बुधवार, 19 अप्रैल 2017

मोदीकेयर

मोदी सरकार जेनेरिक दवाओं के प्रचलन को बढावा देने के लिए बहुत बडा कदम उठाने जा रही है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने सूरत में ऐलान किया है कि अब देश  भर में डॉक्टरों को रोगियों के लिए जेनेरिक दवाएं लिखना अनिवार्य  होंगा । इसके लिए सरकार जल्द ही कानून बनाएगी। जेनेरिक दवाए ब्रांडिड दवाओं की तुलना में काफी सस्ती होंती हैं। देश  की 50 फीसदी आबादी आज भी जरुरी  दवाओं की पहुंच से महरुम है।  भारत में मल्टी नेशनल और स्वदेशी  बडी ड्रग उत्पादक कंपनियों  के ऊंचे दाम वाली दवाएं आम आदमी की पहुंच से बाहर है। मल्टी नेशनल कंपनियों ने महंगे दामों पर दवाएं बेचकर भारी लूट मचा रखी है। ड्रग मैन्युफेक्चरिंग कंपनियां विगत पांच साल से लगातार कीमतें बढा रही हैं जबकि इस दौरान मुद्रा स्फीति गिरी है और उत्पादन लागत भी कम हुई है। पांच साल पहले मल्टी नेशनल कंपनियों की जिस एक गोली की कीमत 5 रु हुआ करती थी, वह बढते-बढते अब 20 को पार कर गई है। खासकर, हृदय रोग, मधुमेह (शुगर), रक्त चाप जैसी आम बीमारियों की दवाएं माह-दर-माह महंगी होती जा रही हैं। इसके लिए सरकार, डाक्टर्स  और  भ्रष्ट  सरकारी तंत्र  सब-के-सब जिम्मेदार हैं। देश  में ड्रग की कीमतें ड्रग प्राइस कंट्रोल आर्डर के तहत निर्धारित की जाती हैं और इसके किए सरकार ने कुछ मानदंड तय कर रखे  हैं।  इन्हीं के मुताबिक जरुरी और गैर-जरुरी दोनों ही तरह की दवाओं की कीमतें तय की जाती है। तथापि, सरकार का ड्रग प्राइस निर्धारण मेकेनिज्म  आम आदमी के समझ से बाहर है। गरीब और आर्थिक तौर पर दुर्बल व्यक्ति आज तक यह बात समझ नहीं पाया है कि मुद्रा-स्फीति अथवा महंगाई में मामूली सी वृद्धि पर जब कीमतें फौरन बढा दी जाती हैं, मुद्रा-स्फीति गिरने पर कम क्यों नहीं की जातीं। और जब सरकारी प्राधिकरण कीमतों तय कर रहा हो, तो इस बात का ख्याल क्यों नहीं रखा जाता। कीमतें अगर कम कर भी दी जाती हैं, तो ड्रग उत्पादक बडी चतुराई से दवा की मात्रा अथवा साइज  कम करे देंगे।  भ्रष्ट  सरकारी तंत्र भी जनता का साथ देने की बजाए उत्पादकों का साथ देता है। इस मामले में हिमाचल प्रदेश  का औद्योगिक क्षेत्र बद्दी-बरोटीवाला मिसाल है। चंद सालों में बद्दी-बरोटीवाला दुनिया का तीसरा सबसे बडा ड्रग उत्पादक हब बन कर उभरा  है और यहां 200 देशों के लिए 150 बल्क ड्रग का उत्पादन होता है। 30,000 करोड रु से ज्यादा के टर्न ओवर मेंसे 9500 करोड रु का निर्यात होता है। हिमाचल प्रदेश  में उधोगों के लिए आयकर से लेकर आबकारी  शुल्क तक कई तरह की रियायतें दी जाती है। बिजली भी माकूल और काफी सस्ती है और लेबर भी। इसके बावजूद बद्दी-बरोटीवाला में तैयार की जा रही दवाएं हिमाचल  में ही महंगे दामों पर बेची जा रही है। हाल ही में कुछ जरुरी  दवाओं की कीमतों में कमी की तो गई मगर दवा का आकार-प्रकार घटा दिया गया। पूरे देश  में यही चल रहा है। ड्रग मैन्युफेक्चर्स  आराम से कीमतें बढा देते हैं पर उन्हें पूछने वाला कोई नहीं है। बहरहाल, जेनेरिग ड्रग ब्रांडिड दवाओं से न केवल सस्ती हैं मगर ज्यादा प्रभावी भी हैं और इन दवाओं का शरीर पर प्रतिकूल असर भी नहीं पडता है। भारत जेनेरिक दवा उत्पादन में दुनिया का अग्रणी देश  है। इस बात के  दृष्टिगत  देश  में महंगी ब्रांडिड दवाओं की अपेक्षा जेनेरिक दवाओं को बढावा देने के लिए यह उपयुक्त समय है। भारत समेत एशिया या के अधिकांश  मुल्कों की 50 फीसदी आबादी को जरुरी  दवाएं नहीं मिल पातीं। जेनेरिक दवाएं इसका उपयुक्त विकल्प है। मगर सस्ती जेनेरिक दवाओं का लाभ आम आदमी को तभी मिलेगा जब डाक्टर्स  भी मरीजों को जेनेरिक दवाएं लिखना  शुरु करें। अमूमन, देश  में ब्रांडिड दवाओं को लिखने का प्रचलन है और डाक्टर भी ऐसी ही दवाएं लिखते हैं।  प्रधानमंत्री की ताजा पहल स्वाग्त योग्य है।