मंगलवार, 10 जनवरी 2017

ये अडंगे क्यों

सरकार को नोटबंदी के बाद से देश  को  कैशलैस बनाने की जितनी जल्दी है, बैंकों की मुनाफाखोरी की लत इस पर उतनी ही तेजी से  पानी फेर रही है। डिजिटल इंडिया में आधुनिक साहूकारों (बैंकों) को भारत के विशाल मध्यम तबकों से मुनाफा कमाने का स्वर्णिम अवसर नजर आ रहा है। वस्तुतः, उदारीकरण पर फल -फूल रही पूंजीवाद व्यवस्था में भी बैंक  अगर मोटा मुनाफा नहीं कमा पाएं, तो उन्हें ऐसा मौका दोबारा नहीं मिलेगा। इसी मौके का फायदा उठाते हुए बैंकों ने नोटबंदी के कारण उपजे संकट के समय कार्ड स्वाइप पर ट्रांसजेक्शन  चार्जेज लेने  शुरु कर दिए हैं जबकि सरकार ने फिलहाल किसी भी तरह के  शुल्क लेने से बैंकों को सख्त मना कर रखा है। बैंकों की इस मनमानी से क्षुब्ध देश  भर के पेट्रोल फीलिंग पंपों ने पहले तो रविवार रात से कार्ड स्वाइप करके फ्यूल बेचने पर मना कर दिया। सरकार के समझाने-बुझाने पर जैसे-तैसे डीलर्स नरम पडे और 13 जनवरी तक कार्ड स्वाइप की सुविधा जारी रखने पर मान गए। अब ताजा सूचना है कि सरकार ने डीलरों को कार्ड स्वाइप से पेट्रोल-डीजल की बिक्री बदस्तूर जारी रखने पर मना लिया है। डिजिटल पेमेंट से पेट्रोल पंपों पर पहले भी फ्यूल खरीदा जाता था और इस तरह की ट्रांसजेक्शन  पर कोई  शुल्क नहीं लगाया जाता था। इसके विपरीत कई बैंक ग्राहकों को डिजिटल पेमेंट से फ्यूल खरीदने के लिए तरह-तरह के प्रभोलन देते थे मगर नोटबंदी के बाद से बैकों के मुंह पर पानी आ गया है। अर्थव्यवस्था को कैशलैस बनाने के लिए सरकार को सबसे पहले उन सभी बाधाओं को दूर करना होगा, जो डिजिटल लेनदेन को हत्तोसाहित करती हैं। और सबसे बडी बाधा देश  में सदियो से जारी नगदी लेनदेन का प्रचलन है। देश  में अभी भी मात्र 5 फीसदी लोग डिजिटेल पेमेंट करते हैं और 95 फीसदी लोग, जिनके पास एटीएम कार्ड  है, अपने कार्ड  को एटीएम से नगदी निकालने के लिए प्रयोग करते हैं। देश  की 45 फीसदी आबादी असंगठित है और इस तबके का बैंक खाता तक नहीं है। इनका सारा लेनदेन नगदी पर चलता है। आंकडें यह भी बताते हैं कि देश  में कुल मिलाकर 3.85 करोड के करीब छोटे और सीमांत कारोबारी हैं और 21,000 के करीब असंगठित मंडियां। इन सब में सारा कारोबार कैश  में चलता है। और आंकडों से ही पता चलता है कि फास्ट मूविंग कंज्युमर गुडस (एफएमसीजी) की 93 फीसदी बिक्री  करियाना स्टोर्स  के मार्फत की जाती है और अधिकांश  लेनदेन कैश  में किया जाता है। किसानों को मंडियों में उपज के दाम भी नगदी में मिलते हैं और बीज-खाद भी नगदी में खरीदी जाती है। इन हालात में देश  को कैशलैस बनाने में अगर एक सदी नहीं तो कई साल अवश्य  लग सकते है। अगर बैंक इसी तरह हर ट्रांस्जेक्शन  पर  शुल्क लगाना  शुरु कर देंगे तो भला लोग डिजीटल पेमेंट की ओर क्यों कर जाएंगे। देहातों में बनिया भी बगैर  शुल्क के उधार में सामान बेचता है। बैंकिंग व्यवस्था को चॉक-चौबंद करने के अलावा सरकार को लोगों की पुलिसिंग का काम भी बंद करना होगा। नोटबंदी के बाद से देश  में वित्तीय आपातकाल जैसा माहौल है। लोग-बाग अब बैंको में पैसा जमा करने से भी डर रहे है। आयकर विभाग की ताजा कवायद से डर का माहौल और बढा है। आयकर विभाग ने बैंकों से अप्रैल, 2016 से 8 नवंबर तक बचत खातों में जमा नगदी की सारी जानकारी तलब की है। देश  के विभिन्न बैंकों में 44 करोड बैंक खाते हैं। इन खातों को खंगालना आसान नही है। नोटबंदी से देश  को कितना फायदा हुआ, यह चर्चा का विषय  हो सकता है मगर मौजूदा स्थिति में लोगों का बैंकिंग व्यवस्था पर से भरोसा उठ सकता है। डिजिटल इंडिया के लिए यह बात कतई  शुभ नहीं है।