नोटबंदी पर संसद में एकजुट दिख रहा विपक्ष सोमवार को “भारत बंद“ पर पूरी तरह से बिखर गया। बंद पर वामपंथी अकेले पड गए और यह टांय-टांय फुस्स हो गया। और-तो-और नोटबंदी का सबसे मुखर विरोध कर रही पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने भी इस बंद मे हिस्सा नहीं लिया। इस बंद का आहवान वामपंथी दलों ने किया था, इसलिए ममता बनर्जी का इसमे हिस्सा लेने की कोई गुजांइश नहीं थी। ममता को वामपंथी फूटी आंख भी नहीं सुहाते हैं। “बहन जी“ मायावती की बहुजन समाज पार्टी ने भी बंद से कन्नी काट ली। कांग्रेस को आखिरी समय पर समझ में आ गया कि नोटबंदी से त्रस्त जनता को अगर “बंद“ से और ज्यादा परेशान किया गया, तो 'लेने के देने' पड़ सकते हैं । वैसे भी कर्नाटक को छोड़कर , हिमाचल, उतराखंड और पुडुचेरी जैसे छोटे राज्यों में सिमटी ग्रांड ओल्ड पार्टी में अब पूरे देश में जनता को जुटाने का मादा बचा ही कहां है? जनता दल (यू) नीतिश कुमार की प्रधानमंत्री से जुगलबंदी के कारण न पक्ष में है और न ही विपक्ष में। समाजवादी पार्टी का मायावती से छत्तीस का आंकडा है, इसलिए यह पार्टी उस मोर्चे का कतई साथ नहीं देगी जिसमें बसपा शामिल है। और न ही कांग्रेस का साथ देगी। लालू प्रसाद यादव की आरजेडी, बीजू पटनायक की बीजेडी और तेलंगाना में सत्तारूढ टीआरएस जैसे क्षत्रप भी बंद में शामिल नहीं हुए। केरल और त्रिपुरा को छोडकर भारत बंद का कहीं कोई असर नहीं रहा। इन दोनों राज्यों में वामपंथी सरकार है। नोटबंदी पर संसद की कार्यवाही की बाधित करने के सिवा विपक्ष और कुछ भी करने की स्थिति मे नहीं है। एक-दूसरे की टांग खींचते-खींचते देश का विपक्ष अपना वजूद ही खो चुका है। अब तक विपक्ष की एकता के सारे-के-सारे प्रयोग टांय-टांय फुस्स होते रहे हैं। इस बार भी यही हुआ। टीवी चैनल्स पर जिस तरह से जनता को हजार अवरोधों के बावजूद नोटबंदी पर प्रधानमंत्री का समर्थन करते दिखाया जा रहा है, अगर विपक्ष इससे भी विश्वसनीय नहीं मानता है, तो खुद इस बात का पता लगाता कि जनता आखिर चाहती क्या है। नोटबंदी पर मारी-मारी फिर रही जनता के पहले से अस्त-व्यस्त जनजीवन को और ज्यादा असहज करने का कोई औचित्य नहीं था। जनता नोटबंदी पर प्रधानमंत्री के साथ है, यह बात भाजपा की सहयोगी शिवसेना को भी समझ में आ गई है। इसी कारण नोटबंदी की मुखर आलोचक शिवसेना पैंतरा बदल कर अब इसकी भूरि-भूरि प्रंशसा कर रही है। सोमवार को भारत बंद की विफलता को लेकर सोशल साइट टवीटर पर इसका खूब मजाक उडाया गया। जमीनी हकीकत को दरकिनार करते हुए विपक्ष संसद को चलने नहीं दे रहा है। सोमवार को विपक्ष लोकसभा में प्रधानमंत्री की उपस्थिति पर अडा रहा । रविवार को प्रधानमंत्री ने नोटबंदी के खिलाफ विपक्ष के बंद को“ करप्शन बंद“ बताया था। इस पर भी विपक्ष तिलमिलाया हुआ है। सबसे बडा दुर्भाग्य यही है कि राज्यों में तो विपक्ष है मगर केन्द्र में नहीं है। और इन क्षत्रपों में अपने-अपने राज्यों में राश्ट्रीय दलों को रोकने का मादा है मगर केन्द्र में आते-आते क्षत्रप भी कमजोर पड जाते हैं। कांग्रेस ही नहीं, देश का कोई भी राजनीतिक दल परिवर्तन की बयार को स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं है। पूरी दुनिया में राजनीति के अस्त्र-शस्त्र और शास्त्र में तेजी से बदलाव आ रहा है। 2014 में राष्ट्रीय राजनीति में नौसिखिए माने जाने वाले नरेन्द्र मोदी को प्रचंड जनादेश मिलना और अमेरिका में परंपरागत सियासी नेता की जगह सफल कारोबारी और् पहली बार चुनावी अखाडे में उतरे डोनाल्ड ट्रंप का चुना जाना इस बदलाव के संकेत नहीं है? मगर देश के राजनीतिक दल आज भी बीसवीं शताब्दी के युग में जी रहा है। घिसे-पिटे प्रयोग, बंद, संसद की कार्यवाही बाधित करना , जात-पात, ”तुष्टिकरण और वोट की राजनीति- पर आश्रित रहना सियासी दलों की नीयति बन चुकी है। दीवारों पर लिखी इबादत साफ-साफ कह रही है कि जनता बदलाव चाहती है। विपक्ष अगर समय पर नहीं चेता तो उसी का नुकसान होगा। जनता अपना मन बना चुकी है।
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