मशाला स्थित मुख्यालय में रह रहे हैं। छह दशक से भी अधिक समय से भारत समेत दुनिया के अलग-अलग मुल्कों में निर्वासित रहने के बावजूद तिब्बतियों की स्वायत राज्य की मांग और चीन के उपनिवेशवाद से आजादी का संकल्प टस-से-मस नहीं हुआ है। अलबत्ता इस दौरान तिब्बतियों का संकल्प  और प्रखर हुआ है। चीन इसके लिए दलाई लामा को जिम्मेदार मानता है और वह तिब्बतियों के धार्मिक गुरु को अलगाववादी भी बताता है।  चीन को यही डर सता रहा है।  दलाई लामा तिब्ब्तियों के ही नहीं दुनिया में  शान्ति  के प्रहरी और धार्मिक स्वत्रंतता के प्रेरणा स्त्रोत हैं। चीन बेशक दुनिया की बडी शक्ति हो और अपनी आर्थिक और सैन्य ताकत से वह  विश्व को  डराता-फिरता है मगर वह स्वंय दलाई लामा और तिब्बतियों की दृढ इच्छा शक्ति से डरता है। इतिहास इस बात का गवाह है कि दमन से आजादी के परवानों को दबाया नहीं जा सकता। दलाई लामा की अरुणाचल प्रदेश  की यात्रा के विरोध की पृष्ठभमि  में भी चीन की यही मानसिकता काम कर रही है।