बुधवार, 12 अप्रैल 2017

जम्मू -कश्मीर मेँ अविश्वास का पहाड

गत रविवार को श्रीनगर में उप-चुनाव के दौरान हुई हिंसा साफ-साफ बता रही है कि  कश्मीर  में हालात दिन-ब-दिन बिगडते जा रहे हैं। श्रीनगर लोकसभा सीट के लिए कराए गए मतदान में मात्र सात फीसदी वोटिंग हुई। यह कश्मीर में  अब तक का सबसे कम मतदान है। चुनावी हिंसा में 8 लोग मारे गए और 200 से अधिक घायल हो गए। बुधवार को घाटी के अनंतनाग लोकसभाई सीट के लिए मतदान होना था । हिंसा के  चलते  मतदान स्थगित  करना पड़ा  इस सीट पर मुख्यमंत्री महबूबा मुफती के भाई तस्दुक मुफ्ती सतारूढ दल  पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी (पीडीपी) के उम्मीदवार हैं और उन्होंने निर्वाचन आयोग से इस उपचुनाव को स्थगित करने की मांग की थी  । तस्दुक मुफ्ती  अब यह आरोप भी लगा रहे हैं कि उनकी पार्टी मौजूदा हालात में उप-चुनाव के पक्ष में नहीं थी और निर्वाचन आयोग को इस बारे आगाह भी किया गया था। इसके बावजूद   कश्मीर घाटी में उप-चुनाव कराए गए। महबूबा मुफ्ती के मुख्यमंत्री बनने के बाद अनंतनाग सीरा ट खाली हुई है। श्रीनगर सीट पीडीपी के सांसद तारिक कारा द्धारा  इस्तीफे देने के बाद  खाली हुई थी। अनंतनाग लोकसभाई सीट में अनंतनाग के अलावा पुलवामा, कुलगाम और शोपियां जिले पडते हैं और चारों ही हिंसा से पीडित हैं। ताजा हालात में लगता नहीं है कि बुधवार को अनंतनाग में  मई  मेँ  भी मतदान मुमकिन हो पाएगा। वैसे भी, सात फीसदी मतदान से चुना गया नुमाइंदा लोकतंत्र का मजाक लगेगा। लोकतंत्र में बंदूक के साए में चुनाव कराने का कोई औचित्य नहीं है। कश्मीर  में अलगाववादियों ने श्रीनगर और अनंतनाग उपचुनावों के बायकाट  का आहवान कर रखा है। माना जा रहा है कि इसी वजह श्रीनगर सीट के उपचुनाव में मतदान फीका रहा है। कश्मीर  में अलगाववादी चुनावों का बराबर बहिष्कार  करते रहे हैं मगर इसके बावजूद राज्य में कभी भी इतना कम मतदान नहीं हुआ। 2014 में कराए गए विधानसभा चुनाव में अलगाववादियों के चुनाव बहिष्कार  की धमकी के बावजूद औसतन 65.23 फीसदी मतदान हुआ था। इतना ही नहीं तब पहले चरण में  71.28 फीसदी, दूसरे चरण में 71 फीसदी और अंतिम चरण में रिकार्डतोड 76 फीसदी मतदान हुआ था। और यही बात नई दिल्ली के लिए सबसे ज्यादा खाए  जा रही है। ताजा मतदान के आंकडे स्पष्ट  संदेश  दे रहे हैं कि अढाई साल से भी कम समय में कश्मीर  की अवाम का लोकतंत्र से विश्वास  उठ चुका है और इसके लिए केन्द्र के अलावा राज्य में सत्तारूढ पीडीपी-भाजपा सरकार पूरी तरह से जिम्मेदार है। विधानसभा चुनाव में कश्मीर  घाटी से भाजपा  एक भी सीट नहीं जीत पाई थी और घाटी की अधिकांश  सीटों पर पार्टी के उम्मीदवारों की जमानत तक जब्त हो गई थी। इसके बावजूद पीडीपी का भाजपा के साथ मिलकर सरकार बनाई  जो कश्मीर  की अवाम को नागवार गुजरा। अवाम का मानना है कि पीडीपी ने भाजपा से गठबंधन करके जनता से धोखा किया है। इसी कारण कश्मीर  की अवाम  राष्ट्रीय   मुख्यधारा से विफरी हुई है। न तो राज्य सरकार और न ही केन्द्र सरकार कश्मीरी  अवाम की आकांक्षाओं पर खरी उतर पाई है। लोकतंत्र में अगर जनता की चुनी हुई सरकार उनके सपनों और अपेक्षाओं को समय पर पूरा नहीं कर पाती है, तो अवाम का हताश  होना स्वभाविक है। कश्मीर  की जनता को यह बात भी नागवारा गुजरी है कि अब तक केन्द्र में जो भी सरकार आई, उसने  कश्मीर  किसी-न-किसी तरह की पहल की मगर मोदी सरकार अढाई साल बीत जाने पर भी कोई कदम नहीं उठा पाई है। इससे कश्मीर  के लोगों को लगता है कि मोदी सरकार उन्हें नजरांदाज कर रही है और  कश्मीरियों  की आकांक्षाओं और राजनीतिक मांगों को गंभीरता से नहीं ले रही है। भाजपा की मुस्लिम विरोधी छवि  आग में घी का काम कर रही है। कश्मीर  देश  का मुस्लिम बहुल एकमात्र राज्य है। कश्मीर  घाटी में केंद्र  सरकार के प्रति अविश्वास  का पहाड खडा हो गया है।  मोदी सरकार को इस राज्य को    मुख्यधारा से जोडने के लिए कश्मीर  की अवाम का भरोसा जीतना होगा। ्