सात राज्यों में हालिया सपन्न हुए उपचुनाव परिणामों के स्पष्ट संकेत हैं कि भाजपा का जलवा न केवल बरकरार है, अलबत्ता और सघन होता जा रहा है। अमूमन, उपचुनाव परिणामों का देश की राजनीति पर बहुत बडा असर नहीं पडता है । मगर इन उपचुनाव ने देश के आने वाले राजनीतिक परिदृश्य की एक झलक पेश की है। उपचुनाव के परिणाम साफ-साफ बता रहे हैं आम आदमी पार्टी का दिल्ली में भी सुपडा साफ हो सकता है। इन परिणामों से यह भी पता चलता है कि भाजपा का ग्राफ गैर-हिंदी भाषी राज्यों में भी तेजी से ऊपर चढ रहा है। सबसे अहम बात यह है कि राजनीतिक दलों, विशेषतय आप और कांग्रेस द्वारा इलेक्ट्रानिक वोटिंग मशीनों की क्रेडिबिलिटी पर जो सवाल उठाए जा रहे हैं, उसका भी जबाव मिल गया है। मध्य प्रदेश में भिंड जिले की अटेर सीट पर कांग्रेस प्रत्याशी की विजय पार्टी की एवीएम को लेकर तमाम आशंकाओं को निर्मूल साबित करती हैं। इसी सीट की इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीनों की क्रेडिबिलिटी को लेकर कांग्रेस सबसे ज्यादा शोर मचा रही थी। मुख्यमंत्री सही शिवराज सिंह की लाख कोशिशों के बावजूद भाजपा, कांग्रेस से यह सीट नहीं छीन पाई। इससे साफ है कि इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीनों की विश्वसनीयता पर सवाल उठा कर राजनीतिक दल अपनी पराजय का ठीकरा मशीनों पर फोड रहे हैं। उपचुनाव में आम आदमी पार्टी की करारी हार से दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल की राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं को तगडा झटका लगा है। पंजाब और गोवा के विधानसभा चुनाव परिणामों के बाद एक माह में केजरीवाल को यह दूसरा बडा झटका है। जिस आम आदमी पार्टी को विधानसभा चुनाव में जनता ने सर-आंखों कर बिठाया था, उसी पार्टी को मात्र दो साल में लोगों ने बुरी तरह से दुत्कार दिया है। दिल्ली के राजौरी गार्डन उपचुनाव में आम आदमी पार्टी के प्रत्याशी की जमानत तक जब्त हो जाना केजरीवाल के लिए बहुत बडा झटका है। भाजपा को इस सीट पर जबरदस्त सफलता मिलना राजधानी में पार्टी की वापसी के संकेत हैं। कांग्रेस को दिल्ली के चुनाव नतीजों से इस बात का संतोष है कि अभी भी ग्रांड ओल्ड पार्टी ही देश की राजधानी में भाजपा का विकल्प है। राजौर गार्डन में कांग्रेस दूसरे स्थान पर रही है। 23 अप्रैल को होने वाले निकाय (एमसीडी) चुनाव पर भी इस उपचुनाव का असर पड सकता है। एमसीडी के चुनाव परिणाम आम आदमी पार्टी के भविष्य की दशा और दिशा तय कर सकते हैं। दिल्ली के अलावा पश्चिम बंगाल के कांति दक्षिण विधानसभा सीट पर भाजपा का शानदार प्रदर्शन न केवल ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस के लिए बल्कि वामपंथी मोर्चे के लिए भी खतरे की घंटी है। इस उपचुनाव में वामपंथी मोर्चे को तीसरे स्थान पर धकेलते हुए भाजपा ने दूसरा स्थान हासिल कर अपनी जबरदस्त उपस्थिति दर्ज करवाई है। इस सीट पर वामपंथी और कांग्रेस प्रत्याषियों की जमानत तक जब्त हो गई है। पिछले साल विधानसभा चुनाव में इसी सीट पर भाजपा के उम्मीदवार को मात्र 15,000 वोट मिले थे। इस बार भाजपा को 52, 843 वोट मिले हैं। मगर भगवा पार्टी को कर्नाटक और झारखंड में झटका लगा है। कर्नाटक की दोनों सीटों पर कांग्रेस की विजय से पूर्व मुख्यमंत्री और प्रदेश भाजपा अध्यक्ष वाईएस येदुरप्पा की उपयोगियता पर सवाल खडा हो गया है। उपचुनाव के दौरान भाजपा ने कांग्रेस के दिग्गज नेता और पूर्व मुख्यमंत्री एसएम कृष्णा को पार्टी में शामिल करवाया था। इसका पार्टी को कोई लाभ नहीं मिला। कर्नाटक में अगले साल विधानसभा चुनाव होने है। पार्टी को फिर से अपनी प्राथमिकताएं तय करनी होंगी। दक्षिण में कर्नाटक एकमात्र भाजपा का गढ है और पार्टी हर हाल में इसे बरकरार रखना चाहेगी। झारखंड के उप चुनाव में भाजपा जेएमएम को नहीं रोक पाई। निष्कर्ष यह है कि ताजा उपचुनाव भाजपा के लिए अच्छे हैं तो कांग्रेस के लिए भी उतने बुरे नहीं है।
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