मंगलवार, 1 नवंबर 2016

पटाखे फोड़ कर हवा को प्रदूषित करना कहां की अकलमंदी

  प्रकाश  पर्व - दीपावली को हर साल भारत में हर घर को रोशनी में नहलाया जाता है। जमकर पटाखे फोडे जाते हैं और दोस्त हो या  दुश्मन , सबसे गले मिला जाता है और भरपूर खरीदारी की जाती है। युगों से यह सिलसिला चल रहा है। समय के साथ-साथ, बहुत कुछ बदला है। प्रकाश  पर्व का स्वरुप भी बदला गया हे। कुम्हार द्वारा बनाए गए मिट्टी के दीए अब कहीं-कहीं ही दिखते हैं। उनकी जगह सिंथेटिक दीओं ने ले ली है। बिजली की रोशनी  दीओं पर भारी पडती है। भारत समेत पूरी दुनिया अब कृत्रिम (सिंथेटिक) हो गई है। इसीलिए दीपावली और होली पर सिंथेटिक उत्पाद का ज्यादा चलन हो गया है। सिथेंटिक उत्पादों ने वातावरण को और ज्यादा खराब किया है।  भारत में अगर कुछ बदला नहीं, तो वह है पटाखे फोडने की परंपरा। और दीवाली तो होती ही पटाखे फोडने के लिए है।  फिर हम दीपावली पर खूब पटाखे फोडते हैं। धनतेरस से  शुरु होकर भाई दूज तक दीपावली का पर्व  चलता है और इन दिनों खूब पटाखे फोडे जाते हैं। इस क्रम में हवा बेहद जहरीली हो जाती है और प्रदूषण का स्तर खतरनाक मानक को भी पार कर जाता है। हमे इसकी जरा भी परवाह नहीं है। हमारी एक बहुत बुरी आदत है। हम सोचते हैं “मेरे करने से क्या होगा“। और इस तरह पूरा देश  यही सोवता है। नतीजतन, हम बदलाव नहीं कर पाते।  देश  की राजधानी दिल्ली में सोमवार अलसुबह हवा में जहरीली गैसों का मिश्रण 883 माइक्रोग्राम के स्तर को भी पार कर गया था जबकि यह सुरक्षित 60 माइक्रोग्राम से नीचे रहना चाहिए। इसी वजह सोमवार सुबह राजधानी में विजीबिल्टी बहुत कम रही। अगले दो दिनों में प्रदूषण का स्तर कम होने की बजाए और बढ सकता है। विशेषज्ञों के मुताबिक पंजाब और हरियाणा में किसानों द्वारा लगातार धान की पराली जलाने से भी प्रदूषण में इजाफा हुआ है। चंडीगढ पंचकूला और मोहाली में इस बार प्रदूषण अपेक्षाकृत  कम रहा। चडीगढ में पिछले साल की तुलना में 50 फीसदी से भी कम पटाखे फोडे गए। इसकी वजह यह रही कि पटाखों की ज्यादा बिक्री नहीं हुई। आम तौर पर बच्चे और युवा ही अधिकतर पटाखों की खरीदारी करते हैं। इस बार बच्चों और युवाओं ने पटाखे खरीदने में ज्यादा रुचि नहीं दिखाई। चंडीगढ देश  के प्रगतिशील सोच वाला शहर है और इसके बाशिंदे हमेशा  आगे की सोचते हैं। पिछले कुछ सालों से शहर में ग्रीन दीवाली और ग्रीन होली मनाने का चलन बढा है। इस बार भी ट्राईसिटी की हवा को प्रदूषण मुक्त रखने के लिए “ग्रीन दीवाली“ मनाई गई। इस बार की दीवाली का एक और सुखद पहलू यह रहा कि चीन के पटाखों, लाइटस और दीओं के  राष्ट्रव्यापी  बहिष्कार के कारण स्वदेशी  दीओं और पटाखों की ब्रिकी कही ज्यादा रही। पिछले कुछ सालों से दीवाली पर चीन में निर्मित सस्ते उत्पाद स्थानीय उत्पाद पर भारी पड रहे थे। भारत में दीवाली का महत्व मात्र  पटाखे फोडना अथवा दीए जगमगाने तक ही सीमित नही है। दीपावली प्रकाश  का पर्व  है। जिस तरह दिया अपनी रोशनी से अंधेरे को दूर करता है, उसी तरह दीपावली पर्व पर हम  प्रेम, आदर्ष   आचरण, मर्यादा पालन और साम्प्रदायिक सदभाव के प्रकाश  से नफरत, द्धेश, अज्ञानता, बैेमन्सय जैसी बुराइयों को दूर भगाते हैं। देश  में व्याप्त मौजूदा असहिशष्णुता के माहौल में प्रकाश  पर्व  का महत्व और भी बढ जाता है। दीपावली सामाजिक उत्सव है और यह पर्व  हमें प्रेम और सदभाव से साथ-साथ रहने की सीख देता है। इस बार उडी आतंकी हमले और तदुपरांत सर्जिकल स्ट्राइक से उपजी कटुता के कारण  पडोसी देश  पाकिस्तान से हमारे संबंध बेहद खराब है और दोनों देश  लगभग युद्ध के मुहाने पर खडे हैं। सीमा पर लगातार जारी गोलीबार के कारण जवान शहीद हो रहे हैं। शोक संतप्त शहीदों के परिजनों के दुख को साझा करने के लिए कई जगह दीपावली नहीं मनाई गई। यही दीपावली का वास्तविक संदेश  है कि देश  के हर नागरिक को एक-दूसरे के सुख-दुख को बांटना है।