उत्तर प्रदेश और पंजाब समेत पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव की बेला पर सुप्रीम कोर्ट द्धारा धर्म और जात-पात के नाम पर वोट मांगना प्रतिबंधित किए जाने से देश के राजनीतिक दलों की नींद उड गई है। भारत में राजनीतिक दल न केवल धर्म और जात-पात के नाम पर धडल्ले से वोट मांगते हैं, अलबत्ता उम्मीदवारों का चयन भी इसी आधार पर करते हैँ । कुछ राजनीतिक दलों का गठन ही जात-पात और धर्म के नाम पर हुआ है। सोमवार को सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में स्पष्ट व्यवस्था दी है कि कोई भी दल और प्रत्याशी धर्म, जाति और भाशा के नाम पर वोट मांगता है तो निर्वाचन आयोग उसका चुनाव अवैध घोषित कर सकता है। देश की शीर्ष अदालत ने यह भी स्पष्ट कर दिया है कि पार्टी या प्रत्याशी ही नहीं, उनके समर्थक नेता, एजेंट और धर्मिक नेता भी अगर ऐसा करते हैं, तो चुनाव गैर-कानूनी माना जाएगा। जन प्रतिनिधि कानून की धारा 123 (3) की व्याख्या करते हुए कोर्ट की संवैधानिक पीठ ने कहा है कि कानून में स्पष्ट व्यवस्था है कि धर्म अथवा जाति के नाम पर वोट नहीं मांगे जा सकते और इस स्थिति में निर्वाचन आयोग को चुनाव रद्द करने का पूरा हक है। जन प्रतिनिधि कानून की 1969 में भी कोर्ट ने व्याख्या की थी मगर तब यह व्यवस्था दी गई थी कि केवल उम्मीदवार अपनी जाति और ध्रर्म के नाम पर वोट नहीं मांग सकता। यानी उनके समर्थक और पार्टी ऐसा कर सकती है। राजनीतिक दलों ने इसका खूब फायदा उठाया। ताजा फैसले का दायरा काफी व्यापक किया गया है और अब चुनाव में धर्म और जाति के नाम पर वोट मांगने पर राजनीतिक दल सौ बार सोचेंगे। उम्मीदवार के समर्थक और प्रचार करने वाले नेता जाति और धर्म का खुलकर सहारा लेते रहे हैं। पंजाब में शिरोमणि अकाली दल तो सार्वजनिक तौर पर धर्म और राजनीति (पीरी और मीरी) का खुलेआम घालमेल करता है। अकाली दल के वयोवृ्रद्ध नेता और पंजाब के मुख्यमंत्री प्रकाश सिंह बादल ने हाल में फिर कहा था कि “सिखी में धर्म और राजनीति“ साथ-साथ चलती है। पंजाब के सियासी नेता इन दिनों धर्मिक गुरुओं का समर्थन लेने के लिए डेरों के चक्कर लगा रहे हैं। कांग्रेस उपाध्यक्ष ने कुछ दिन पहले अमृतसर के निकट ब्यास में स्थित राधा स्वामी डेरे में रात बिताई थी और इस प्रवास का मकसद राधा स्वामी भक्तों का समर्थन हासिल करना ही था। केन्द्र में सत्तारूढ भाजपा जाति और धर की आड में हर चुनाव में मतदाताओं का जाति और धर्म (हिंदु) के नाम पर ध्रुवीकरण करने में कोई कसर नहीं छोडती है। इस मामले में बहुजन समाज पार्टी सबसे आगे है। उसका वर्चस्व ही जाति पर टिका हुआ है। सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बावजूद सुश्री मायावती ने मंगलवार को लखनऊ की रैली में खुलकर धर्म और जाति के नाम पर वोट मांगे। भारत में उम्मीदवारों का चयन भी जाति और धर्म के आधार पर ही किया जाता है। सांसद ओवैसी की आल इंडिया मसलिस-ए-इतिहादुल मुसलमीन (एआईएमआईएम) का वजूद भी सांप्रदायिकता पर टिका है। ओवैसी किसी भी सार्वजनिक मंच से धर्म का इस्तेमाल करने से नहीं चुकते और खुद को मुसलमानों का सबसे बडा पैरवीकार बताते नहीं अघाते हैं। देश में जाति आधारित राजनीति की गहरी पैठ है और 80 फीसदी से भी ज्यादा उम्मीदवारों का जाति या धर्म के आधार पर चयन किया जाता है। पंजाब में शिरोमणि अकाली दल, कांग्रेस और आम आदमी पार्टी अब तक जितने भी उम्मीदवार विधान सभा चुनाव के लिए उतार चुके हैं, उनमेंसे 90 फीसदी जाति और धर्म के आधार पर चुने गए हैं। इन हालात में सुप्रीम कोर्ट के फैसले को लागू करना निर्वााचन आयोग के लिए आसान नहीं है। देश में सियासी नेता कानून का तोड निकालने में माहिर है।
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