नोटबंदी से चौतरफा मचे हाहाकार के साथ-साथ
डॉलर के मुकाबले कमजोर भारतीय मुद्रा के लिए देश की मौजूदा वित्तीय
हालात से कहीं ज्यादा वैश्विक हालात जिम्म्मेदार है। दुनिया में स्टॉक
मार्केट्स की दिशा और परीक्षा अमेरिका तय करता है। अमेरिका की ब्याज दरें पूरी
दुनिया को नचाती हैं। वीरवार को रुपया डॉलर के मुकाबले तीन साल के
न्यूनतम स्तर 68.86 के स्तर पर पहुंव गया था। यानी एक डॉलर के लिए 68.86
रु की विनिमय दर। शुक्रवार को मुद्रा बाजार में भारतीय रिजर्व बैंक
(आरबीआई) के दखल के बाद रुपए में कुछ सुधार आया और यह डॉलर के मुकाबले
68.37 पर बंद हुआ। शुक्रवार को सेसेक्स में हालांकि 459 अंकों का उछाल
आया मगर अभी भी यह नवंबर 8 (अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव) से 1731 अंक पीछे
है। तब से सेंसेक्स 6.27 फीसदी अंक गिर चुका है। मौजूदा स्थिति में आरबीआई
रुपए की डॉलर विनिमय दर को 68 और 69 के बीच रखने के पक्ष में है। मगर
आरबीआई ज्यादा देर तक कमजोर रुपए को सहारा नहीं दे सकता। अगर येन और युवान
जैसी अग्रणी एशियाई करंसी का अवमूल्यन लगातार जारी रहता है, तो अपनी
अमूल्य विदेशी मुद्रा भंडार को खर्च करके रुपए का अपमूल्यन (एपरिसेएशन)
ज्यादा कारगर साबित नहीं होगा। तीन साल पहले अगस्त 2013 को तत्कालीन
आरबीआई गर्वनर रघुराम राजन के पद ग्रहण से कुछ दिन पहले रुपए में भारी
गिरावट आई थी। तब अमेरिकी सेंट्रल बैंक द्वारा बांडस की खरीद अचानक बंद कर
देने से रुपया डॉलर के मुकाबले 68.86 के न्यूनतम स्तर में पहुंच गया था।
तब जैसे-तैसे रघुराम राजन ने स्थिति संभाल ली थी। अब नए आरबीआई गवर्नर
उर्जित पटेल को भी उसी तरह की स्थिति का सामना करना पड रहा है। अमेरिका में
रिपब्लिकन डोनाल्ड ट्रंप के राष्ट्रपति चुने जाने के बाद से डॉलर लगातार
मजबूत होता जा रहा है। मजबूत अमेरिकी मुद्रा एमरजिंग मार्केटस से निवेश को
सोख रही है। ट्रंप के राश्ट्रपति चुने जाने के बाद से अब तक विदेशी निवेशक
28,190 करोड रु निकाल चुके है और 15,194 करोड रु की बिकवाली (डेट
इक्विटी) कर चुके हैं। दिसंबर में अमेरिकी सेंट्रल बैंक अगर ब्याज दरें
बढा देता है, तो भारत समेत एमरजिंग मार्केटस से विदेशी निवेश का पलायन तय
है। ट्रंप की जीत के बाद से पूरी दुनिया की स्टॉक मार्केटस इस आशंका से
पीडित है कि नए राष्ट्रपति की टैक्स कट्स और सख्त मौद्रिक नीतियां से
अमेरिकी केन्द्रीय बैंक (फेडेरल रिजर्व) ब्याज दरें बढा सकता है। इसी
संभावना के कारण अमेरिकी बांडस मार्केटस में हाथों-हाथ बिक रहे हैं। इस बात
की पहले से ही आशंका थी कि ट्रंप की जीत से अमेरिका और विकसित देशों के
बांडस एमर्जिंग मार्केटस की तुलना में ज्यादा मुनाफा कमाने वाले हो जाएंगे।
निवेशक अब सोना और बॉन्ड्स जैसे सुरक्षित इंस्ट्रूमेंटस में पैसा लगा
रहे हैं। वित्तीय विशेषज्ञों का आकलन है कि अगले 7-8 महीनों में रुपया
डॉलर के मुकाबले 70 को पार कर सकता है। अर्थव्यवस्था में अभी नोटबंदी का
प्लवन प्रभाव (स्पिलओवर इफेक्टस) नहीं देखा गया है मगर चौथी तिमाही में
इसका साफ असर देखा जा सकता है। अर्थशास्त्रियों का आकलन है कि नोटबंदी के
कारण आर्थिक गतिविधियों में खासी कमी आई है और अर्थव्यवस्था पटरी से उतर गई
है। इससे सकल घरेलू उत्पादन (जीडीपी) में 2 फीसदी की गिरावट आ सकती है।
स्टॉक मार्केटस की ताजा स्थिति मई, 2014 जैसी है। तब स्टॉक मार्केटस नव
निर्वाचित प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की नीतियों की प्रतीक्षा कर रही थीं
और इस क्रम में मार्केट परिवर्तनशील बनी हुई थी। और अब भारत समेत पूरी
दुनिया की मार्केटस अमेरिका के नव-निर्वाचित राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की
ओर ताक रही है। 20 जनवरी, 2017 को उनके पदग्रहण करने बाद ही मार्केट्स में
ठ्हराव की उम्मीद की जा सकती है।
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