प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की वीरवार को हिमाचल यात्रा के दौरान राज्य की जनता में “विशेष पैकेज“ की उम्मीद जगना स्वभाविक है। हिमाचल प्रदेश में वर्षांत तक विधानसभा होने है और इस बार भी भाजपा राज्य में सत्ता की प्रबल दावेदार है। प्रधानमंत्री ने उत्तर प्रदेश और बिहार विधानसभा चुनाव के दौरान दोनों राज्यों को विशेष पैकेज देने का ऐलान किया था। अब हिमाचल की बारी है। कठिन भौगोलिक परिस्थितियां और चरम जलवायु के कारण पहाडों में विकास की लागत मैदानी क्षेत्रों की तुलना में दो से अढाई गुना ज्यादा आती है। पहाडी राज्यों में रेल नेटवर्क न के बराबर है। हिमाचल प्रदेश में आजादी के बाद सात दशकों में एक किलोमीटर लंबी ब्रॉडगेज रेलवे लाइन तक नहीं बन पाई है। प्रस्तावित पठानकोट-मनाली-लेह रेल लाइन अभी भी कागजों में ही सिमटी हुई है जबकि यह रेल लाइन सामरिक दृष्टि से बेहद उपयोगी है। हिमाचल प्रदेश मे कालका- शिमला और पठानकोट-जोगेन्द्रनगर छोटी रेल लाइनें (नेरो गॉज) का निर्माण अग्रेंजो द्वारा किया गया था। स्वदेशी सरकार इन लाइनों को बॉड गेज तक नहीं कर पाई है । 16 किलोमीटर लंबी नंगल-उना-तलवाडा बॉड गेज लाइन का निर्माण कार्य तीन दशक से ज्यादा समय में भी पूरा नहीं हो पाया है। हिमाचल प्रदेश में बद्दी-बरोटीवाला क्षेत्र हालांकि एशिया का तीसरा सबसे बडा ड्रग उत्पादक हब है मगर इस क्षेत्र के लिए भी आज तक रेल लाइन का निर्माण नहीं हो पाया है जबकि यह क्षेत्र कालका और चडीगढ के काफी समीप है। समय पर रेल लाइनें पूरी नहीं होने से इनकी लागत बढ जाती है। उत्तराखंड में 125 किलोमीटर लंबी ऋृशिकेश -कर्णप्रयाग रेल लाइन इसकी गवाह है । इस रेल लाइन का काम समय पर शुरु नहीं होने के कारण छह साल में इसकी लागत 4000 करोड रु से बढकर 16,500 करोड रु हो गई है। अभी भी इस रेल लाइन पर काम शुरु नहीं हो पाया है। इस रेल लाइन में देश की सबसे 15 किलोमीटर लंबी सुरंग का निर्माण होना है। पहाडी राज्यों के लिए रेल लाइनें और सडकें उनकी जीवन रेखा होती है। पहाडों की बात तो छोडिए, स्वदेशी सरकार आजादी के सात दशक में बमुश्किल 13,000 किलोमीटर लंबी रेल लाईनें बिछा पाईं है। आजादी से पहले फिरंगी सरकार ने 50, 000 किलोमीटर लंबी रेल लाइनों का निर्माण किया था। पहाडों में समयबद्ध और योजनाबद्ध विकास करवाना आसान नहीं है। पहाडों को अपनी वन संपदा को भी संरक्षित रखना है और सडकों का निर्माण भी करना है। सडक निर्माण और विकास की परियोजनाएं लागू करने के लिए वृक्षों का कटान आवश्यक है। केन्द्र सरकार ने पर्यावरण संरक्षण के दृष्टिगत वृक्ष कटान को लेकर नियम खासे सख्त कर रखे हैं और इनके कारण अक्सर पहाडों में निर्माण कार्य में लंबा विलंब हो जाता है और लागत बढ जाती है। एक जमाने में वन संपदा पहाडी राज्यों के लिए राजस्व का जरिया भी था मगर अब नहीं है। पहाडों के लोग भी वन खेती से कोई आय अर्जित नहीं कर सकते है। वस्तु स्थिति यह है कि पहाड के लोगों को हर मामले में भेदभाव का शिकार होना पड रहा है। सडक यायायात के अलावा परिवहन का और कोई भी पुख्ता साधन नहीं है। मैदानी क्षेत्रों की तुलना में पहाडी राज्यों का तेजी से ओद्योगिकरण भी नहीं हो पाया है और इसलिए रोजगार सृजन काफी कम है । केन्द्र द्वारा पहाडी राज्यों को उधोग स्थापित करने के लिए तरह-तरह रियायतें दिए जाने और सस्ती बिजली तथा लेबर मुहैया होने के कारण पहाडी राज्यों का थोडा-बहुत औद्योगिकरण हुआ तो है मगर स्थानीय लोगों को प्रर्याप्त रोजगार नहीं मिल पाया है। इसी कारण हिमाचल में शिक्षित बेरोजगारों की संख्या पंजाब और हरियाणा से काफी ज्यादा है। इन हालात में हिमाचल प्रदेश जैसे पहाडी राज्य के लिए केन्द्र से विशेष पैकेज की दरकार है। प्रधानमंत्री ने उतराखंड चुनाव प्रचार के दौरान राज्य के लोगो से विशेष पैकेज का वायदा किया था। उत्तराखंड की जनता ने भाजपा को प्रचंड जनादेश दिया है। लोकसभा चुनाव क दौरान मोदी ने हिमाचल के लोगों से भी यही वायदा किया था। वायदों को पूरा करने का यही सही समय है।
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