देश में इन दिनों किसानों के कर्ज माफी की होड लगी हुई है। उत्तर प्रदेश में योगी आदित्यनाथ सरकार ने किसानों के 39,729 करोड रु के कर्ज माफ कर दिए है। इससे 2 करोड 13 लाख किसानों को फायदा होगा। भाजपा ने अपना चुनावी वायदा पूरा किया है। उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव प्रचार के दौरान प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने किसानों के कर्ज माफ करने का वायदा किया था। भाजपा मेनिफेस्टो में भी किसानों के कर्ज माफी का वायदा किया गया था। पंजाब में कांग्रेस ने किसानों के कर्ज माफी का वायदा कर रखा है । राज्य की अमरेन्द्र सरकार किसानों के कर्ज माफी की तैयारी में है और उत्तर प्रदेश के बाद कांग्रेस सरकार पर तुरंत कर्ज माफी की घोषणा के लिए दबाव बढ सकता है । इस साल के अंत में होने वाले गुजरात और हिमाचल प्रदेश विधानसभा चुनाव में भी किसानों की कर्ज माफी का मुद्दा प्रमुख रहेगा। किसानों को रिझाने के लिए उत्तर प्रदेश और पंजाब की तरह कांग्रेस और भाजपा दोनों ही कर्ज माफी का वायदा कर सकते हैं। महाराष्ट्र में भाजपा सरकार पर किसानों के कर्ज माफी के लिए कांग्रेस और राकांपा समेत विपक्षी दलों का भारी दबाव पड रहा है। इसके लिए सभी विपक्षी दल एकजुट हो गए हैं। सरकार का कहना है कि उसकी माली हालात 22,000 करोड रु के कर्ज माफ करने की अनुमति नहीं देती। कर्नाटक में जनता दल (सेकुलर) के नेता एचडी कुमारस्वामी पहले ही घोषणा कर चुके हैं कि अगर उनकी पार्टी की सरकार बनती है, तो 24 घंटों के भीतर किसानों के कर्ज माफ कर दिए जाएंगें। कर्नाटक में मई, 2018 में विधानसभा चुनाव होने हैं। मगर क्या कर्ज माफ करना किसानों की समस्याओं का हल है? चुनाव के समय लोक-लुभावने वायदे कर मतदाताओं को रिझाने के वायदे को पूरा करने से किसानों का कोई भला नहीं होने वाले है। किसानों की सबसे बडी समस्या है कि उसकी पैदावार के लाभदायक दाम कैसे मिले और वह अपनी खेती से ज्यादा से ज्यादा कमाई करे। अगर सरकार ऐसा करने में सफल हो जाती है तो किसानों के कर्ज माफी की नौबत ही नहीं आएगी। मगर दुखद स्थिति यह है कि समकालीन सरकार अपने हर फैसले को “राजनीतिक चश्मे ” से देखती है। कर्ज माफी का फैसले ही लें। इससे पहले भी सरकार किसानों के कर्ज माफ कर चुकी है। फरवरी, 2008 में संप्रग सरकार की 600 अरब रु की एग्रीकल्चर डेट वेवर एंड डेट रिलीफ स्कीम के तहत देश के कुल 5 करोड लघु एवं सीमांत किसानों मेंसे 4.3 करोड कर्ज माफ किए गए थे। देश के कुल किसानों का 70 फीसदी लघु एव सीमांत किसान है। हरियाणा में देवी लाल साकार नब्बे के दशक में किसानों के कर्ज माफ कर चुकी है मगर बैकों को इसकी एवज में माकूल राशि नहीं दे पाई जिस वजह यह योजना विफल रही है। बहरहाल, कर्ज को राजनीतिक मुद्दा बनाए जाने से न तो किसानों को फायदा हो रहा है और न ही वित्तीय संस्थाओं का। सरकार के इस तरह के कदम से देश का वित्तीय प्रबंध का दिवाला उठ रहा है। कर्ज लेकर उसकी अदायगी नहीं कर पाना कोई बेहतर वित्तीय प्रबंध नहीं है और अगर सरकार ही वित्तीय कुप्रबंध को प्रोत्साहित करे, तो देश की वित्तीय हालात का दिवाला उठना तय है। पंजाब क माली हालात बेहद खराब है। सातवें वेतन आयोग की सिफारिशे लागू करने के लिए राज्य सरकार के पास वित्तीय साधन नहीं है। कर्मचारियों को समय पर वेतन और पेंशन के लाले पडे हुए हैं। सरकार पर सवा लाख करोड से ज्यादा का कर्जा है और इसमेंसे आधा कर्जा ( लगभग 60 लाख करोड रु) अगले सात साल में चुकाने है। किसानों को दी जा रही मुफ्त बिजली से पहले ही सरकार पर खासा बोझ पड रहा है। और अब अगर किसानों के कर्ज माफ किए जाते हैं, तो सरकार की माली हालत और खराब हो सकती है।
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