समाजवार्टी के चुनाव चिंह को लेकर निर्वाचन आयोग का फैसला अखिलेश यादव के पक्ष में गया है और साइकिल चुनाव चिंह उनके नेतृत्व वाली पार्टी को मिल गया है। पिता मुलायम सिंह यादव से “बागी“ हुए पुत्र की यह बहुत बडी जीत है। दोनों ही पक्ष समाजवादी पार्टी के चुनाव चिंह “साइकिल पर दावा कर रहे थे। मुलायम सिंह यादव और उनके समर्थकों के लिए यह जोरदार झटका है। आयोग ने अपने फैसले में कहा है कि उपलब्ध दस्तावेजों से साफ कि अखिलेश यादव ही असली समाजवादी पार्टी है और अधिकतर विधायकों और पार्टी कार्यकर्ताओं का उन्हें भरपूर समर्थनन है। वैसे निर्वाचन आयोग ने पहली बार दो पक्षों के बीच विवाद की स्थिति में चुनाव चिंह को फ्रीज नहीं किया है। अब तक निर्वाचन आयोग किसी पार्टी के दो फाड होने की स्थिति में चुनाव चिंह को फ्रीज करता रहा है। देश की सबसे पुरानी पार्टी कांग्रेस अब तक दो बार दो फाड होकर अपना चुनाव चिंह खो चुकी है। 1969 में कांग्रेस के दो फाड होने पर निर्वाचन आयोग ने पार्टी के चुनाव चिंह “ हल जोतते दो बैलों की जोडी“ को फ्रीज कर दिया था। तब इंदिरा गांधी की अगुवाई वाली कांग्रेस (आई- इंदिरा) को गाय और बछडे का चुनाव चिंह मिला था। इसी चुनाव चिंह पर इंदिरा कांग्रेस को 1971 में प्रचंड बहुमत भी मिला था। मगर आपातकाल की विपरीत परिस्थितियों के कारण 1977 होते-होते इंदिरा कांग्रेस को अपना चुनाव फिर बदलना पडा। अब तक इंदिरा कांग्रेस पार्टी फिर दो फाड हो चुकी थी और यह चुनाव चिंह भी जब्त किया जा चुका था। इस बार इंदिरा कांग्रेस ने हाथ को अपना चुनाव चिंह चुना। इस चुनाव चिंह को चुनने की पृष्ठभूमि भी काफी दिलचस्प है। चुनाव चिंह का चयन करने के लिए पार्टी द्वारा नियुक्त कांग्रेस नेता सरदार बूटा सिंह यह तय नहीं कर पा रहे थे कि कौनसा चुनाव चिंह चुना जाए। तब निर्वाचन आयोग ने इंदिरा कांग्रेस के समक्ष हाथी, साइकिल और पंजा के तीन विकल्प दिए थे मगर बूटा सिंह तय नहीं कर पा रहे थे कौनसा चिंह लिया जाए। वे इंदिरा गांधी से सलाह लेने चाहते थे। इंदिरा गांधी उस समय आंध्र प्रदेश में थी। निर्वाचन आयोग ने बूटा सिंह को चुनाव चिंह चुनने के लिए अगली सुबह तक का समय दिया था और स्पष्ट कर दिया था कि अगर इस दौरान बूटा सिंह कोई फैसला नहीं ले पाए, तो इंदिरा कांग्रेस को बगैर चुनाव चिंह के ही लडना पडेगा। इस पर इंदिरा गांधी के नेतृत्व में कांग्रेस कार्यकर्ताओं ने निर्वाचन आयोग के कार्यालय पर खूब हंगामा किया था और अंत में कांग्रेस को पंजा चुनाव चिंह दिया गया। तब कांग्रेस नेताओं को हाथी अथवा साइकिल की अपेक्षा पंजा ज्यादा उपयोगी लगा था। हाथी अब बहुजन समाज पार्टी का और साइकिल समाजवादी पार्टी का चुनाव चिंह है। अखिलेश यादव के लिए यह बहुत बडी बात है कि जो काम इदिरा गांधी नहीं कर पाई, उन्होंने वह कर दिखाया। पार्टी की टूट की स्थिति में अधिकांश विधायकों, सांसदों और कार्यकर्ताओं को अपने साथ जोडना बेहद चुनौतीपूर्ण कार्य है। मुलायम सिंह लंबे समय से राजनीति में है और इस दौरान उन्होंने कई राजनीतिक फ्रंट बनाए और तोडे मगर उनका उत्तर प्रदेश में पिछडे तबकों एवं मुसलमानों के जनाधार में कोई भी सेंध नहीं लगा पाया। अखिलेश यादव ने चुनाव अखाडे का पहला दंगल तो पिता से जीत लिया है मगर अभी भी उनके समक्ष कई चुनौतियां है। सबसे बडी चुनौती पिता के जनाधार में सेंध लगाने की है। मुलायम सिंह ने अखिलेश पर मुसलमानों की उपेक्षा का आरोप लगाकर साफ कर दिया है कि पिता अपने जनाधार को आसानी से खिसकने नहीं देंगे। कांग्रेस के साथ हाथ मिलाकर अखिलेश कुछ हद तक मतों के विभाजन को रोक सकते हैं मगर सबसे बडा सवाल है कि अल्पसंख्यक भाजपा को सत्ता में आने से रोकने के लिए अखिलेश का साथ देते हैं अथवा मायावती का। कांग्रेस पर अभी तक राज्य के अल्पसंख्यकों को भरोसा नहीं है।
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