मुस्लिम समुदाय में तलाक की प्रथा खासी चर्चा का विषय बना हुई है। मुस्लिम समाज में शादी-शुदा महिला को तीन बार “तलाक” भर कह देने से जनाब मियां अपनी बीवी को छोड सकता है। इंटरनेट और महिला सशक्तिकरण के इस जमाने में मुस्लिम महिलाओं को भोग की वस्तु मानने वाले कटटरपंथी आज भी इस बात पर अडे हुए है कि तलाक़ की मौजूदा व्यवस्था कानून सम्मत है। कटटरपंथी कह रहे हैं कि इस्लामिक न्यायशास्त्र सिंद्धात के तहत मुस्लिम समाज में शादी-ब्याह से जुडे कायदे-कानून मुस्लिम पर्सनल लॉ के तहत बनाए गए हैं, इसलिए न्यायपालिका भी इन्हें बदल नहीं सकती। मुस्लिम पर्सनल लॉ शरीयत पर आधारित है। मोटे तौर पर शरीयत कुरान के प्रावधानों के साथ-साथ पैंगबर मोहम्मद की शिक्षा और रिवायतों से जुडा है। लेकिन पैंगबर ने महिलाओं को कभी भोग की वस्तु नहीं माना, अलबता वे उन्हें पुरुष का अर्धांगिनी मानते थे। पैंगबर आज होते तो कभी भी तीन बार तलाक जैसी अमानवीय कुप्रथा का पक्ष नहीं लेते। वैवाहिक बंधन जैसे पवित्र रिश्ते को मात्र तीन बार तलाक कहकर नेस्तानाबूद करने का यह नियम मुस्लिम पर्सनल लॉ में संभवतय कबायली मानसिकता का ही हिस्सा है। इस्लाम धर्म बनने से पहले अरब में कबाइली सामाजिक संरचना थी। कबीलों के सामाजिक कायदे-कानून जुबानी हुआ करते। सातवीं सदी में जब मदीना में इस्लाम की स्थापना हुई, कुरान अन्य सभी समुदाय पर हावी हो गया और कबायली सामाजिक व्यवस्था की जगह इस्लाम ने ले ली। पैंगबर के बाद विभिन्न धार्मिक सस्थानों और शरीयत लागू करने वाले मुल्कों ने अपनी-अपनी सुविधानुसार इन कानूनों की व्याख्या की और इन्हें विकसित किया। बहरहाल, देश की 90 फीसदी मुस्लिम महिलाएं तीन बार तलाक और बहुपत्नी प्रथा के सख्त खिलाफ है और इन दोनों को निरस्त करने की पुरजोर मांग कर रही है। भारत में मुस्लिम पर्सनल लाँ 1937 में वजूद में आया था। आजादी के बाद भी यह कानून यथावत बरकरार रहा। संविधान के अनुच्छेद 14 के तहत देश में सभी नागरिकों को कानून का एक बराबर संरक्षण है मगर जब बात शादी-ब्याह और विरासत जैसे व्यक्तिगत मुद्दों की आई तो समान आचार संहिता (यूनीफोर्म सिविल कोड) की बजाए मुस्लिम समुदाय के लिए पर्सनल लॉ को लागू किया गया। यानी कानून के तहत एक अलग कानून। इसी कारण आज देश में शादी-ब्याह और विरासत को लेकर मुस्लिम समुदाय के लिए अलग कानून है, हिंदुओं-सिखों और पारसियों के लिए अलग। भारतीय जनता पार्टी और उससे संबद्ध भगवा संगठनों को इस पर सख्त ऐतराज है। 1985 में पहली बार शाह बानो नाम की मुस्लिम महिला ने मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के तलाक को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी और पति से गुजारे का हक (एलीमॉनी) मांगा था। न्यायालय ने शाह बानो के पक्ष में फैसला सुनाते हुए महिला को गुजारा निधि दिलाई भी थी। पर मुस्लिम समुदाय के तुष्टिकरण के लिए तत्कालीन राजीव गांधी की कांग्रेस सरकार ने संविधान में संशोधन करके सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले को निष्क्रिय कर दिया । बहरहाल, तीन बार तलाक का मुद्दा अब सुप्रीम कोर्ट की पांच सदस्यीय संवैधानिक पीठ के हवाले है और 11 मई से इस पर सुनवाई शुरु होगी। अदालत का फैसला आने तक तलाक को लेकर ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड भी अब रास्ते पर आ गया है। बोर्ड ने दावा किया है कि वह डेढ साल के भीतर तीन बार तलाक के मामले को सुलझा लेगा। बोर्ड सुप्रीम कोर्ट में तलाक के खिलाफ दायर याचिका का मुखर विरोध कर चुका है। बोर्ड यह भी मान चुका है कि हालांकि तीन बार तलाक बोलकर वैवाहिक बंधन तोडना अपराध है मगर इस कानून को बदला नहीं जा सकता। बोर्ड के इस स्टैंड के दृष्टिगत इसकी किसी बात पर भरोसा नहीं किया जा सकता। अन्तोगत्वा, सुप्रीम कोर्ट की संवैधानिक पीठ का फैसला ही सर्वमान्य हो सकता है। सुखद स्थिति यह है कि केन्द्र में सत्तारूढ मोदी सरकार भी अन्यायपूर्ण तलाक को निरस्त करने के पक्ष में है।
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