गुरुवार, 12 जनवरी 2017

Adverse Impact Of Demonetization Clearly Visible Now

नोटबंदी के दुष्परिणाम  अब सामने आने लग पडे हैं। सरकार के बडे-बडे दावों के बावजूद  जमीनी  सच्चाई यह  है कि नोटबंदी से अर्थव्यवस्था को तगडा झटका लगा है। ऑटोमोबाइल सेक्टर में  दिसंबर माह में वाहनों की बिक्री में पिछले 16 साल की सबसे बडी गिरावट दर्ज हुई है। हाउसिंग सेक्टर का तो और भी बुरा हाल  है। नोटबंदी से अक्टूबर-दिसंबर तिमाही में देश  के 8 बडे शहरों में हाउसिंग की मांग में 44 फीसदी की गिरावट दर्ज हुई है। दिल्ली-नेशनल केपिटल रीजन (एनसीआर) को सबसे ज्यादा नुकसान झेलना पडा है। और-तो-और  हाउसिंग सेक्टर में बिंदास माने जाने वाला बगलुरु भी इस मंदी से बच नहीं पाया है। दिसंबर में फैक्ट्री उत्पादन में भी खासी गिरावट आई है। सर्विस सेक्टर भी सिकुडा है।  बुधवार को  विश्व  बैंक ने भारत की 2016-17 की ग्रोथ रेट को 7.6 फीसदी से घटाकर 7 फीसदी तय की है। हालांकि यह ग्रोथ रेट चीन  के ग्रोथ रेट से थोडी ज्यादा मगर कुछ अंतरराष्ट्रीय एजेंसीज  का आकलन है कि अगर हालात नहीं सुधरे तो अगली तिमाही (जनवरी-मार्च) के परिणाम आने पर ग्रोथ  और भी गिर सकती है और इसके साढे छह फीसदी से कम हो सकती है। पूर्व प्रधानमंत्री डाक्टर मनमोहन सिंह पहले ही कह चुके हैं कि नोटबंदी से  देश  के सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) में 2 फीसदी की गिरावट आ सकती है। मनमोहन सिंह अंतरराष्ट्रीय  ख्यातिप्राप्त अर्थशास्त्री हैं और उनकी बात को “राजनीतिक बयानबाजी“ कहकर हल्के में नहीं लिया जा सकता। नोबल पुरुस्कार विजेता अमर्त्य सेन ने डाक्टर मनमोहन सिंह के आकलन से सहमति जताते हुए नोटबंदी को निरंकुश  कार्रवाई बताया है। उनका कहना है कि  “विश्वास “ ही भारतीय अर्थव्यवस्था का मूलमंत्र है और इसी  विश्वास  यह तेजी से आगे बढ रही है। सरकार ने इस भरोसे को तोडा है। लोगों का बैंकों पर से भरोसा उठ गया है। देश  के केन्द्रीय बैंक आरबीआई की  क्रेडिबिलिटी  भी जाती रही है। अभी तक मौद्रिक मामलों पर आरबीआई सरकार को सलाह दिया करती थी मगर पहली बार मोदी सरकार ने आरबीआई को नोटबंदी पर अपना फैसला थोपा है। सरकार की करंसी से भी लोगों का  विश्वास  उठ चुका है। देश  की गृहणियों को नोटबंदी ने सबसे ज्यादा झकझोर कर रख दिया है। भारत में गृहणियों कों “ बुरे वक्त अथवा विपदा“ के लिए  रसोई के मर्तबान या आटे-दाल के डिब्बे में   पाई-पाई  बचा कर रखने की आदत है मगर नोटबंदी ने उनके इस भरोसे को भी तोड दिया है। काले धन को नंगा करने के लिए गृहणियों को अपनी जमा-पूंजी को गंवाना पडे, ऐसी कार्रवाई का क्या फायदा? दुनिया के किसी भी देश  में न तो लोगों को बैंकों में जमा अपनी पूंजी को निकालने से रोका जाता है, और न ही पैसा निकालने की सीमा तय की जाती है।  न केवल भारत में, अलबता अमेरिका, फ्रांस और जर्मन में भी  नगदी का खासा प्रचलन है। पूर्व वितमंत्री और कांग्रेस के वरिष्ठ  नेता पी चिदंबरम का आकलन है कि जीडीपी में एक फीसदी की गिरावट से देश  को डेढ लाख करोड रु के बराबर का नुकसान उठाना पडता है। और इसका सीधा असर घटते रोजगार और आय पर पडता है। आमदन गिरेगी तो मांग भी कम होगी और इससे अर्थव्यवस्था पर बहुत बुरा असर पडता है। अधिकतर अर्थशास्त्रियों का आकलन है कि नोटबंदी ने  वैश्विक  मंदी में भी तेजी से आगे बढ रही भारतीय अर्थव्यवस्था की तेज ग्रोथ पर ब्रेक लगा दी है और अब इसे रफ्तार पकडने में समय लग सकता है। तो क्या वाकई ही देश  को अभी नोटबंदी के बाद नवंबर-दिसंबर जैसे बुरे दिन झेलने पडेंगे? जिस तरह से रोजगार के अवसर घटे हैं, किसानों को फल-सब्जियों के वाजिब दाम नहीं मिल रहे हैं, ग्रामीण अंचलों में पूरा लेन-देन रुक सा गया है, यह सब यही संकेत दे रहा है कि बुरा वक्त अभी टला नहीं है।