नोटबंदी पर संसद में तीन दिन से खूब हंगामा हो रहा है और यह स्वभाविक भी है। मोदी सरकार की नोटबंदी कार्रवाई से जनता हलकान हो रखी है। पूरे देश में नगदी का संकट है और सरकार ने लोगों पर अपना ही पैसा निकालने पर प्रतिबंध लगा रखा है। भला यह भी कोई बात हुई कि आयकर चुकाने के बाद अपना जमा पैसा निकालने के लिए आपको सरकार का मुंह ताकना पडे। यह कैसा लोकतंत्र है? इस स्थिति के मद्देनजर जनता के नुमाइंदों का लाल-पीला होना बनता है। तथापि संसद की कार्यवाही बाधित होने से सरकार का कुछ नहीं बिगडेगा। इससे जनता का ही नुकसान होगा। शुक्रवार को शीतकालीन सत्र के तीसरे दिन भी संसद कोई कामकाज नहीं निपटा सकी। राज्यसभा में कांग्रेस के वरिष्ठ नेता गुलाम नबी आजाद के नोटबंदी पर विवादास्पद वक्तव्य से भडका सता पक्ष उनसे माफी मांगने पर अडा रहा और विपक्ष नोटबंदी के मुद्दे को उछालता रहा। नतीजतन, उपसभापति पीजी कुरियन को सदन की बैठक सोमवार तक के लिए स्थगित करनी पडी। लोकसभा में भी विपक्ष नोटबंदी पर सदन में प्रधानमंत्री के वक्तव्य की मांग पर अडा रहा। सरकार ने इसे नहीं माना और विपक्ष ने सदन की कार्यवाही नहीं चलने दी और बेठक सोमवार तक के लिए स्थगित कर दी गई। लंबे समय से यही सिलसिला चलता आ रहा है। जैसे ही जनहित से जुडा ज्वलंत मुद्दा विपक्ष के हाथ लगता है, उसका खामियाजा संसद को भुगतना पडता है। विपक्ष सदन की कार्यवाही नहीं चलने देता। यह सिला बोफोर तोप सौदे से लेकर, दूर-संचार घोटाला, तहलका, कॉमनवैल्थ स्कैम, 2जी स्कैम, कोलगेट और अब नोटबंदी तक बदस्तूर जारी है। बोफोर्स तोप स्कैम को लेकर विपक्ष ने 45 दिन तक संसद की कार्यवाही को बाधित रखा था। सरकार के पास प्रचंड बहुमत था, इसलिए सरकारी कामकाज बाधित नहीं हो पाया। और भाजपा इस लॉगजैम में सबसे आगे थी। नरसिंह राव सरकार के समय विपक्ष ने दूर-संचार घोटाले पर 15 दिन तक संसद को चलने नहीं दिया था। अटल बिहारी वाजपेयी सरकार के समय तहलका पर दो सप्ताह तक संसद की कार्यवाही बाधित रही मगर सरकारी काम काज जैसे-तैसे निपटा लिया गया। 2जी स्कैम और कोलगैट पर विपक्ष ने संसद नहीं चलने दी और न ही सरकारी कामकाज हो पाया। एक अध्ययन के मुताबिक जब कभी संसद में किसी ज्वलंत नुद्दे पर सता पक्ष और विपक्ष में तनातनी होती है, तब लोकसभा का 77 फीसदी और राज्यसभा का 72 फीसदी कामकाजी समय जाया हो जाता है। सरकारी आंकडों के अनुसार संसद की एक मिनट की कार्यवाही पर 2. 5 लाख रु का खर्च आता है। यानी एक घंटे की कार्यवाही बाधित होने पर जनता की कमाई के 15 करोड रु जाया हो जाते हैं। 2जी स्कैम के समय तब संसद के शीतकालीन सत्र के शुरु में ही संसद की कार्यवाही के 114 घंटे ( 1710 करोड) हंगामे की भेंट चढे थे। पिछले तीन दिन से (लोकसभा दो दिन) से संसद की कार्यवाही बाधित करके सांसद जनता का 150 करोड रु से ज्यादा जाया कर चुके है। जनता के नुमाइंदों ने जनहित के नाम पर संसद की कार्यवाही बाधित कर कितना पैसा बर्बाद करवाया है, इसका हिसाब लगाया जाए तो यह अपनेआप में देश का सबसे बडा स्कैम साबित होगा। अब सवाल यह है कि आखिर जनता के नुमाइंदे यह सब किसके लिए करते हैं? संसद की कार्यवाही बाधित करके करोडों रु स्वाह करके जनता का कौनसा भला हो रहा है? सांसद इस बात पर क्यों गंभीरता से विचार नहीं करते कि संसद की कार्यवाही बाधित करने के अलावा और भी बेहतर विकल्प है? सांसद सदन के भीतर कार्यवाही को बाधित करने की बजाए बाहर शांतिपूर्वक धरना देकर अपना विरोध जता सकते हैं। इससे जनता का पैसा बरबाद होने से बच जायगा और जनता के नुमाइदें अपना विरोध प्रदर्शन भी करा पाएंगे। जनता के नुमाइंदों को इस बात पर गंभीरता से विचार करना चाहिए।
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