दीपावली के एक सप्ताह बाद भी राजधानी दिल्ली में प्रदूशण का कहर जारी है। दिल्ली में प्रदूशण इस कद्र बढ गया है कि दिल्ली सरकार को स्कूल तीन दिन के लिए बंद करने पडे हैं। कंस्ट्रक्षन और डेमोलिशन भी लंबे समय तक के लिए प्रतिबंधित है। कारोबारी और उधोगपति अपने कर्मचारियों से कह रहे हैं “ दफ्तर मत आओ, घर पर बैठकर काम करो“। अमूमन, ट्रैफिक जाम से पीडित राजधानी की व्यस्ततम सडकें अपेक्षाकृत सूनसान पडी है। गलियों और कॉलोनियों में भारी भूरी धुंध, राख एवं जहरीले प्रदूषको से लोगों को सांस लेने में भी दिक्कत हो रही है। आंखों में भारी जलन हो रही है। सोमवार को भी दिल्ली के कई क्षेत्रों में फेफडों तक पहुंचने वाले सुक्ष्म वायु कणों की मात्रा (पीएम 2.5) 700 माइक्रोग्राम से भी ज्यादा थी जबकि यह सुरक्षित स्तर 60 से कम होनी चाहिए। पीएम 10 का स्तर भी सोमवार को सुरक्षित स्तर से 15 गुना ज्यादा था। विगत दो दशक में दिल्ली पर इस समय प्रदूषण का सबसे बडा खतरा मंडरा रहा है। खतरा इतना बढ गया है कि स्कूली बच्चे मास्क पहनकर सडकों पर प्रर्दशन कर रहे हैं। दिल्ली की आज वही स्थिति है जो पिछली सदी के पचास के दशक मे लंदन की थी। 1952 में जहरीली हवा ने लंदन में 4,000 से ज्यादा लोगों को बेमौत काल की गर्त में धकेल दिया था। तब लंदन की हवा में औसतन पीएम लेवल 500 माइक्रोग्राम के आसपास था और सल्फर डाइऑक्साइड (एसओ2) बेहद खतरनाक। दिल्ली के लिए राहत की बात यह है कि फिलहाल सल्फर डाइऑक्साइड लंदन की तरह खतरनाक स्तर पर नहीं है पर अगर हालात यही रहे तो दिल्ली भी 1952 की लंदन बन सकती है। यह सब हमारे अपने किए का परिणाम है। पिछल कई सालों से पर्यावरण विशेषज्ञ बार-बार हमें सतर्क कर रहे थे मगर हम नहीं चेते। पर्यावरण को प्रदूषित करने का हम कोई मौका नहीं चूकते। पर्यावरण विद सुनीता नारायण अरसे से दिल्ली वालों को प्रदूषण के गंभीर खतरों से आगाह कर रही है। हर साल दिल्ली में प्रदूषण से करीब 30,000 लोग मर रहे हैं। पिछले एक सप्ताह से ज्यादा समय से राजधानी दिल्ली भीषण स्मॉग से पीडित है मगर केन्द्र और दिल्ली सरकार समस्या का अविलंब हल ढूंढने की बजाय एक-दूसरे पर दोषारोपण कर रहे हैं। सोमवार को नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल ने दिल्ली सरकार को इस बात के लिए कडी फटकार लगाई कि लोगो को राहत देए के लिए सडकों पर पानी का छिडकाव क्यों नहीं किया और हेलिकॉप्टर से कृत्रिम बारिश क्यों नहीं करवाई गई? क्या हेलीकाप्टर वीवीआईपीके लिए ही हैं। आखिर सरकार किस बात का इंतजार कर रही है। लोगों को स्मॉग से बचाने के लिए फौरी तौर यही एकमात्र उपाय था। ट्रिब्यूनल ने सरकार से यह भी पूछा कि पंजाब और हरियाणा में फसलों (पराली) को जलाने से दिल्ली में जो प्रदूषण फैल रहा है, उसके लिए दिल्ली सरकार ने क्या उपाय किए हैं। वैसे पर्यावरण विशेषज्ञों का कहना है कि दिल्ली के प्रदूषण में पंजाब और हरियाणा में फसलें जलाने का 20 फीसदी ही हाथ है। 80 फीसदी प्रदूषण खुद दिल्ली वाले फैला रहे हैं। मंगलवार को इस मामले की सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई होनी है और हमेशा की तरह इस बार भी न्यायपालिका ही लोगों को राहत दे सकती है। प्रदूषण पर सुप्रीम कोर्ट पहले ही सरकार को कई निर्देश दे चुका है मगर इन्हें संजीदगी से लागू नहीं किया गया है। दिल्ली में प्रदूषण के लिए सरकार से लेकर नागरिक सभी जिम्मेदार हैं मगर यह समय एक-दूसरे पर दोषारोपण का नहीं है। प्रदूषण की समस्या से निपटने के लिए सब को मिलकर काम करने की जरुरत है। इस मामले में “मेरे करने से क्या होगा“ वाला एटीट्युट नहीं चलेगा। प्रदूषण से बचने के लिए हर छोटे-बडे को अपना योगदान देना होगा।
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