पहली फरवरी को संसद में पेश होने वाले बजट से इस बार देश की जनता को पहले से काफी ज्यादा अपेक्षाएं है। पहली बार देश का बजट 28 दिन पहले 1 फरवरी को पेश हो रहा है। और पहली ही बार अलग से रेल बजट की बजाय इसे आम बजट में समाहित किया जा रहा है। और पहली ही बार नोटबंदी से कुंदित अर्थव्यवस्था को उठाने के लिए सरकारी निवेश और बडी कर रियायतों की अविलंब दरकार है। वित्त मंत्री अरुण जेटली के समक्ष बजटीय घाटे (डेफ्सिट) को सकल घरेलू उत्पाद को साढे तीन फीसदी से नीचे रखने और मांग को उठाने के लिए करों में रियायतें देने के बीच संतुलन स्थापित करने की बडी चुनौती है। कर रियायतें दिए जाने से बजटीय घाटा तय लक्ष्य से ज्यादा बढ सकता है। नोटबंदी ने नगदी पर फल-फूल रही भारतीय अर्थव्यवस्था को काफी हद तक तहस-नहस किया है। नोटबंदी ने उधोग-धंधे, कारोबार, खेती-किसान और रोजगार पर खासा प्रभाव डाला है। अंतरराष्ट्रीय रेटिंग एजेंसी मूडी का आकलन है कि नोटबंदी ने भारत की आर्थिक गतिविधियों पर प्रतिकूल प्रभाव डाला है और तेजी से आगे बढती अर्थव्यवस्था की रफ्तार को रोक दिया है। 8 नवंबर से पहले भारत का 7.6 फीसदी से ज्यादा का ग्रोथ रेट चीन से कहीं ज्यादा था मगर नोटबंदी के बाद इसमें एक फीसदी की गिरावट आई है। अंतरराष्ट्रीय मुद्रा स्फीति (आईएमएफ) का ताजा आकलन है कि नोटबंदी के बाद ग्रोथ में चीन अब भारत से आगे निकल जाएगा। आईएमएफ ने भारत का ग्रोथ रेट 7.6 फीसदी से कम करके इसे 6.6 फीसदी रखा है। दिसंबर में ऑटोमोबाइल सेक्टर की बिक्री में 16 साल की सबसे बडी गिरावट दर्ज हुई है। सेंटर फॉर मॉनिटरिंग इंडियन इकॉनोमी (सीआईएमई) का आकलन है कि अगर कंज्युमर डिमांड को फौरन सक्रिय नहीं किया गया, तो अगले पांच साल तक ग्रोथ रेट 6 फीसदी से आगे नहीं बढ पाएगा। तथापि, मोदी सरकार के लिए अच्छी बात यह है कि सरकार के राजस्व में गिरावट नहीं आई है। इसके विपरीत काले धन की एमनेस्टी स्कीम से सरकार को 60 हजार करोड रु से भी ज्यादा की कमाई हुई है। नोटबंदी के बाद से भी काली कमाई का जब्त किया जाना जारी है। ताजा आकलन के अनुसार चालू वित्तीय वर्ष में सरकार के राजस्व में जीडीपी के 0.5 फीसदी बराबर की वृद्धि की उम्मीद है। यह स्थिति सुखद है और इससे वित्त मंत्री के हाथ खुल सकते है। मांग को लिफ्ट करना वित्त मंत्री की पहली प्राथमिकता होगी और इसके लिए सार्वजनिक व्यय को खासा बढाना पडेगा। इसके लिए वित्त मंत्री को बजटीय घाटा जीडीपी का तीन फीसदी तक लाने का लक्ष्य छोडना पड सकता है। अगर बजटीय घाटा 3.3 से 3.4 फीसदी के बीच तय किया जाता है, तो सरकार को लगभग चालीस हजार करोड रु सार्वजनिक व्यय के लिए अतिरिक्त मिल सकते हैं। बहरहाल, आम आदमी सरकार से सस्ते में दो वक्त का भरपूर भोजन और माकूल रोजगार की अपेक्षा रखता है। उसे और कोई रियायत नहीं चाहिए। मध्य वर्ग को आयकर सीमा को पांच लाख तक बढाने की उम्मीद कर रहा है। महंगाई के इस जमाने में, खासकर महानगरों और बडे षहरों में परिवार की सभी जरुरी जरुरतों को पूरा करने के लिए 5 लाख रु भी कम पडते हैं। नोटबंदी से पीडित उधोग-धंधों , कारोबारियों और व्यवसायियों को कर रियायतों के साथ-साथ सस्ते कर्ज की भी दरकार है। भारत में कर्ज अभी भी अपेक्षाकृत महंगा है। कर्ज सस्ता करना आरबीआई के हाथ में मगर बजट मे सरकारी बैंकों की कमजोर वित्तीय स्थिति के लिए ठोस कदम की झलक मिल सकती है। मोदी सरकार डिजिटल पेमेंट को खासी तवज्जो दे रही है, इसलिए बजट में इसे प्रोत्साहित करने के लिए रियायतें दी जा सकती है। सीनियर सिटीजन्स मोदी सरकार से सर्वांगीण सामाजिक सुरक्षा की अपेक्षा रखते हैं और यूनिवर्सल इनकम स योजना इस दिशा में बेहतर विकल्प हो सकता है। देश की महिलाओं को बस उनकी अस्मिता की रक्षा की गारंटी चाहिए। एक फरवरी के बजट में इन सब आकांक्षाओं के समावेश की उम्मीद की जाती है।
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