आजादी के बाद पंजाब में चरखे को लेकर एक लोकगीत लंबे समय तक घर-घर गाया जाता था। इस लोकगीत के बोल हैं “ दे चरखे नू गेढ, लोड नहीं तोप दी”, तेरे बम नू चलने नहीं देना गांधी दे चरखे ने“। साढा देश आजाद कराया, गांधी दे चरखे ने“। इस गीत से महात्मा गांधी और उनके चरखे की सार्वभौमिक महता का पता चलता है। चरखा स्वतंत्रता आंदोलन में देश भक्ति और स्वदेशी आंदोलन का प्रतीक था। इसमें महात्मा गांधी का सामाजिक और आर्थिक दर्शन निहित है। और चरखा आज भी भारत के करोडों कामगारों, शिल्पकारों और बुनकरों की आकांक्षाओं का प्रतीक है। मगर इस बार भाजपा और मोदी सरकार ने महात्मा गांधी और उनके चरखे को ही विवाद का विषय बना दिया है। खादी एवं ग्रामोद्योग आयोग के कैलेंडर और डायरी से राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की जगह चरखा कातते हुए प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की फोटो लगाकर महात्मा गांधी की तोहीन की गई है। सोशल मीडिया पर इसकी जमकर आलोचना हो रही है। महात्मा गांधी की जगह कोई नहीं ले सकता। और ट्वीटर पर यह प्रतिक्रिया एकदम सामयिक और प्रासंगिक है कि कैलेंडर में चरखा कातने से प्रधान मंत्री नरेन्द्र मोदी महात्मा गांधी नहीं बन सकते। इस मामले में विवाद बढते देख भाजपा और केन्द्र सरकार ने स्पष्टीकरण दिया है कि खादी एवं ग्रामोद्योग आयोग के कैलेंडर और डायरी में महात्मा गांधी की ही फोटो हो, ऐसा कोई नियम नहीं है। 1996, 2002, 2005, 2011, 2012 एवं 2013 में भी खादी एवं ग्रामोद्योग आयोग के कैलेंडर में महात्मा गांधी की फोटो नहीं थी। मगर कहते हैं दो गलतियां मिलकर भी सही नहीं हो सकती। भाजपा का स्पष्टीकरण है कि प्रधानमंत्री मोदी युवाओं के आदर्श हैं और प्रधानमंत्री द्वारा खादी को लोकप्रिय बनाने से इसकी बिक्री में पिछले दो साल में 34 फीसदी का इजाफा हुआ है। कांग्रेस के 50 साल के शासन में खादी उत्पाद 2 से 5 फीसदी तक सीमित थी। भाजपा के इस कथन ने जले पर नमक छिडकने का काम किया है। महात्मा गांधी खादी के ब्रांड एबैसडर नहीं है कि और न ही खादी एवं ग्रमोद्योग आयोग आब तक बिक्री बढाने के लिए चरखा कातते हुए उनकी फोटो का इस्तेमाल करता रहा है। देश के प्रधानमंत्री को भी खादी की बिक्री बढाने के लिए ब्रॉड एम्बैसडर नहीं बनाया जाना चाहिए। महात्मा गांधी ने चरखे के महत्व पर प्रकाश डालते हुए कहा था “ चरखे का मत्हव इसके कातने तक ही सीमित नहीं है। कातना तपस्या है और इसमें सादगी, आत्म-निर्भरता, आपसी प्रेम और मानवीयता निहित है। यह अमीर और गरीब, पूंजी और श्रम के बीच सेतु का काम करता है“। चरखे और खादी उत्पाद की प्रांसगिकता आज भी वही है जो आजादी से पहले थी। गांधी जी के पोते तुषार गांधी ने प्रधानमंत्री पर तंज कसते हुए कहा है कि “ तस्वीर पर चरखा कातने से मोदी महात्मा गांधी नहीं बन सकते। बापू खुद के वस्त्र भी चरखे से कातते और उन्हें ही पहनते । मोदी न तो नियमित रुप से चरखा कातते हैं और न ही अपने काते हुए वस्त्र पहनते हैं। विपक्ष का सवाल है कि इस स्थिति में खादी एवं ग्रामोद्योग आयोग के कैंलेडर में प्रधानमंत्री मोदी को चरखा कातते हुए दिखाने का क्या अभिप्राय है़? बहरहाल, भाजपा प्रवक्ता सविता पात्रा ने स्पष्ट किया है “ गांधी जी की जगह कोई नहीं ले सकता और कोई भी उनके बारे ऐसा नहीं सोच रहा है। वो हमारे दिल में है और हमारे कामों में उनके आदर्श दिखते हैं“। इससे देश को आश्वस्त हो जाना चहिए। मगर कांग्रेस इस मामले को ऐसे उछाल रही है जैसे महात्मा गांधी और चरखे पर केवल उसकी बपौती हो। कांग्रेस का आरोप है कि आरएसएस ने पहले महात्मा गांधी और उनके विचारों को मारा और अब भाजपा चरखा और महात्मा पर मोदी को लगाकर राष्ट्रपिता का नामोनिशान को मिटाना चाहती है।
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