यूनियन बजट पहली फरवरी को ही पेश किया जाएगा। पांच राज्यों में विधानसभा चुनावों के दृष्टिगत मतदाताओँ को लुभाने की आशंका के कारण सुप्रीम कोर्ट ने बजट को मतदान पूरा होने तक टालने की याचना को अस्वीकार कर दिया है। सोमवार को सुप्रीम कोर्ट ने व्यवस्था दी कि बजट को टालने का कोई औचित्य नहीं है। कोर्ट ने साथ में यह भी कहा है कि केंद्र सरकार इस बात को सुनिष्चिित करे कि बजट में मतदाताओं को लुभाने वाले फैसले न हों। सुप्रीम कोर्ट में दायर याचिका में कहा गया था कि एक फरवरी को पेश होने वाले बजट में मतदाताओं को लुभाने के लिए रियायतें दी जा सकती हैं। चार फरवरी से पांच विधानसभाओं के लिए वोट डालने की प्रकिया शुरु हो जाएगी और यह 8 मार्च तक चलेगी। चुनाव के कारण पांच राज्यों में आचार संहिता लागू है और निर्वाचन आयोग के दिशा -निर्देश अनुसार आचार संहिता लागू होने के बाद न तो केद्र और न ही संबंधित राज्य कोई भी नीतिगत फैसले ले सकता है और न ही ऐसी घोषणाएं कर सकते हैं जिनसे मतदाताओं को लुभाया जा सके। याचिका में इस स्थिति का उल्लेख करते हुए सुप्रीम कोर्ट से बजट को मतदान पूरा होने तक स्थगित करने की याचना की गई थी। सुप्रीम कोर्ट का कहना है कि केंद्र के बजट का राज्यों के चुनावों से कोई सरोकार नहीं है। पूरे साल चुनाव होते रहते हैं और इनसे केंद्र सरकार का कामकाज रुक नहीं सकता। कोर्ट ने आचार संहिता के उल्लघंन की दलील भी नहीं मानी। कोर्ट ने व्यवस्था दी है कि बजट एक फरवरी को ही पेश किया जाए। देश की सभी विपक्षी पार्टियां भी बजट को मतदान पूरा होने तक स्थगित करने की मांग कर रही है। विपक्षी दलों का कथन है कि चुनाव में लेवल प्लेइंग फील्ड तैयार करने के लिए जरुरी है कि चुनाव लडने वाले सभी प्रत्याषियों और राजनीतिक दलों को बराबर का मौका मिले। आचार संहिता के लागू रहने तक बजट को स्थगित करने के लिए विपक्षी दलों का डेलेगेशन पांच जनवरी को निर्वाचन आयोग से भी मिला था और आयोग को 2012 की मिसाल दी है। तब संप्रग सरकार ने भाजपा समेत विपक्षी दलों की मांग पर केन्द्रीय बजट 28 फरवरी की बजाय मतदान सपन्न होने के बाद 16 मार्च को पेश किया था। विपक्ष का कथन है कि अगर संप्रग सरकार विपक्ष की मांग को तवज्जो दे सकती है, तो मोदी सरकार क्यों नहीं? विपक्ष के इस कथन में काफी वजन है। निर्वाचन आयोग ने केबिनेट सचिवालय से 2012 को लेकर पूरी स्थिति का ब्यौरा मांगा है। आयोग ने सोमवार इस मामले में केंद्र सरकार से कहा है कि बजट में पांच राज्यों के लिए कोई नई स्कीम नहीं होनी चाहिए । देश में पहली बार एक फरवरी को बजट पेश हो रहा है। अब तक बजट को 28 फरवरी (माह के आखिरी दिन) को पेश करने की रिवायत थी। इसके अलावा मोदी सरकार ने 91 साल की परंपरा तोडते हुए रेल बजट को आम बजट में ही समाहित करने का फैसला लिया है। इस बार अलग से रेल बजट पेश नहीं होगा और यह आम बजट का ही हिस्सा होगा। बहरहाल, केन्द्रीय बजट तय समय पर ही पेश होना चाहिए। केन्द्रीय बजट में देश की आर्थिक-सामाजिक प्रगति का रोडमैप, जनाकांक्षाएं और विकास की दिशा और दशा झलकती है। विभिन्न राज्यों के आम बजट की अपेक्षा केन्द्रीय बजट का पूरे देश को बेसब्री से इंतजार रहता है। विदेश रक्षा, रेल यातायात, आयकर जैसे कई ऐसे विभाग हैं, जिन पर राज्यों का कोई अधिकार नहीं है। और इनसे जुडे बजट प्रावधानों पर सबकी नजर रहती है। इस बात को भी नकारा नहीं जा सकता है कि पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव के खातिर बाकी 24 राज्यों और सात केंद्र शासित क्षेत्रों की जनता को नियमित केन्द्रीय बजट से वंचित नहीं किया जा सकता ? बजट को राजनीति का विषय नहीं बनाया जाना चाहिए। सुप्रीम कोर्ट और चुनाव आयोग की व्यवस्था के बाद अब बजट पर राजनीति खत्म हो जानी चाहिए।
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