सोमवार, 2 जनवरी 2017

Goodbye 2016: A year We Can't Forget

वर्ष  2016  पूरी दुनिया में भुलाए नहीं भुलाया जा सकेगा। इसलिए नहीं कि 2016 अब तक का सबसे गर्म वर्ष  था। और इसलिए भी नहीं कि 2016 में एक जमाने में पूरी दुनिया पर राज करने वाले ब्रिटेन ने यूरोपियन यूनियन छोडने का ऐतिहासिक फैसला लिया और इस वजह तत्कालीन प्रधानमंत्री डेविड कैमरुन को इस्तीफा देना पडा। और न ही यह वर्ष  अमेरिका के अरबपति कारोबारी और राजनीति में नौसिखिया माने जाते रहे डोनाल्ड ट्रंप की  प्रेजिडेंट  पद चुनाव में अभूतपूर्व जीत के लिए युगों तक याद रखा जाएगा। दुनिया में  इस तरह की विशेष  घटनाएं साल-दर-साल होती रहती है। मगर एक अदना सा आतंकी संगठन पृथ्वी के ताकतवर देशों  में भी दहशत फैलाए, ऐसी मिसाल इतिहास में नहीं मिलती है। वर्ष  2016 इस्लामिक स्टेट के खूंखार और अमानवीय आतंक के लिए इतिहास में दर्ज रहेगा। न्यूयार्क टाइम्स की रिपोर्ट के अनुसार सीरिया और इराक के बाहर ही इस्लामिक स्टेट के आतंकी हमलों में  पिछले साल (2016 ) 1200 से ज्यादा लोग मारे गए  और इनमें अधिकतर पश्चिम  देशों   के लोग  शामिल है। चार जनवरी, 2016 से लीबिया से  शुरु हुआ हत्याओं का सिलसिला ववर्षांत  तक बदस्तूर जारी है। जुलाई में फ्रांस के नाइस शहर में आईएस आतंकियों ने ट्रक को भीड पर चढाकर 86 निर्दोष  लोगों को मार डाला और इस हमले में 434 से ज्यादा घायल हो गए थे। मार्च में बेल्जियम और यूरोपियन यूनियन की राजधानी ब्रिसेल्स  में इस्लामिक स्टेट आतंकियों के हमलों में 32 निर्दोष  लोग मारे गए थे। यूएस टुडे की रिपोर्ट के अनुसार  2016 में हर रोज एक से ज्यादा आतंकी हमले होते रहे है। आतंकियों से हर छोटा-बडा डरा हुआ है और इसके खिलाफ एकजुट होने की बातें करता है मगर अमल में कुछ नहीं किया जाता। संभवतय, इसी वजह अमेरिका के मशहूर विचारक नॉम चौमस्की का कहना है कि “ हर कोई आतंक को रोकने के लिए चिंतित है, ठीक है। बहुत ही आसान तरीका है, इसमें भाग लेना बंद करो“ मगर मानवता के दुश्मन  आंकियों से ऐसी कतई उम्मीद नहीं की जा सकती। 2016 में भारत को आतंक का भारी खामियाजा भुगतना पडा है। इस साल की  शुरुआत ही पठानकोट  हमले से हुई। इस बीच हिजबुल के आतंकी कमांडर बुरहान वानी के मारे जाने और उडी हमले के बाद भाातीय सेना की सर्जिकल स्ट्राइक से पाकिस्तान कुछ सहमा तो सही मगर  कश्मीर  घाटी में आतंक का तांडव पुरे साल जारी रहा। आतंक के अलावा वर्ष  2016  नोटबंदी और इससे उपजे नगदी संकट के लिए भी जाना जाएगा। दुनिया में  शायद ही ऐसी मिसाल मिलती है कि अपने ही पैसा लेने के लोगों को कतार में खडे-खडे अपने प्राण गंवाने पडे। और देश  में पहली बार ऐसा हुआ है कि  लोगों को  बैंकों से  अपना पैसा निकालने के लिए भी तरसना पडे। राजनीतिक फ्रंट पर साल के अंत में दो ऐसी विलक्षण घटनाएं हुईं है जो अपने आप में अद्धितीय है। 30 दिसंबर को दो राज्यों के मुख्यमंत्रियों को उनकी ही पार्टी ने बाहर का रास्ता दिखा दिया। देश  के सबसे बडे राज्य उत्तर प्रदेश  के मुख्यमंत्री अखिलेश  तादव को उनके पिता और समाजवादी पार्टी के प्रमुख मुलायम सिंह ने पार्टी से छह साल के लिए निकाल दिया । पूर्वोतर राज्य अरुणाचल प्रदेश  के मुख्यमंत्री पेमा खांडू को भी उनकी पीपल्स पार्टी ने निष्कासित करा दिया।  पेमा खांडू पहले कांग्रेस मे थे मगर फिर 42 विधायकों के साथ बगावत करके भाजपा के सहयोग से मुख्यमंत्री बने थे। अरुणाचल प्रदेश दल-बदल की राजनीति के लिए जाना जाता है। उत्तर प्रदेश  में अखिलेश  यादव के निष्कासन   से समाजवादी पार्टी करीब-करीब दोफाड हो चुकी है। सत्ता के लिए बेटे का बाप  अथवा बाप के बेटे से बागी हो जाना समकालीन भारतीय राजनीति के पतन की पराकाष्ठा  दर्शाता  है।