एक जमाने में देश के राज-काज की रीढ की हडडी माने जाने वाले नौकरशाह आज सियासी नेताओं की “जी हजूरी“ करने वाले “बाबू“ बन कर रह गए हैं। जिन लोगों ने फिरंगी शासन झेला है, वे इस बात के गवाह है कि तत्कालीन इंडियन सिविल सर्विस ब्रिटिश सरकार का स्टील फ्रेम हुआ करता था और यह इतना मजबूत था कि सियासत और घूसखोरी के पैने दांत भी इसे काट नही सकते थे। वे कायदे और कानून के एकदम पक्के हुआ करते थे। मजाल है कि उनके रहते कोई नियमों को तोड-मरोड कर उनका फायदा उठा पाए। लार्ड विलियम सिसिल को जब क्वीन एलिजाबैथ का सचिव बनाया गया था, उन्हें किसी भी तरह के गिफ्ट न लेने, कायदे-कानून के पालन के प्रति पूरी तरह से निष्ठावान रहने और हर हालत में महारानी को उत्कृष्ट सलाह देने की शपथ दिलाई गई थी। बाद में यही शपथ हर आइसीएस अधिकारी को दिलाई जाती थी। पुरान लोग आज भी फिरंगी सरकार के स्वच्छ, पारदर्शी और कानून सम्मत राज-काज के कायल हैं और अक्सर कहते हैं, “इससे तो अंग्रेजों का शासन ही अच्छा था“। आजादी के बाद इस स्टील फ्रेम का रंग-रुप भी बदल गया और तेवर भी। जिस नौकरशा ही पर भारत को गर्व था, उसी को लेकर अब देश के गृहमंत्री राजनाथ सिंह को ही कहना पडा रहा है “ सियासी नेताओं की जी हजूरी न करें नौकरशाह“। आजादी के सात दशक मेँ देश का यह “स्टील फ्रेम“ स्टील केज में परिवर्तित हो चुका है। आखिर इस स्थिति को लाने के लिए कौन जिम्मेदार हैं? ब्रिटिश साम्राज्य में भारत के लिए सच्चे दिल से स्टील फ्रेम वाली इंडियन सिविल सर्विस को चुना था। यह बात दीगर है कि इसमें भी भेदभाव किया गया। शुरु में अंग्रेजी अफसरों को ही आईसीएस में भर्ती किया जाता। भारतीयों के लिए दूसरे दर्जे की सिविल सर्विस में रखा जाता। मगर बाद में आईसीएस को भारतीयों के लिए भी खोल दिया था। ब्रिटिश साम्राज्य में कायदे- कानून को न तो तोडा-मरोडा जाता था और न ही इनका उल्लघंन किया जाता। आजादी के बाद उतरोत्तर स्थिति एकदम बदल गई। नियमों को तोडना और कानून को मरोडना, सियासी नेताओं का शौक बन गया है। दुर्भाग्यवश "जी हजूरी" करने वाले नौकरशाह इसमें नेताओं का साथ देते हैं। ब्रिटिश शासन की ही तरह राज-काज का पूरा दारोमदार भारतीय प्रशासनिक सेवा अधिकारियों के जिम्मे है। विदेशी मामलों के लिए भारतीय विदेश सेवा है। भारतीय पुलिस सेवा, भारतीय वन सेवा, भारतीय आर्थिक एवं सांख्यिकी सेवा और इन सब के बाद केन्द्रीय एवं विभिन्न राज्यों की प्रशासनिक और पुलिस सेवाएं है। हर राज्य के पास मुख्य सचिव के अलावा, कई अतिरिक्त मुख्य सचिव, तीन-चार डीजीपी और आला अफसरों की फौज है। इसके बावजूद भी न तो देश में कायदे-कानून का सख्ती से पालन किया जा रहा है, और न ही कहीं पारदर्शी और स्वच्छ प्रशासन की झलकमात्र भी नजर आती है। आजादी से पहले का प्रशासन मूलत़ पुलिस स्टेट पर आधारित था और सरकार का काम कानून-व्यवस्था को बनाए रखना और ज्यादा से ज्यादा लोगों के लिए कुछ बुनियादी सुविधाएं मुहैया कराना हुआ करता था। आजादी के बाद भारत वेल्फेयर स्टेट बन गया था और इसमें नौकरशाही को “ प्रगति और विकास“ के एजेंट के रुप में काम करना था। अब डीसी मात्र कानून-व्यवस्था को लागू करने वाला डिस्ट्रिक्ट मजिस्ट्रेट ही नहीं, वह जिले में योजनाबद्ध विकास कार्यों का भी मुखिया था। अखिल भारतीय प्रशासनिक एवं पुलिस और राज्यों की प्रशासनिक-पुलिस अधिकारियों को ट्रेनिंग के समय भी वेल्फेयर स्टेट की घुटी पिलाई जाती है। 21 अप्रैल को सिविल सर्विस दिवस पर देश की प्रशासनिक सेवाओं की समकालीन प्रांसगिकता के आकलन की जरुरत महसूस की जा रही है। आए दिन नौकरशाही के भ्रष्ट कारनामों और अकूत संपति जमा करने के कच्चे चिठ्ठे देश की “स्टील फ्रेम“ सर्विस को जंग लगा रहे हैं।
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