हतोऊत्साहित अमेरिका के लोकप्रिय राजनीतिक थ्रिलर “हाउस ऑफ कार्डस“ का एक प्रचलित फिकरा है,“ दाहिने से हाथ मिलाओ मगर बाएं में हथियार रखो ( शेक विथ युअर राइट हैंड, बट होल्ड ए रॉक विथ लेफ्ट)। उत्तर प्रदेश की समाजवादी पार्टी में पुत्र द्धारा पिता के तख्त पलट पर यह फिकरा एकदम सटीक बैठता है। एक दिन पिता मुलायम सिंह यादव अपने पुत्र मुख्यमंत्री अखिलेश यादव को पार्टी से निकाल देते हैं। अगले ही दिन बाप-बेटे के बीच सुलह होती है और अखिलेश का निष्कासन रदद कर दिया जाता है मगर तभी एंटी-क्लाइमेक्सः पुत्र अखिलेश यादव पिता मुलायम सिंह को पार्टी अध्यक्ष पद से हटा कर खुद पार्टी अध्यक्ष बन जाते हैं। बालीवुड मसाला फिल्म के लिए यह उम्दा स्क्रिप्ट है। हिंदुस्तान की राजनीति में ऐसे कई रोचक किस्से दर्ज हैं मगर समाजवादी पार्टी की ताजा नौटंकी कई मायनों में विलक्षण है। अखिलेश ने सैनिक स्कूल में पढाई की है, इसलिए उनसे कडे अनुशासन की उम्मीद की जाती है मगर इस बार उन्होंने परिवार का अनुशासन तोडा है। पिता और अपने राजनीतिक गुरु का तख्त पलट करके राजनीति में नया अध्याय लिखा है। मुलायम सिंह ने “पुत्र मोह“ को छोडकर लक्ष्मण का साथ दिया। राजनीति में ऐसी मिसाल नहीं मिलती। मुलायम सिंह को राजनीति कौशल का लंबा-चौडा अनुभव है। उन्होंने ने कई राजनीतिक फ्रंट बनाए और गिराए भी। तीन बार उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री रह चुके हैं और एक बार देश के रक्षा मंत्री (1996-98)। प्रधानमंत्री बनने की दिल्ली ख्वाहिश है और इसी मकसद से उत्तर प्रदेश को अपने पुत्र अखिलेश के सुपुर्द करके खुद राष्ट्रीय राजनीति में पूरी तरह से जुट गए। अखाडे के पहलवान भी रह-चुके है और दंगल का हर दांव बखूबी जानते हैं। फिर भी पुत्र ने पिता को राजनीतिक दंगल में ऐसी पटखनी दी कि विरोधियों की सिट्टी-पिट्टी गुम हो गई। अखिलेश यादव को राजनीति में आए ज्यादा समय नहीं हुआ है और उनके पिता ही उनके राजनीतिक गुरु हैं। उन्होंने राजनीति के सारे दांव-पेंच पिता से सीखे हैं। पिता मुलायम सिंह ने उन्हें मुख्यमंत्री तो बना दिया मगर स्वतंत्र रुप से काम नहीं कर दिया। अखिलेश को सचिव तक को बदलने अथवा नियुक्त करने की आजादी नहीं थी। पिता बात-बात पर टोकते और सार्वजनिक मंच पर भी जलील करते। बेचारे अखिलेश खून का घूंट पीकर रह जाते। चाचा शिवपाल यादव मुलायम के मुखबिर की तरह काम करते और मुख्यमंत्री के हर कदम पर पैनी नजर रखते। 2014 के लोकसभा चुनाव में समाजवादी पार्टी की शर्मनाक हार ने मुख्यमंत्री की स्थिति को और भी दयनीय बना दिया। मगर कहावत है,“ गुरु गुड, चेला शक्कर“। अखिलेश यादव ने यह साबित कर दिया है। बार-बार अपमानित किए जाने से आजिज आकर अखिलेश ने विधायकों और संगठन पर अपनी मजबूत पकड बनाई। माफिया डॉन मुख्तार अंसारी जैसे आपराधिक तत्वों का समाजवादी पार्टी में विलय का मुखर विरोध करके और गुडें-मव्वालियों से दूरी बनाकर अखिलेश युवाओं के हीरो बन गए। पार्टी के अधिकांश कार्यकर्ता भी युवा हैं। इसलिए अखिलेश युवाओं के चहेते बन गए। लोकसभा चुनाव के बाद से अखिलेश ने राज्य में विकास की गंगा बहाने की हरचंद कोशिश की। ताजा सर्वेक्षण भी यह कहते हैं कि राज्य की जनता अखिलेश को बतौर मुख्यमंत्री प्रतिद्धद्धियों से कहीं ज्यादा लोकप्रिय मानती है। तथापि उनके मार्ग में कई बाधाएं हैं। राज्य में विधानसभा चुनाव की तिथियां घोशित हो चुकी हैं। 11 फरवरी से 403 सीटों के लिए 7 चरणों में मतदान होना है। और अभी अखिलेश के पास पार्टी का चुनाव चिंह तक नहीं है। अगर इस पर दोनों पक्षों में खींचतान जारी रहती है तो चुनाव चिंह जब्त हो सकता है। राजनीति में कुछ भी स्थायी नहीं होता। न कोई स्थायी मित्र और न ही दुश्मन । अभी भी बाप-बेटे में सुलह की कोशिशें जारी हैं। चुनाव के मद्देनजर अखिलेश के लिए अपने पिता का आशीर्वाद लेकर चलना ही बेहतर रहेगा। समाजवादियों के वोट विभाजित होने से विरोधियों को ही फायदा होगा।
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