शुक्रवार, 13 जनवरी 2017

(बे)सहारा डायरी

सुप्रीम कोर्ट ने सहारा डायरी पर स्पष्ट  व्यवस्था देकर  शीर्ष  पदों पर आसीन लोगों को बेवजह के अदालती पचडों से राहत दी है। सुप्रीम कोर्ट  के ताजा फैसले से कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी को भी झटका लगा है। राहुल गांधी ने सहारा डायरी के पन्नों में निहित आरोपों  पर संसद में भूंकप लाने की बडी-बडी बातें की थी। देश  में  शीर्ष पदों  पर आसीन लोगों पर ऊल-जलूल आरोप लगाकर अदालत का वक्त जाया करने की तो जैसे रिवायत हो गई है। सुप्रीम कोर्ट ने सहारा डायरी मामले में साफ  शब्दों में कहा है कि बेबुनियाद और कच्चे आरोपों  (लूज शीट्स)  के आधार पर  शीर्ष  पद पर आसीन किसी भी व्यक्ति के खिलाफ जांच नहीं बिठाई जा सकती। बुधवार को सहारा डायरी को आधार बनाकर इस मामले जांच की मांग को लेकर न्यायालय में दायर याचिका को खारिज करते  हुए न्यायालय ने फैसला सुनाया कि  जांच के लिए इस मामले में पर्याप्त सबूतों की कमी है । अदालत ने कहा “ कच्चे आरोपों को आधार बनाकर जांच करवाना गलत परंपरा होगी“। सहारा डायरी को आधार बनाकर वकील और स्वराज इंडिया के संस्थापक प्रशांत भूषण ने सुप्रीम कोर्ट से मामले की जांच करवाने की मांग की थी। रोचक तथ्य यह है कि  सुप्रीम  कोर्ट  ने जैन हवाला डायरीज मामले में एकदम अलग व्यवस्था दी थी। तब देष की शीर्ष  अदालत का कहना था कि जब कभी भी  शासकीय लोगों के खिलाफ अवैध  पैसा लेने के मामले सामने आते हैं, ऐसे मामलों की अविलंब  निष्पक्ष  जांच कराई जानी चाहिए। आयकर विभाग के छापों में बरामद सहारा डायरी के पन्नों में 2013-14 के दौरान छह माह के अंतराल में गुजरात के तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी समेत कई सियासी नेताओं को करोडों रु की घूस देने का दावा किया गया था। डायरी में दर्ज एंट्री में कहा गया था कि 30 अक्टूबर, 2013 और 29 नवंबर, 2013 के बीच चार बार  पैसे का लेनदेन हुआ था और डायरी में इनकी  स्पष्ट  एंट्रीज दर्ज थी।  डायरी में नरेद्र मोदी के अलावा मध्य प्रदेश  के मुख्यमंत्री  शिवराज सिंह चौहान, छत्तीसगढ के मुख्यमंत्री रमण सिंह और दिल्ली की पूर्व मुख्यमंत्री  शीला दीक्षित का भी नाम  दर्ज है। शीला दीक्षित का नाम आने से कांग्रेस के आक्रमण की बची-खुची  विश्वसनीयता   भी जाती रही है। सहारा डायरी की काफी हद तक 1996 की जैन हवाला डायरीज से अलौकिक समानता दिखती है। 1996 में हवाला कारोबारी जैन बंधु (सुरेद्र जैन और उनके भाई) की डायरीज  सीबीआई के हाथ लग गई थी और इन डायरियों में दर्ज एंटरीज के बाहर आने पर सियासी भूचाल आ गया था। जैन बंधुओं की डायरीज से खुलासा हुआ था कि हवाला कारोबारियों ने भाजपा के वरिष्ठ  नेता लाल कृश्ण आडवाणी, मदन लाल खुराना, कांग्रेस के  वरिष्ठ नेता  माधवराव सिंधिया, बलराम झाखड, वीसी  शुक्ला, पी   शिव शंकर और आरिफ मोहम्मद खां समेत कई नेताओं को अवैध रुप से पैसा दिया था। तब निचली अदालत ने सीबीआई को आरोपी सियासी नेताओं के खिलाफ मुकदमा दायर करने के निर्देश  दिए थे मगर ऊपरी अदालत ने इस फैसले को निरस्त कर दिया। बाद में मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा और  शीर्ष  अदालत ने व्यवस्था दी थी कि सार्वजनिक पदों पर आसीन लोगों से जुडे मामलों की हर हाल में जांच होनी ही चाहिए। मगर दो दशक बाद  सर्वोच्च न्यायालय  इस फैसले से इतफाक नहीं रखाा है। बहरहाल, सहारा डायरी मामले में सुप्रीम कोर्ट ने जो व्यवस्था दी है, उससे  शीर्ष  पदों पर आसीन लोगों को राहत मिली है। आरोप लगाना आसान है मगर उन्हें साबित करना बेहद  मुश्किल। निजी क्षेत्र की कंपनी की डायरी के पन्नों  को पुख्ता सबूत नहीं माना जा सकता। मगर लोकतंत्र का ही तकाजा है कि शीर्ष पदों  पर आसीन व्यक्तियों के दामन पर छींटें लगते है तो उन्हे  साफ किया जाना चाहिए।