मंगलवार, 3 जनवरी 2017

2017 का दंगल शुरू

सुप्रीम कोर्ट  ने बीसीसीआई अध्यक्ष अनुुराग ठाकुर और सचिव अजय  शिर्के को पद से हटाकर लोढा समिति  की  सिफारिशें  न मानने वालों को सख्त संदेश  भेजा है। देश  की  शीर्ष  अदालत केे  स्पष्ट  निर्देशों  के बावजूद बीसीसीआई अध्यक्ष दुनिया की सबसे धनाढ्य किर्केट संस्था में सुधार लाने पर अब तक किंतु-परंतु कर रहे थे। कोर्ट ने अनुराग ठाकुर को कई मौके दिए मगर  लोढा समिति  की  सिफारिशें को अक्षरश  लागू करना तो दूर, बीसीसीआई ने इन्हें आंशिक रुप से भी संजीदगी से लागू नहीं किया। भारत और इंग्लैंड के बीच 15 जनवरी से शुरु हो रही एक दिवसीय मैंचों की श्रृंखला बाधित न हो, इसलिए कोर्ट ने सबसे सीनियर उपाध्यक्ष  को बीसीसीआई का कार्यवाहक अध्यक्ष बनाया है। बीसीसीआई के ज्वांइट सेक्ट्री को सेक्ट्री अजय  शिर्के का भी कार्यभार दिया गया है। सप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में  साफ  कहा है कि  15 जनवरी से  शुरु हो रही भारत-इंग्लैंड एक दिवसीय श्रृंखला में कोई रुकावट नहीं आएगी। तथापि 15 जनवरी को पुणे में होने वाले पहले एक ओडीआई में रुकावट डाली जा सकती है। अजय  शिर्के पुणे से हैं और अगर ताजा हालात के  दृष्टिगत  महाराष्ट्र  क्रिकेट संघ  मैच न कराने का जोखिम उठा ले तो मैच को तत्काल  रिशेड्यूल  करना संभव नही होगा। इस मैच के टिकट बिकने  शुरु हो चुके हैं। अनुराग ठाकुर  की  मुश्किलें  अभी यहीं खत्म नहीं हुई हैं। उन पर सुप्रीम कोर्टं में झूठा हलफनामा दायर करने का आरोप है और अदालत उन्हें झूठे साक्ष्य (परजरी) के अपराध में जेल भी भेज सकती है। अनुराग ठाकुर ने अंतरराष्ट्रीय   क्रिकेट संघ (आईसीसी) की ओर सुप्रीम कोर्ट  में झूठा हलफनामा दायर कर दावा किया था कि आईसीसी लोढा कमेटी की सिफारिशों  को बीसीसीआई के कार्यं में दखल मानती है जबकि आईसीसी अध्यक्ष  शंशांक  मनोहर ने ऐसा कुछ नहीं कहा था। अनुराग ठाकुर की इस झूठे हलफनामे से पता चलता है कि देश  के सियासी नेता अपने फायदे के लिए देश  की शीर्ष  अदालत तक को गुमराह करने में भी हिचकते नहीं हैं। अनुराग ठाकुर केन्द्र में सत्तारूढ भारतीय जनता पार्टी के सांसद है। वे भारतीय युवा मोर्चे के अध्यक्ष भी रह चुके हैं। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी आए दिन देश  में सुधारों की बात करते हैं और वे संजीदगी से हर क्षेत्र में क्रांतिकारी सुधार लाने के लिए प्रयत्नशील भी हैं। फिर उनकी ही पार्टी के सांसद बीसीसीआई में सुधार लाने के लिए  लोढा समिति  की सिफारिशों  को क्यों लागू नहीं कर पाए? लोढा कमेटी की सिफारिशों  में 70 साल से ज्यादा उमर के लोगों को बीसीसीआई से बाहर रखने और एक व्यक्ति के दो-दो पद संभालने पर रोक लगाना प्रमुख हैं। अनुराग ठाकुर बीसीसीआई अध्यक्ष के अलावा लंबे समय से हिमाचल प्रदेश  क्रिकेट एसोसिएशन के अध्यक्ष भी हैं और वे अपनी जमीन से जुडा रहना चाहते है। लोढा कमेटी ने एक स्टेट, एक वोट की सिफारिश  भी कर रखी है। इस प्रावधान के लागू होने से कई पदाधिकारी  बीसीसीआई में पदस्थ नहीं हो सकते।  लोढा कमेटी बीसीसीआई को आरटीआई एक्ट के तहत लाना चाहती है। कोई भी बीसीसीआई पदाधिकारी लगातार दो बार  से ज्यादा पद पर नहीं रह सकता। मंत्री अथवा नौकरशाह भी बीसीसीआई में नहीं रह सकता। लोढा समिति की सिफारिशें अक्षरश  लागू किए जाने की स्थिति में बीसीसीआई को सियासी नेताओं के कब्जे से मुक्त किया जा सकता है और जाने माने क्रिकेट खिलाडियों के लिए मार्ग  प्रशस्त हो सकता है। यही सुप्रीम कोर्ट  भी चाहता है और देश  के क्रिकेट प्रेमी भी। सियासी नेताओं और नौकरशाहों ने जिस तरह से बीसीसीआई समेत खेल संगठनों को राजनीति का अखाडा बना रखा है, लोढा कमेटी की सिफारिशें उन्हें इससे मुक्ति दिला सकती है। 2017 का दंगल शुरु हो चुका है। 1 जनवरी को समाजवादी बेटे ने पिता को पार्टी से बेदखल कर दिया, और अब 2 जनवरी को सुप्रीम कोर्ट ने अनुराग ठाकुर को हटाया दिया है।