मंगलवार, 22 नवंबर 2016

एक और रेल हादसा

एक और यात्री रेल दुर्घटना। रविवार तडके कानपुर के निकट इंदौर-पटना एक्सप्रैस ट्रेन की 14 बॉगियों के पटरी से उतर जाने के कारण 142 लोग मारे गए और 150 से ज्यादा गंभीर रुप से जख्मी हैं। शुक्र है बिजली लाइन ट्रिप हो गई, वरना पूरी ट्रेन में आग लग जाती। देश  में जितना पुराना रेल का इतिहास है, उतना ही पुरानी रेल दुर्गटनाओं का सिला भी। इस सदी में अब तक 20 बडे रेल हादसे हो चुके हैं और इनमें 900 से ज्यादा लोगों को अपनी जान गंवानी पडी है। जब भी रेल हादसा होता है, समकालीन सरकार जांच  कराकर खानापूर्ति कर लेती है। इस बार भी रेलवे मंत्री ने जांच के आदेश  दे दिए हैं। शुरुआती जांच से पता चलता है कि रेलवे ट्रैक में फेक्चर होने से यह हादसा हुआ। विशेषज्ञों के अनुसार दुर्घटनाग्रस्त ट्रेन के बीच वाले कोच पटरी से उतरे हैं, इसलिए फ्रैक्चरड ट्रेक  को हादसे के लिए जिम्मेदार माना जा रहा है। इतना तय है कि कानपुर रेल हादसा मानवीय चूक की वजह से नही हुआ है। वैसे फ्रैक्चरड  ट्रैक का पता लगाने के लिए रेलवे के पास पुख्ता व्यवस्था है। रेलवे ट्रैक की नियमित  जांच होती है। ट्रंक रुट की हर मेन लाइन पर अल्ट्रासोनिक वॉल डिटेकशन लगाए गए हैं , जो पटरी की हर छोटी-बडी खामी को फौरन पकड लेते हैं। मेन लाइनों की हर माह नियमित जांच करना अनिवार्य है। इस स्थिति के दृष्टिगत कानपुर के निकट रेलवे ट्रैक का फ्रैक्चरड हो जाना घोर लापरवाही अथवा साजिश  की ओर संकेत कर रहा है। जांच के बाद ही इस बात का भी पता चलेगा है कि कानपुर के निकट रेलवे ट्रैक की आखिरी जांच कब हुई थी। रेलवे अधिकारी खुद मानते हैं कि देश  में रेलवे की जो स्थिति है, उसमें हर माह नियमित जांच कभी-कभार ही हो पाती है। इस बात की पूरी संभावना है कि रेलवे ट्रैक की  जांच के निर्धारित मानदंडों को दरकिनार किया गया था। भारत में अधिकतर एक्सप्रैस टैन्स खचाखच भरी रहती हैं और अक्सर औवरलोडिड हो जाती हैं। माल गाडियां तो बराबर ओवरलोडिड होती हैं। कई बार यह भी हादसे का कारण बनता है। अगर किसी मालगाडी की क्षमता 100 टन माल ढोने की है मगर उसमें 110 टन गुडस लोड किया गया है,  तो इससे ट्रैक का फेक्चर होना तय है। माना जा रहा है कि इंदौर-पटना एक्सप्रैस के दुर्घटनाग्रस्त स्थल से गुजरने से पहले ओवरलोडिड मालगाडी गुजर होगी, जिस वजह ट्रैक टूट गया।  ट्रेन के पटरी से उतरने के और भी कई कारण है। सामने किसी अवरोधक के आने अथवा किसी पार्ट  के गिरने से भी ट्रेन पटरी से उतर सकती है। इस बात का खुलासा भी हुआ है कि झांसी स्टेशन से रवाना होने के दो स्टेशन बाद ट्रेन चालक को इंजन में निर्धारित सीमा से ज्यादा लोड दिखा और इसकी सूचना तुरंत मंडल के अफसरों को दी गई मगर भारत में तो हर चीज के लिए “जुगाड“ है। मंडल अधिकारियों ने जैसे-तैसे जुगाड करके चालक को कानपुर तक पहुंचने के निर्देश  दिए। मगर अफसोस ट्रेन कानपुर पहुंचने से पहले ही दुर्घटनाग्रस्त होे गई। तकनीकी कमियां भी रेल हादसों की प्रमुख वजह होती है। सुरक्षा मानदंडों के मुताबिक इंजन की  हैडलाइटस से कम-से-कम 200 की दूरी तक दिखना चाहिए मगर भारतीय रेलवे के इंजनों की हैडलाइटस बमुश्किल 10 मीटर आगे देख पाती हैं। सर्दियों में घनी धुंध में स्थिति और भी विकट हो जाती हैं। बहरहाल, हम बुलेट ट्रेन चलाने के सपने देख रहे हैं जबकि यह काफी महंगा काम है। 500 किमी पटरी बिछाने की लागत एक लाख करोड रु से भी अधिक है। रेलवे अभी भी मौजूदा रेल लाइनों की माकूल  सुरक्षा व्यवस्था का पूरा खर्चा  नहीं उठा पा रही है। बेहतर यही होगा कि हम रेलवे के बुनियादी ढांचे को मजबूत करें  ताकि आए दिन के रेल हादसे टाले जा सकें।