बुधवार, 25 जनवरी 2017

बैंकिंग स्कैम बनाम एनपीए

विजय माल्या की किंगफिशर एयरलाइंस को कर्जा देने में गडबड-घोटाले के लिए सरकारी बैंक आईडीबीआई के पूर्व चेयरमैन समेत आठ लोगों की गिरफ्तारी से देश में  भ्रष्ट   बैंकिंग व्यवस्था का भांडा फूटा है।  आईडीबीआई बैंक और किंगफिशर के बीच 950 करोड के फर्जी ऋण लेनदेन को लेकर सीबीआई ने यह कार्रवाई की है। आईडीबीआई के पूर्व चेयरमैन के अलावा बैंक के तीन पूर्व  सीनियर  अधिकारियों को भी गिरफ्तार किया गया है। इन सब से सीबीआई ने कडी पूछताछ की थी। बंद पडी किंगफिशर एयरलाइंस के पूर्व  चीफ फाइनेषियल ऑफिसर समेत चार पूर्व अधिकारियों को भी सीबीआई ने हिरासत में लिया है। विभिन्न बैंकों को किंगफिशर के मालिक विजय माल्या से 9000 करोड रु के ऋण की वसूली करनी है। बंगलुरु स्थित  कर्जा  वसूली प्राधिकरण (डैट रिक्वरी ट्रिब्यूनल) ने गत 19 जनवरी को स्टैट बैंक की अगुआई वाले कंसर्टोरियम को अपने 6203 करोड रु का ऋण 11 फीसदी ब्याज समेत विजय माल्या और उनकी कंपनियों की चल-अचल संपतियां बेचकर वसूलने के लिए अधिकृत किया था। इसके बाद सीबीआई ने अपनी कार्रवाई  की। इस पूरे लेनदेन में आईडीबीआई के तत्कालीन चैयरमैन की भी सक्रिय भूमिका रही है। किंगफिशर को आईडीबीआई ने 2009 में जब 950 करोड रु का ऋण दिया था, तब तक कंपनी का दिवाला निकल  चुका था। 2009 में किगफिशर ने 1600 करोड रु का  शुद्ध घाटा दिखाया था। रेड बैंलेस  शीट के बावजूद आईडीबीआई  द्धारा  किंगफिशर को 950 करोड रु का कर्जा  देना  साफ  बताता है कि “पूरी की पूरी दाल काली थी“। बैंकों के ऋण मानदंडों के अनुसार जिस कंपनी की बैंलेस  शीट  रेड हो, उसे कर्जा  नहीं दिया जाता। इतने बडे ऋण के लिए उम्दा क्रेडिट रेंटिंग की दरकार होती है और 2009 में किंगफिशर की क्रेडिट रेटिंग काफी कम थी। जाहिर है इस मामले में भारी गडबड-घोटाला हुआ है। सीबीआई को लगता है कि विजय माल्या  ने 950 करोड रु के ऋण को किंगफिशर को घाटे से उभारने की बजाय निजी उपयोग के लिए इस्तेमाल किया था। और इस फर्जी ऋण मामले में आईडीबीआई के अधिकारियों की मुठ्ठी भी गर्म  की गई थी। यह सच्चाई जगजाहिर है कि बगैर घूस लिए समकालीन भारत में अपना  रिश्तेदार  भी काम नहीं करता है। बहरहाल, आईडीबीआई प्रकरण  बेंकों में फैले व्यापक  भरष्टाचार  समुद्र में एक पानी की बूंद के बराबर है। नॉन-वाइबल (जिनके चलने की कोई उम्मीद नहीं) प्रोजेक्टस को घूस लेकर ऋण देते-देते देश  के कई सरकारी बैंक  दिवाला होने की कगार पर हैं।  सितंबर 2008 में बैंकों की 53,917 करोड रु की एनपीए बढते-बढते सितंबर, 2015 तक 3,41,641 करोड रु तक पहुंच गई थी। और 31 मार्च, 2016 तक देश  में बैकों की गैर निष्पादित  संपत्तियां  (एनपीए) 5,94,929 करोड रु का आंकडा पार कर चुकी थी। और 90 फीसदी एनपीए सरकारी बैंकों से संबधित है। महज तीन माह में बैंकों की एनपीए में दो लाख करोड रु की वृद्धि हैरतअंगेज है जबकि आरबीआई ने बैंकों को ऋण उगाही में तेजी लाने को कहा था। आरबीआई ने बेंकों को मार्च 2017 तक तमाम एनपीए को क्लीयर करने का लक्ष्य दे रखा है। मगर एनपीए को जीरो करना तो दूर, बैंकों की  गैर  निष्पादित  संपत्तियां उत्तरोतर बढती ही जा रही हैं। स्मरण रहे कि 2008 से 2012 के बीच अमेरिका में अत्याधिक एनपीए के कारण 446 छोटे-बडे बैंक बंद कर दिए गए थे। इस बात में कोई वजन नहीं है कि एनपीए बैंकों के कमजोर वित्तीय आधार का  ध्योतक  नहीं है। अंतरराष्ट्रीय  रेटिंग एजेंसी मूडी का आकलन है कि एनपीए के कारण भारतीय बैंको का केपिटल बेस कमजोर हुआ है और इसे सुधारने की जरुरत है। मगर जब तक बैंकों को  भ्रष्ट  व्यवस्था से मुक्त नहीं किया जाता, इसमें सुधार की कोई गुजाइंश  नहीं है। आईडीबीआई बैंक में माल्या स्कैम इस बात का ताजा प्रमाण है।