बुधवार (16 नवंबर) को संसद का शीतकालीन सत्र शुरु होते ही नोटबंदी का मुद्दा राज्यसभा में छाया रहा। मगर विभाजित विपक्ष में न तो जन समस्याओं को शिद्दत से उठाने का मादा नजर आ रहा है और न ही सरकार को घेरने की संगठित रणनीति नजर आ रही है। परंपरा अनुसार लोकसभा की कार्यवाही दिवंगत सदस्यों को श्रंद्धाजलि देने के बाद दिन भर के लिए स्थगित कर दी गई। राज्य सभा ने अन्य सभी मामलों को दरकिनार करते हुए सबसे पहले नोटबंदी पर चर्चा की। और उम्मीद के मुताबिक सत्ता पक्ष ने सरकार की तारीफ के पुल बांधे और विपक्ष ने आम आदमी की असुविधा का हवाला देकर सरकार की खिंचाई की। उर्जा राज्य मंत्री और भाजपा के खजानची पीयूष गोयल का कहना था कि प्रधानमंत्री की नोटबंदी की कार्रवाई से ईमानदार आराम की नींद सो रहा हैै मगर भ्रष्ट की नींद हराम हो रखी है। कांग्रेस के आनंद शर्मा ने प्रधानमंत्री पर निशाना साधते हुए कहा कि वे देशवासियों को बताएं, उनकी जान को किन लोगों से खतरा है, कौन उन्हें मारना चाहता है“। रविवार को गोवा में प्रधानमंत्री ने जनसभा को संबोधित करते हुए कहा था कि “ कुछ लोग मेरी जान के पीछे पडे हैं और मुझे जान से मारना चाहते हैं क्योंकि उनकी 70 साल की लूट का भांडा फूट रहा है "। प्रधानमंत्री का इशारा कांग्रेस की ओर था और इसीलिए राज्यसभा में आनंद शर्मा ने अपने भाषण में इसका उल्लेख किया। बुधवार को विपक्ष की एकता फिर तार-तार होती दिखी। पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की अगुवाई में विपक्ष के सांसदों ने राष्ट्रपति भवन की ओर मार्च किया मगर इसमें न तो कांग्रेस और न ही वामपंथी दलों के सांसद थे। राजग की सदस्य और महाराष्ट्र में भाजपा के सहयोगी दल शिवसेना ने मार्च में शामिल होकर सत्तारुढ दल को असहज कर दिया है। अरविंद केजरीवाल की आम आदमी पार्टी के सांसद ममता के साथ थे मगर केजरीवाल खुद नदारद रहे। एक दिन पहले कांग्रेस, वामपंथी, आप और तृणमूल कांग्रेस ने शीतकालीन सत्र के दौरान मिलकर काम करने का दम भरा था। समकालीन भारतीय सियासत की यही सबसे बडी विडंबना है। सियासी दलों का न तो कोई स्पष्ट स्टैंड है और न ही कोई विचारधारा। सत्ता के लिए किसी भी हद तक जा सकते हैं और कुछ भी कर सकते हैं। नोटबंदी के मुद्दे पर भी सियासी दलों को आम आदमी की परेशानी से कही ज्यादा वोट बैंक की चिंता है। आठ नवंबर को प्रधानमंत्री द्धारा पांच सौ और एक हजार रु के नोट बंद कर देने के ऐलान से स्तब्ध विपक्षी दलों ने शुरु में इसे सराहा मगर जैसे ही लोगों को असुविधा होने लगी, विपक्ष ने इसे भुनाना शुरु कर दिया। माना कि नोटबंदी से लोगों को भारी असुविधा हो रही है मगर कोई भी सरकार जानबूझकर जनता की परेशानी का सबब नहीं बनना चाहती। पांच सौ और हजार रु की नोटबंदी आम लोगो के हित में उठाया गया कदम है पर नौकरशाही हर बार की तरह इस बार भी सरकार के सुधारात्मक कदम को ले डूबी। एक सप्ताह से अधिक समय गुजर जाने के बावजूद स्थिति सामान्य नहीं हो पाई है। बुधवार से कुछ बैंको ने नोट बदलने वालों के अंगुली पर स्याही लगाने का काम शुरु कर दिया। इस प्रकिया से बेंक कर्मियों का समय और जाया होगा और ग्राहकों की कतारें और लंबी होती जाएंगी। मोदी सरकार के समक्ष सबसे बडी चुनौती यह है कि जनमानस को नोटबंदी से उपजी परेशानी से कैसे निजात दिलाई जाए। बैंकों द्धारा ग्राहकों की अगुंलियों पर स्याही लाने से लोगों की परेशानी कम होने की बजाए बढेगी ही। सरकार का अब अपना पूरा ध्यान लोगों को “ कैश क्रंच“ के चक्रब्यूह से बाहर निकालने पर होना चाहिए। देश का कोई भी नागरिक ज्यादा देर तक अपने पैसे को निकालने पर लगाई गई रोक बर्दास्त नहीं करेगा।
गुरुवार, 17 नवंबर 2016
No End To Public Hardships After Modi Govt's Crackdown On Black Money
Posted on 7:53 pm by mnfaindia.blogspot.com/






