गुरुवार, 17 नवंबर 2016

असंवैधानिक कदम

अब इस बात में कोई संदेह नहीं है कि इस  शताब्दी के उतरार्ध  में पानी के लिए भीषण जंग छिड सकती है। और अगर हालात यही रहे तो देश  में इससे पहले ही पानी पर राज्यों में मारा-मारी हो सकती है। पंजाब ने नॉन राइपेरियन राज्यों से पानी की कीमत वसूलने के लिए विधानसभा में प्रस्ताव पारित करके इस बात के संकेत भी दे दिए हैं। ऐसा करके न केवल पंजाब ने देश  के संघीय ढांचे को कमजोर किया है, बल्कि न्यायपालिका की अवमानना भी की है। यह वही   शिरोमणि अकाली दल है, जो अब तक मजबूत संघीय (फेडेरलिज्म) का सबसे बडा पैरवीकार हुआ करता था। न्यायपालिका की अवमानना करके और असंवैधानिक प्रस्ताव पारित करके  संघीय ढांचा  मजबूत नहीं हो सकता है। यह स्थिति देश की अखंडता के लिए बेहद खतरनाक है।  स्वायत राज्य संघीय ढांचे की बुनियाद हैं मगर इस स्वायत्तता के यह कतई मायने नहीं हैं कि  राज्य सिर्फ अपने राजनीतिक हित साधे और देश  की अखंडता पर प्रहार करे। सतलुज-यमुना लिंक परियोजना (एसवाईएल) को लेकर पंजाब अपने छोटे भाई हरियाणा को जिस तरह से उसके वाजिब हक से महरुम कर रहा है, उससे सिर्फ  देश  का संघीय ढांचा कमजोर हो रहा है। पानी पर रायल्टी मांगने का किसी भी राज्य को कोई संवैधानिक अधिकार नहीं है।  लोकतंत्र में जनता द्वारा चुनी गई संसद और विधानसभा को सर्वोपरि माना जाता है। इसलिए संसद अथवा विधानसभा जनहित में कोई भी कानून अथवा प्रस्ताव पारित कर सकती है। विधानसभा चुनाव की बेला पर शिरोमणि अकाली दल ने हरियाणा, राजस्थान और दिल्ली से पानी की कीमत (रायल्टी) वसूलने के लिए विधानसभा में प्रस्ताव पारित  कर सिर्फ  राजनीतिक “शिगूफा“ फेंका है। अकाली सरकार तो बिल लाना चाहती थी, मगर राज्यपाल ने इसकी अनुमति नहीं दी। यह मनी बिल था, इसलिए इसे विधानसभा में लाने के लिए राज्यपाल की अनुमति अनिवार्य  थी। बहरहाल, प्रस्ताव पारित करके पंजाब न तो पैसा वसूल कर सकता है और न ही हरियाणा और राजस्थान को दिया जा रहा नहरी पानी रोक सकता है। इसके विपरीत एसवाईएल पर कीमत वसूल और असहयोग का प्रस्ताच लाकर अकाली सरकार ने केन्द्र सरकार की मुश्किलें बढा दी है। अकाली दल खुद केद्र में सत्तारूढ भाजपा नीत राजग का हिस्सा है। पंजाब की देखादेखी हरियाणा, राजस्थान और दिल्ली विधानसभाएं भी पानी पर हक जताने वाला प्रस्ताव पारित कर सकती हैं। इस तरह के प्रस्तावों के तब तक कोई मायने नहीं है, जब तक उन पर अमल न हो। वैसे भी संघीय ढांचे में  इंटर-स्टेट नदी जल बंटवारे के लिए राज्य विधानसभा में प्रस्ताव पारित कर विवाद निपटाने का किसी भी राज्य को कोई हक नहीं है।  1956 में  भाषाई  आधार पर राज्यों के पुनर्गतठन के बाद अंतरराज्यीय जल विवाद पर संसद ने बाकायदा इंटर-स्टेट वाटर्स डिस्पियुट एक्ट-1956 पारित कर रखा है और केन्द्र को इस एक्ट के तहत नदी जल बंटवारे पर दखल का पूरा  हक है। राज्यो में नदी जल  बंटवारे पर विवाद निपटाने के लिए सुप्रीम कोर्ट , टिब्यूनल और केन्द्र सरकार संवैधानिक विकल्प है। 1966 में दोबारा राज्यों के पुनर्गठन और संयुक्त पंजाब के विभाजित किए जाने पर हरियाणा, पंजाब से अलग होकर स्वतंत्र राज्य बना था। इस स्थिति के दृष्टिगत अगर पंजाब का नदियों के पानी पर राइपेरियन हक है, तो हरियाणा का भी इसी बिला पर पूरा हक है। भाइयों की पुश्तेनी जमीन पर कानूनन बराबर का हक होता है। बडा भाई, छोटे भाई को इस बिला पर पुश्तेनी हक से वंचित नहीं कर सकता कि वह तो बहुत पहले ही परिवार से अलग हो गया था। अलग होने से उसका पुश्तेनी हक नहीं मारा जा सकता। सच यह है कि पंजाब के सियासी दल मतदाताओं को लुभाने के लिए पानी के मुद्दे को उछाल रहे हैं। इससे पहले कि स्थिति बद से बदतर हो जाए, केद्र को तुरंत दखल देना चाहिए।