पांच राज्यों में विधानसभा चुनाव का बिगुल बज गया है। ठीक एक माह बाद 4 फरवरी को पंजाब और गोवा में वोट डाले जाएंगे। उत्तर प्रदेश में सात चरणों का मतदान होगा और यह 11 फरवरी से शुरु होकर 8 मार्च तक चलेगा। उत्तराखंड में 15 फरवरी को और पूर्वोतर राज्य मणिपुर की 60 सीटों के लिए 4 और 8 मार्च को वोट डाले जाएंगे। मतगणना 11 मार्च को होगी। इस तरह पंजाब और गोवा को मतदान के बाद चुनाव परिणाम के लिए लंबा ३४ दिन तक का इंतजार करना पडेगा। 2012 में भी पंजाब को चुनाव परिणाम के लिए लंबा इंतजार करना पडा था। तब 30 जनवरी को मतदान हुआ था और मतगणना 6 मार्च को हुई थी। चुनाव की घोषणा होते ही पांचों राज्यों में तत्काल प्रभाव से आचार संहिता लागू हो गई है। सोमवार को ही सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव में जाति, धर्म और भाषा के नाम पर वोट मागने पर प्रतिबंध लगा दिया था। पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव इस बात का गवाह भी बनेंगे कि राजनीतिक दल देश की सर्वोच्च अदालत के इस फैसले का कितना सम्मान करते हैं। देश का हर बडा-छोटा राजनीतिक दल अपने उम्मीदवारों का चयन ही जाति और धर्म के आधार करता है। हिंदू बहुल हलके में हिंदू और मुस्लिम बहुल में मुसलमान प्रत्याशी ही उतारा जाता है। लगभग हर राजनीतिक दल संप्रदाय के नाम पर चुनाव में मतदाताओं का ध्रुवीकरण कराने की फिराक में रहता है। पंजाब और गोवा में धर्म के नाम पर खुल कर वोट मांगे जाते हैं। गोवा में ईसाईयों की आबादी 25 फीसदी है और 66 फीसदी हिंदू हैं। इस राज्य में चुनाव हिंदू बनाम ईसाई के मुद्दों पर लडा जाता है। गोवा की महाराष्ट्रवादी गोमांतक पार्टी (एमजीपी) का वर्चस्व ही हिंदुत्व पर टिका है और अभी यह पार्टी भाजपा सरकार का समर्थन कर रही है। बुधवार को चुनाव की घोषणा होते ही एमजीपी ने अपना समर्थन वापस ले लिया। पार्टी का पुराना स्टैंड है कि आचार संहिता लागू होने के बाद सरकार का समर्थन नहीं किया जाना चाहिए। 1961 में पुर्तगाल के उपनिवेशवादी शासन से आजाद होने के बाद गोमांतक पार्टी हिंदू मतदाताओं का ध्रुवीकरण कराकर कांग्रेस को पछाड कर सता में आई और 1979 तक लगातार चुनाव जीती रही। भाजपा के गोवा के राजनीतिक परिदृ्श्य पर उभरने से गोवा में सबसे ज्यादा नुकसान एमजीपी को हुआ है। यही स्थिति पंजाब में है। पंजाब में शिरोमणि अकाली दल का वजूद ही धार्मिक मुद्दों (पंथक एजेंडा) पर टिका हुआ है। बृहद पंजाब को तोडकर पंजाबी सूबे का गठन करवाना भी अकालियों की इसी राजनीति का हिस्सा था। अकालियों के साथ-साथ पंजाब में भाजपा भी चुनाव में खुलकर धर्म और भाषा का सहारा लेती है। अकाली सिखों का प्रतिनिधित्व करते हैं और भाजपा हिंदुओं का। इसी बिला पर दोनों मिलकर चुनाव लडते हैॅ। बहरहाल, नोटबंदी के बाद पहली बार विधानसभा चुनाव हो रहे हैं। भाजपा इस बात से फूली नहीं समा रही है कि नोट्बंदी पर आम आदमी प्रधानमंत्री के साथ है। हाल ही में सपन्न चंडीगढ नगर निगम चुनाव में भाजपा को प्रचंड जनादेश मिला था । हालांकि चंडीगढ के चुनाव परिणाम पंजाब के ग्रामीण मतदाताओॅ के रूझान नहीं माने जा सकते मगर इस चुनाव से शहरी मतदाताओं के रुझान का कुछ हद तक पता चल जाता है। लोकसभा चुनाव के दौरान “मोदी लहर“ के बावजूद पंजाब के शहरी मतदाताओं ने भाजपा का साथ नहीं दिया था। शहरी मतदाता अकाली दल-भाजपा के “भ्रष्ट शासन” से खासे खफा थे। कांग्रेस की शहरी मतदाताओं पर नजर है और जब कभी भी शहरी मतदाताओं ने कांग्रेस का साथ दिया वह सत्ता में आई है। पंजाब के देहाती क्षेत्रों में किसानों का दबदबा है। नोटबंदी के किसान खासा परेशान हुआ है। पांच राज्य के चुनाव में यह पूरी तरह से साफ हो जाएगी कि नोटबंदी से देश का जनमानस कितना संतुष्ट है या खफा।
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