उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव समाजवादी पार्टी और उसके चुनाव चिंह साइकिल को अपने पक्ष में कर लेने के बाद अब बिहार की तरह “ महागठबंधन“ बनाने में जुट गए हैं। कांग्रेस अखिलेश के महागठबंधन“ में शामिल हो भी गई है मगर अजित सिंह का राष्ट्रीय लोक दल भी इसमें आते-आते पीछे हट गया है। समाजवादी पार्टी की टूट से चिंतित युवा मुख्यमंत्री कांग्रेस और राष्ट्रीय लोक दल के अलावा नीतिश कुमार की जनता दल (यू), शरद पवार की राष्ट्रीय कांग्रेस पार्टी (राकांपा), तृणमूल कांग्रेस और पीस पार्टी जैसे राजनीतिक दलों को भी अपने “महागबंधन“ में शामिल करना चाहते है। इन दलों का उत्तर प्रदेश में कोई जनाधार नहीं है और इन दलों को दो-एक सीट देकर आसानी से मनाया जा सकता है। पर अगर नीतिश कुमार, ममता बनर्जी और शरद पवार जैसे बडे नेता “महागबंधन“ के लिए प्रचार करते हैं , तो चुनावी बयार अखिलेष के पक्ष में बह सकती हैं। अभी सीटों के बंटवारे को अंतिम रुप देना बाकी है। मुख्य समस्या कांग्रेस को लेकर है। कांग्रेस को 80 से 90 सीटें दी जा सकती है और पार्टी इस पर मान भी जाएगी। कांग्रेस के लिए यह चुनाव जीवन-मरण का प्रश्न है। अखिलेश राष्ट्रीय लोक दल को ज्यादा-से-ज्यादा 20 सीटें देना चाहते हैं मगर अजित सिंह इतने पर तैयार नहीं थे । तथापि, सच यह हे की अखिलेश कूड़ा ही अजित सिंह से चुनावी गठबंधन से पीछे हट । समाजवादी पार्टी के 224 मौजूदा विधायक और 2012 के विधानसभा चुनाव में दूसरे स्थान पर रहने वाले 90 उम्मीदवारों को भी एडजस्ट करना है। इस स्थिति में रास्ता यह निकाला गया है कि 15 से 20 सपा उम्मीदवार कांग्रेस के टिकट पर लड सकते हैं। बिहार जैसा महागठबंधन बनाकर अखिलेश भाजपा को ठीक वैसी ही चुनौती देना चाहते हैं, जैसे नीतिश कुमार ने बिहार विधानसभा चुनाव में प्रधानमंत्री नरन्द्र मोदी की लोकप्रियता को दी थी। लोकसभा चुनाव की “मोदी लहर“ बिहार विधान सभा चुनाव तक लुप्तप्राय हो चुकी थी। नीतिश , लालू प्रसाद यादव और कांग्रेस के एक मंच पर आने से बिहार में गठबंधन कामयाब रहा था। तथापि अखिलेश के लिए सबसे बडी चूनौती यह है कि चुनाव सिर पर हैं और अभी गठ्बंधन की पूरी रुपरेखा भी तैयार नहीं है। भाजपा और बहुजन समाज पार्टी का राज्य में सांगठनिक ढांचा खासा मजबूत है। भाजपा के पास पार्टी के अलावा राष्ट्रीय स्वंय सेवक का समर्पित सांगठनिक समर्थन अलग से है। अखिलेश यादव के पास इतना समय नहीं है कि वे महागठबंधन को जमीनी स्तर तक ले जाए। वुनाव जीतने के लिए कार्यकर्ताओं के बीच तगडे समन्वय की दरकार होती है। बीस दिन में अखिलेश महागठबंधन के बीच यह समन्वय स्थापित कर पाएंगे, इस पर संदेह है। महागठबंधन बनाना जितना चुनौतीपूर्ण है, उसे सफल बनाना उसे कहीं ज्यादा कठिन । अखिलेश के लिए इस समय बिहार की तरह महागठबंधन को कामयाब बनाना बहुत बडी चुनौती है। बिहार की स्थिति उत्तर प्रदेष से काफी भिन्न थी। बिहार में विधानसभा चुनाव से चार माह पहले “महागठबंधन“ बन चुका था और सभी घटकों में सीटों का बंटवारा भी हो चुका था। इस स्थिति के चलते वहां कार्यकर्ताओं में चुनाव तक माकूल समन्वय भी स्थापित हो चुका था। महागठबंधन की पहली रैली में लालू यादव की पार्टी के कार्यकर्ताओं से पूछा गया था कि अगर उनकी पार्टी की सीट जनता दल (यू) को चली गई तो वे क्या करेंगे़? इस पर राजद कार्यकर्ताओं का जबाव था कि जिसको भी टिकट मिलेगा सभी उसके लिए पूरे मन से प्रचार करेगे। उत्तर प्रदेश में इस तरह का समन्वय संभव नहीं लगता है। पश्चिम उत्तर प्रदेश में जाटों और मुसलमानों के बीच साम्प्रदायिक मनमुटाव जगजाहिर है। राष्ट्रीय लोकदल का जाटों में खासा जनाधार है और समाजवादी पार्टी का मुसलमानों में। इसी सच्चाई के कारण अखिलेश को अजित सिंह का साथ लेने से पीछे हटना पड़ा। महागठबंधन में और भी कई विसंगतिया है और इन्हें दूर करना आसान नहीं है। इस स्थिति के मद्देनजर उत्तर प्रदेष में महागठबंधन के जमीनी स्तर पर सफल होने के आसार कम ही नहर आ रहे हैं।
शुक्रवार, 20 जनवरी 2017
Akhilesh Yadav No Nitish Kuman, Can't Repeat Bihar "Grand Alliance"
Posted on 8:59 pm by mnfaindia.blogspot.com/






