रविवार, 22 जनवरी 2017

Why Can't Govt Ensure Children Safety:

उत्तर प्रदेश  के एटा जिले  में वीरवार सुबह का दुखद स्कूली बस हादसा बताता है कि देश  में कायदे-कानून का कितना सम्मान किया जाता है।  देश  के भविष्य  को संवारने वाली शैक्षणिक संस्थाएं अगर नियमों का उल्लघंन करने लग जाएं, तो देश  कैसे चलेगा? एटा जिले के स्कूलों में सर्दी की छुट्टियां  थी और प्रशासन ने 20 जनवरी तक  जिले के सभी स्कूलों को बंद रखने के आदेश  दे रखे  थे। इसके बावजूद जेएम विद्यानिकेतन   नाम का स्कूल खुला था और दुर्घटनाग्रस्त बस सुबह कंपकंपाती ठंड में बच्चों को  स्कूल  ले जा रही थी। घने कोहरे में बस ट्रक से टकरा गई। इस हादसे में 12 बच्चों की दर्दनाक मौत हो गई और 30 से ज्यादा बच्चे बुुरी तरह से घायल हो गए। हैरानी इस बात की है कि 27 सीटर बस में 40 से ज्यादा बच्चे ठूंसे गए थे। प्रशासन ने स्कूल की मान्यता रदद करने के आदेश  दिए हैं।  और अक्सर यही होता है। सरकार तब जागती है जब हादसा हो जाता है।  आदेशों   के बावजूद स्कूल का खुला रहना  प्रशासन की सरासर लापरवाही उजागर करता है। प्रशासन के आदेशों की अनुपालना न करने वाले स्कूलों के खिलाफ फौरन कार्रवाई की जानी चाहिए। स्कूली बसों के लिए न केवल राज्यों की सरकारों ने,  अलबत्ता सुप्रीम कोर्ट ने भी  स्पष्ट  दिशा निर्देश  (गाइडलाइंस) जारी कर रखे हैं। इनके मुताबिक स्कूली बसों में ओवरलोडिंग तो कतई नहीं की जा सकती। इसके बावजूद भी पूरे देश  में स्कूली बसों और बच्चों को ढोने वाले विभिन्न वाहनों में  बच्चों को भेड-बकरियों की तरह ठूस कर ढोया जाता है। हर सुबह स्कूल खुलने से पहले और दोपहर को स्कूल बंद होने के बाद सडकों पर बच्चों से खचाखच भरे ऑटो-रिक्षा, रिक्षा अथवा बसों को देखा जा सकता है। पूरे देश  में  यही नजारा नजर आता है। मगर प्रशासन और पुलिस मूक  दर्शक   बना रहता है। इसके ठीक विपरीत उच्च शैक्षणिक सस्थाओं की बसों में न तो छात्रों को स्कूली बच्चों की तरह ठूंस- ठूंस कर भरा जाता है और न ही इनके चालक ओवर स्पीड से वाहनों को दौडाते हैं। यही वजह है कि उच्च षैक्षणिक संस्थाओं की बसों का सफर स्कूली बच्चों की बसों से कहीं ज्यादा सुरक्षित होता है। केन्द्रीय भूतल यातायात की रिपोर्ट के अनुसार 2015 के दौरान सडक दुर्घटनाओं में  2916 बच्चों की मौत के साथ  उत्तर प्रदेश  देश  में पहले स्थान पर था। इस हिसाब से राज्य में हर रोज 7 बच्चे सडक दुर्घटनाओं में मारे जाते हैं। यह चिंताजनक स्थिति है। फरवरी 2016 में चंडीगढ कमीशन पर प्रोटेक्शन ऑफ़  चाइल्ड राइटस द्वारा पंजाब एवं हरियाणा उच्च न्यायालय में दायर  रिपोर्ट में बताया गया था कि देश  के सबसे खूबसूरत शहर  चंडीगढ़ में 50 फीसदी से भी ज्यादा स्कूली बसें बच्चों के लिए सुरक्षित नहीं थी। कमीशन ने चंडीगढ स्कूलों की कुल 800 बसों मेंसे 600 का पैना निरीक्षण किया था। इस निरीक्षण में पाया गया था कि अधिकतर बसों में एमरजेंसी दरवाजा तक नहीं था जबकि ऐसा करना अनिवार्य  था। स्कूली बसों के पास न तो परमिट थे और न ही नियमानुसार बस स्टाफ की वेरीफिकेशन करवाई गई थी। पांच स्कूली बसो में गर्भ निरोधक विधियां बरामद हुई थी। अधिकतर बसों में जीपीएस सिस्टम भी नहीं थे जबकि नियमानुसार जीपीएस लगाना लाजिमी है। इस रिपोर्ट  पर उच्च न्यायालय ने स्कूलों को कडी फटकार लगाई थी। 2016 में प्रकाशित एक रिपोर्ट के अनुसार उत्तर प्रदेश  की राजधानी लखनऊ में स्कूल ट्रांसपोर्ट बच्चों के लिए सबसे ज्यादा असुरक्षित है। यह निष्कर्ष  तीन  दिन चले सुरक्षा अभियान के बाद निकाला गया था। बंगलौर में कुछ समय पहले स्कूली ट्रांसपोर्ट पर किए गए एक सर्वेक्षण का  निष्कर्ष  था कि सरकारी बसें स्कूली बच्चों के लिए निजी स्कूली बसों से कहीं ज्यादा सुरक्षित हैं मगर स्कूल सरकारी की बजाय निजी बसों को ज्यादा प्राथमिकता देते हैं। बहरहाल, बच्चे देश  का  भविष्य होते  हैं और इन्हें उज्ज्वल रखना हम सब का कर्तव्य है। इस मामले में पेरेंटस समेत सब को आगे आना चाहिए।