गुरुवार, 10 नवंबर 2016

काले धन पर सर्जिकल स्ट्राइक

   
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने काले धन पर सर्जिकल स्ट्राइक करके पूरी दुनिया को चौंका दिया है। प्रधानमंत्री की यह कार्रवाई पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर  में आतंकियों को मार गिराने की सर्जिकल स्ट्राइक से भी ज्यादा धारदार है। कर चोरी करके काले धन से देश  में समानांतर अर्थव्यवस्था चलाने वाले देश  के सबसे बडे  दुश्मन  हैं। और यह काला धन न केवल भारतीय अर्थव्यवस्था को ही खोखला कर रहा है, अलबत्ता लोकतंत्र को भी कमजोर कर रहा है। लोकसभा से लेकर पंचायत तक के चुनाव  काले धन के बलबूते लडे जाते है। प्रधानमंत्री मोदी इस बात के लिए बधाई के पात्र हैं कि उन्होंने काले धन से पनपती समानांतर अर्थव्यवस्था को धराषायी करने के लिए 10 नवंबर से 500 और 1000 रु के नोट बंद कर दिए हैं। आंकडें बताते हैं कि काला धन बडे नोटों में ही जमा रखा जाता है।  सरकार का अनुमान है कि 500 और 1000 रु के नोट बंद किए जाने से लगभग सवा  लाख  करोड रु की काली कमाई का खात्मा हो सकता है। आरबीआई के आंकडों अनुसार देश में इस समय लगभग 1,642,000 करोड नगदी का प्रचलन है और इसमें 86 फीसदी हिस्सा 500 और 1000 रु के नोटों का है। भारत सरकार के आर्थिक मामलों की सचिव के अनुसार 2011 से 2016 के दौरान जहां देश  की अर्थव्यवस्था में 30 फीसदी का इजाफा हुआ, वहीं मुद्रा प्रसार (सर्कुलेशन) में 40 फीसदी की वृद्धि हुई है। इस दौरान 500 रु के नोटों के प्रसार में 76 फीसदी और 1000 रु में 109 फीसदी का इजाफा हुआ है। इससे  स्पष्ट होता है कि देश  में छोटी मुद्रा की जगह बडी मुद्रा का प्रचलन कहीं ज्यादा है। जाहिर है कि 500 रु और 1000 रु के पुराने नोट बंद होने से काली कमाई करने वालों को जबरदस्त झटका लगा है। 36 साल बाद सरकार ने 500 रु और 1000 रु के पुराने नोटों का प्रचलन बंद किया है।  और ताजा कदम से कर चोरी करके छिपाए गई काली कमाई अब किसी काम की नहीं रह गई है।  सरकार के इस कदम से आम आदमी को कुछ परेशानी हो सकती है। सबसे ज्यादा परेशानी  शादी-ब्याह में मशगूल परिवारों को झेलनी पड सकती है।  स्थिति सामान्य होने में कई दिन लग सकते हैं। ऐसा पहली बार नहीं हुआ है। इससे पहले भी सरकार 10, 5 और 1 हजार के नोटों को बंद कर चुकी है। आजादी से पहले 1936 में पहली बार दस हजार रु के नोट प्रचलन में आए थे। 1946  में दस, पांच और एक हजार रु के नोटों का प्रचलन बंद कर दिया गया था । मगर 1953 में फिर दस हजार, पांच हजार और एक हजार के नोट छापे गए। 1978 में फिर बंद कर दिए गए थे। दस हजार रु के नोट का उपयोग काली कमाई में ज्यादा होता था, इसलिए सरकार ने दोबारा इन्हें नहीं छापा। निसंदेह, काली कमाई से न केवल  भष्टाचार बढता है, बल्कि हवाला, सट्टा, नशे  का कारोबार भी  पनपता हैं। और देश  की अखंडता पर प्रहार करने वालों को भी काली कमाई अथवा बडे नोटों की जाली करंसी से मदद की जाती है। पाकिस्तान पर आरोप है कि वह  500 और 1000 के जाली नोट छापकर भारतीय अर्थव्यवस्था को तबाह करने पर आमादा है। लगभग 400 करोड रु के 500 और 1000 रु के जाली नोट बाजार में है। तथपि पुराने बडे नोटों के बंद करने के बावजूद काली कमाई करने वाले सोना और चल संपति खरीद कर इसे जारी रख सकते हैं। बुधवार को सोना तीन साल के उच्चतम स्तर पर पहुंच गया था। रियल्टी सेक्टर तो काली कमाई के दमखम पर ही फल-फूलता है। सरकार ने कानून बनाकर इस सेक्टर पर नकेल डाली तो है मगर अभी भी यह पूरी तरह से नियंत्रित नही हो पाया है। सरकार ने अच्छी पहल की है और इसके सकारात्मक परिंणाम आ सकते हैं।