गुरुवार, 27 अप्रैल 2017

अब तो संभले केजरीवाल

राजधानी दिल्ली में दो साल में ही अरविंद केजरीवाल और आम आदमी पार्टी से जनता का मोहभंग हो गया है। एमसीडी के चुनाव परिणाम यही संकेत   दे रहे हैं। दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल अपनी हार का ठीकरा भले ही इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मषीनों के सर फोड लें, मगर सच्चाई यही है कि दिल्ली की जनता ने आप और केजरीवाल की “नकारात्मक राजनीति“ को नकार दिया है। केजरीवाल “नई राजनीतिः की बाते करते-करते “नकारात्मक राजनीति“ के चैंपियन बन  गए हैं । एमसीडी चुनाव  मतदान से दो दिन पहले भी अरविंद केजरीवाल  इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीनों को दोषी  ठहराने से बाज नहीं आए । केजरीवाल ने दावा किया था कि अगर ईवीएम मशीनों में गडबडी नहीं हुई तो आप 272 मेंसे 200 सीटें जीतेगी। मगर आम आदमी पार्टी मात्र 47 सीटें ही जीत पाई हैं। इससे साफ है कि ईवीएम मशीनों में कोई गडबडी नहीं हुई है। अगर हुई होती तो केजरीवाल की पार्टी  को 47 सीटें भी नहीं मिलती। दिल्ली की जनता के गले यह बात भी उतर नहीं रही थी कि अगर  ईवीएम मशीनों में गडबडी की जा सकती है, तो 2015 के विधानसभा चुनाव में क्यों नहीं हुई? इन्हीं ईवीएम मशीनों के दम पर आम आदमी पार्टी को 2015 में प्रचंड बहुमत मिला था। आम आदमी पार्टी की लूटिया डूब रही है, दीवारों पर लिखी यह इबादत पंजाब और गोवा विधानसभा चुनाव में मिली पराजय के बाद साफ पढी जा सकती थी। इसके बाद दिल्ली के राजौरी गार्डन विधानसभा उपचुनाव में आप के  प्रत्याशी  की जमानत जब्त हो जाने के बाद भी दीवारों पर लिखी इबादत साफ-साफ कह रही थी कि अरविंद केजरीवाल का जादू लुप्त हो चुका है। पर अरविंद केजरीवाल एंड कंपनी हार का सामना करने की बजाए अभी भी  ईवीएम मशीनों को  जिम्मेदार  ठहरा रहे हैं । दिल्ली की जनता बेहद जागरुक है और वह यह बात भली-भांति जानती है कि केजरीवाल सिर्फ  बहाने बना रहे हैं। उन्हें दिल्ली की जनता ने राजधानी का राजकाज चलाने और इसका कायाकल्प करने के लिए प्रचंड जनादेश  दिया था। केजरीवाल ने इस जनादेश  की कद्र नहीं की और वे दिल्ली के बाहर आप का परचम फहराने के लिए हाथ-पांव मारते रहे। दिल्ली की जनता को यह बात गवारा नहीं लगी। राजोरी गार्डन विधानसभा उपचुनाव में पार्टी प्रत्याशी की जमानत जब्त हो जाना इस बात के  स्पष्ट  संकेत थे। इस साल केजरीवाल को यह तीसरा बडा झटका है। पहले पंजाब और गोवा के विधानसभा चुनाव की हार, फिर राजौरी गार्डन उपचुनाव और अब एमसीडी उपचुनाव के परिणाम यही कह रहे हैं कि दिल्ली में 2015 के विधानसभा चुनाव में भले ही प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की लहर नहीं चली मगर 2017 में मोदी की प्रचंड लहर चल रही है। दिल्ली एमसीडी चुनाव परिणाम ने यह बात भी साफ कर दी है कि देश  में विपक्ष के पास मोदी का कोई विकल्प नहीं है और अरविंद केजरीवाल की “नकारात्मक“ राजनीति भी जनता को गवारा नहीं है। दो साल के भीतर आम आदमी पार्टी चुनावी दंगल में जो हश्र हुआ है, उसने 1977 में जनता पार्टी की याद दिला दी है। आपातकाल की ज्यादतियों से भनभनाई जनता ने 1977 में कांग्रेस का आधे भारत (कॉउ बैल्ट) मे सुपडा साफ कर दिया था और लोकसभा चुनाव से कुछ समय पहले बनी जनता पार्टी को प्रचंड जनादेश  दिया था। मगर तब भी जनता पार्टी इस जनादेश  का सम्मान नहीं कर पाई और देश  की हर बुराई के लिए कांग्रेस और इंदिरा गांधी को  दोषी  ठहराती रही। नतीजतन, अढाई साल में जनता पार्टी की सरकार भी गिर गई और पार्टी भी टूट गई। अरविंद केजरीवाल भी पिछले दो साल में हर बात के लिए प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को  दोषी  ठहरा रहे है। अगर केजरीवाल तुरंत संभले नहीं, आम आदमी पार्टी का भी जनता पार्टी जैसा ही हश्र हो सकता है। भारत की जनता को “नकारात्मक“ राजनीति कभी  रास नहीं आई।