काले धन पर नोटबंदी से हमला करने के बाद भ्रष्ट राजनेताओं और फर्जी कंपनियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के दृढ निश्चय को दर्शाता है। तीन दिन पहले प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) ने देश भर में सौ से ज्यादा ठिकानों पर छापे मारकर लगभग तीन सौ फर्जी (शैल ) कंपनियों को खंगाला और उनके मालिकों को ढूंढ कर उनके खिलाफ सख्त कार्रवाई की । अगले दिन राजनीतिक नेताओं की बेनामी संपति को जब्त कर लिया गया। इस क्रम में हिमाचल प्रदेश के मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह की दिल्ली के महरौली क्षेत्र में डेरा मंडी स्थित फार्म को जब्त कर लिया गया। दिल्ली हाई कोर्ट द्वारा वीरभद्र सिंह की गिरफ्तारी संबंधी याचिका अस्वीकार करने के तुरंत बाद ईडी ने यह कारवाई की। प्रवर्तन निदेशालय का आरोप है कि वीरभद्र सिंह ने अवैध धन (घूस) से इस फार्म हाउस को मैपल डेस्टिनेश नस एंड ड्रीमबिल्ड नाम की फर्जी कंपनी के नाम खरीद रखा था। इस फर्जी कंपनी के मालिक (शेयरहोल्डर्स) वीरभद्र सिंह का बेटा और बेटी हैं। ईडी ने पंजाब के पूर्व अकाली मंत्री स्वर्ण सिंह फिल्लौर, बेटे धर्मवीर और पूर्व मुख्य संसदीय सचिव अविनाश चन्द्र की बेनामी संपत्ति भी जब्त कर ली। गोवा के पूर्व मुख्यमंत्री दिगबंर कामत और चर्चिल आलेमाव की अवैध संपत्ति भी जब्त कर ली गई है। दोनों गोवा कांग्रेस के दिग्गज नेता है। ईडी ने प्रिवेशन ऑफ मनी लॉड्रिंग एक्ट (पीएमएलए) और फॉरेन एक्सचेंज मैनेजमेंट एक्ट (फेमा) के तहत ये कार्रवाइयां की है। काग्रेस भले ही इन कार्रवाइयों को “बदले की भावना“ से प्रेरित करार दे मगर जनमानस नोटबंदी की तरह मोदी सरकार की इस पहल का भरपूर समर्थन करेगा। पूरा देश इस सच्चाई को जानता है कि सियासी नेता दूध के धूले नहीं है। और अगर सियासी नेताओं की विश्वसनीयता पर जनमत संग्रह कराया जाए, तो बहुमत यही कहेगा कि अधिकतर नेता ंआकंठ भ्रष्टाचार में लिप्त हैं। चुनाव के दौरान नामांकन पत्र दाखिल करते समय उम्मीदवारों को अपनी पूरी चल-अचल संपति का ब्यौरा भी देना पडता है। निर्वाचन आयोग इस जानकारी को फौरन सेंट्रल बोर्ड ऑफ डायरेक्ट टैक्सिस (सीबीडीटी) को भेज देता है। स्वंयसेवी संस्था न्यू एडीआर द्वारा एकत्रित जानकारी मुताबिक पिछले 15 साल में मंत्रियों, सांसदों और विधायकों की चल-अचल संपत्ति में बेताहाश इजाफा हुआ है और अधिकांश मामलों में यह आय के ज्ञात स्त्रोतों से कहीं ज्यादा है। एक-आध मामले को छोडकर न तो आयकर विभाग ने और न ही प्रवर्तन निदेशा लय ने आज तक सांसदों और विधायकों की अकूत संपति को खंगाला। आंकडों के अनुसार देश में 15 लाख पंजीकृत कंपनियां हैं मगर मात्र 6 लाख ही अपना सालाना रिटर्न भरती हैं। इससे साफ है कि 9 लाख कंपनियां फर्जी हैं और बेनामी संपत्तियां इक्ठ्ठी करने के लिए बनाई गई हैं। देश में कायदे-कानून के घोर उल्लंघन की रिवायत है। सवा सौ करोड से ज्यादा की आबादी वाले देश में मात्र एक फीसदी आबादी आयकर अदा करती है और इनमें अधिकांश नौकरी-पेशा लोग हैं। एक करोड रु से ज्यादा आयकर चुकाने वाले मात्र 5,000 लोग हैं जबकि देश में 2.36 लाख करोडपतियों के पास 90 खरब रु से भी ज्यादा अकूत संपत्ति है़। न्यू वर्ड वैल्थ की रिपोर्ट के अनुसार 2007 के बाद पूरी दुनिया में बैल्थ क्रिएशन में नाममात्र की वृद्धि हुई है, भारत में यह 55 फीसदी से भी ज्यादा है मगर इस दौरान इस अनुपात में आयकर भरने वाले में कोई वृद्धि नही हुई है। विपक्ष को सरकार के हर अच्छी पहल की निंदा करने की आदत है। जो काम कांग्रेस सालों नहीं कर पाई, मोदी सरकार ने मात्र अढाई साल में कर दिखाया है। देश की दिल्ली इच्छा है कि भ्रष्ट नेताओं को सलाखों के पीछे होना चाहिए। जन सेवा को:धन सेवा“ बनाने की सियासी प्रवृति को जड से उखाडने की जरुरत है।
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