मंगलवार, 25 अप्रैल 2017

मोदी सरकार का सपना

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने नए भारत के निर्माण के वास्ते राज्यों से टीम इंडिया बनाने का आहवान किया है। निसंदेह,नए भारत के सपने को सभी राज्यों और मुख्यमंत्रियों के सहयोग से ही साकार किया जा सकता है। रविवार को नीति आयोग की संचालन परिषद की बैठक में प्रधानमंत्री ने कहा है कि वे खुद मुख्यमंत्री रह चुके हैं, इसलिए राज्यों की आर्थिक विषमताओं से बखूबी परिचित है। राज्यों के लिए यह बेहतर स्थिति है। प्रधानमत्री ने बैठक में मौजूदा अप्रैल से मार्च वाले वित्तीय वर्ष  को  जनवरी से दिसंबर तक बदलने की पैरवी भी की है। मोदी सरकार केन्द्रीय बजट को फरवरी 28 की बजाए फरवरी के  शुरु में पेश  करने की रिवायत शुरु कर चुकी है। प्रधानमंत्री ने राज्यों के लिए इस बात की भी छूट दी है कि राज्यों को बजटीय परियोजनाओं के स्वीकृति के लिए नीति आयोग आने की जरुरत नहीं है। इसके लिए वे नीति आयोग की तरह विशेषज्ञों की सेवाएं ले सकते हैं। मोदी सरकार वित्तीय प्रबंधन में आमूल-चूल बदलाव करने के पक्ष में है। और इसकी  शुरुआत हो भी चुकी है। मोदी सरकार को उम्मीद है कि वित्तीय प्रबंध में क्रांतिकारी बदलाव से देश  तेजी से आगे बढ सकता है। इस बात में भी दो राय नहीं हो सकती है कि राज्यों की एक समान तरक्की के बगैर देश  की प्रगति संभव नहीं है।  दुर्भाग्यवश , आजादी के सात दशक बीत जाने के बावजूद भी कई राज्य अभी भी अपेक्षाकृत पिछडे हुए हैं। बिहार के मुख्यमंत्री ने बैठक में इस बात की  शिकायत भी की कि पिछडे राज्यों को 14वें वित्त आयोग से कोई विशेष  राहत नहीं मिली। उनकी मांग है कि केन्द्र को पिछडे राज्यों के लिए इसकी भरपाई करनी चाहिए। राज्यों को केन्द्र से और भी कई  शिकायतें हैं और इनमें प्रमुख हैं कि केन्द्र सरकार उन राज्यों से सौतेला व्यवहार करती है जहां विपक्षी दलों की सरकारें सत्तारुढ होती हैं। रविवार को आयोग की बैठक में हिमाचल प्रदेश  के मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह ने यही  शिकायत की। मगर यह रिवायत भी कांग्रेस ने ही  शुरू  की है। भाजपा आज तक इस बात को भूल नहीं पाई है कि किस तरह नब्बे के दशक में केन्द्र की कांग्रेस सरकार ने बाबरी मस्जिद प्रकरण के बाद हिमाचल, राज्स्थान, उत्तर प्रदेश  और मध्य प्रदेश  में चुनी हुई  भाजपा सरकारों को बर्खास्त कर दिया था। कांग्रेस  शासन में भाजपा अथवा गैर-कांग्रेसी सरकारों से भी वित्तीय मदद में भेदभाव किया जाता था।  तथापि, दो गलत काम मिलकर भी अच्छा नहीं कर सकते।  संघीय ढांचे में केन्द्र सरकार और राज्यों में टकराव की बजाए मिल-जुल कर ही देश  को तेजी से आगे ले सकते हैं और विकास की तेज रफ्तार में किसी भी तरह के अवरोधक नहीं आने चाहिए। तथापि, प्रधानमंत्री की इस पहल में दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल और पश्चिम  बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने अभी से रोडे अटकाने  शुरु कर दिए हैं। आम आदमी पार्टी को पंजाब और गोवा के विधानसभा चुनावों में करारी हार का सामना करना पडा है और अब केजरीवाल हार का ठीकरा इलेक्ट्रानिक वोटिंग  मशीन  में गडबडी के सर फोड रहे हैं। रविवार को ही दिल्ली में निकाय चुनाव के लिए मतदान सपन्न हुआ है और एक्जिट पोल के नतीजे आम आदमी पार्टी के सफाए के संकेत दे रहे हैं। केजरीवाल ने अभी से दिल्ली निकाय चुनाव में भी  इलेक्ट्रानिक वोटिंग मशीन   में गडबडी के आरोप लगाए हैं। कहावत है “ खिसखियानी बिल्ली, खंबा नोचे“।  दोनों ही नीति आयोग की बैठक से अनुपस्थित रहे। केजरीवाल को मोदी सरकार से सौ तरह की  शिकायतें हैं। ममता को भी केन्द्र से उदार वित्तीय सहायता नहीं मिलने का गिला है। देश  के समग्र विकास के लिए किसी भी राज्य को आधे-अधूरे विकास से पीछे नहीं छोड जा सकता।  केन्द्र में सत्तारूढ मोदी सरकार के लिए सुखद स्थिति यह है कि अधिकांश  राज्यों में भाजपा की सरकारें है। सरकार इस स्थिति को भुनाकर नए भारत का निर्माण कर सकती है।