बुधवार, 9 नवंबर 2016

थेरेसा मे की भारत यात्रा

           
भारत पर दो सदी से भी ज्यादा समय तक निरंकुश  राज करने वाले ब्रिटेन की प्रधानमंत्री थेरेसा मे ने अपनी पहली विदेश  यात्रा के लिए भारत को यूं ही नहीं चुना है। भारत, चीन के बाद दुनिया की विशालतम मार्केट है। चीन की तुलना में भारत के साथ व्यापार करना और भी ज्यादा सुविधाजनक है। ब्रिटेन को इस समय अविलंब विष्वसनीय ट्रेड पार्टनर की जरुरत है। थेरेसा मे ने ब्रिटेन के प्रधानमंत्री का पदभार ऐसे नाजुक समय में सभाला है जब  मंदी से पीडित वैश्विक  अर्थव्यवस्था में  ब्रिटेन को यूरोपियन यूनियन से बाहर आकर अपना अलग वजूद स्थापित करना पड रहा है। 1973 में ब्रिटेन यूरोपियन यूनियन  की  पूर्वज यूरोपियन इक्नॉमिक कम्युनिटी (ईईसी) में शामिल हुआ था। 1975 में 67 फीसदी जनमत संग्रह के साथ ब्रिटेन का जनमानस  ईईसी में  शामिल होने के पक्ष में था। 2015 तक ब्रिटेन की जनता ईईसी अथवा यूरोपियन यूनियन (ईयू) में बने रहने के पक्ष में थी हालांकि लेबर पार्टी और विभिन्न श्रमिक संगठन इसके पक्ष में नहीं थे। लेबर पार्टी  शुरु से ही ब्रिटेन के  यूरोपियन यूनियन में  शामिल होने की विरोधी रही है। 2016 आते-आते ब्रितानवी जनमानस में यूरोपियन यूनियन से मोह भंग हो चुका था। संभवतय, यूनान के आर्थिक संकट ने ब्रितानवी जनमानस को झकझोर  कार रख दिया। जून 2016 के जनमत संग्रह में 52 फीसदी ब्रितानवी जनता ने ब्रिटेन को  यूरोपियन यूनियन से बाहर आने (ब्रिक्जिट) के पक्ष में फतवा दिया। इससे पहले एक बार 1980 में 65 फीसदी ब्रितानवी जनता ने ईयू को नकारा था। यह मारगेट थैचर के प्रधानमंत्रित्व का पहला साल था। 1957 में यूरोपियन इक्नॉमिक कम्युनिटी की स्थापना हुई थी मगर ब्रिटेन  1973 तक इसका सदस्य नहीं बना। सदस्य बनने के लिए ब्रिटेन को नाक रगडने पडे। 1963 औरा 1967 में ब्रिटेन ने ईईसी की सदस्यता के लिए आवेदन किया मगर दोनों ही बार फ्रांस के कडे विरोध से इसे नामंजूर कर दिया। तब फ्रांस के राश्ट्रपति चार्ल्स डी गॉल का कथन था कि ब्रिटेन की काफी सारी आर्थिक गतिविधियां और प्रणालियां यूरोप से मेल नहीं खाती है। इसी कारण ब्रिटेन को यूरोपियन संघ की सदस्यता पाने के लिए अपनी अर्थव्यवस्था को यूरोप मुताबिक एडजस्ट भी करना पडा।  1979 में ब्रिटेन यूरोपियन एक्सचेंज रेट व्यवस्था (ईआरएम) से बाहर आ गया था मगर 1990 आते-आते फिर ईआरएम से जुड गया और उसकी करंसी को ड्यूश -मार्क  से जोड दिया गया। इससे पाउंड कमजोर हो गया और 1992 में ब्रिटेन फिर ईआरएम से बाहर आ गया। तब करंसी सटटे के कारण ब्रिटेन को 3 अरब पाउंड का नुकसान उठाना पडा था। और अब यूरोपियन यूनियन से बाहर आकर 2019 तक ब्रिटेन को गैर-यूरोपियन यूनियन व्यवस्था कायम करनी पडेगी। ब्रिटेन अभी पूरी तरह स ईयू से बाहर नहीं आया है, इस कारण वह अभी स्वतंत्र ट्रेड करार नहीं कर सकता मगर 2019 के बाद के ले जमीन तैयार कर सकता है। इसी कडी में प्रधानमंत्री थेरेसा मे भारत की यात्रा पर आईं हैं। यूरोपियन यूनियन के साथ 2007 में आखिर व्यापार वार्ता हुई थी मगर यह सिरे नहीं चढ पाई। यूरोपियन संघ (ईयू)  27 सदस्यों का ताकतवर संगठन है  और इसके अधिकतर सदस्य ब्रिटेन से खफा है। यूरोपियन संघ का साझा व्यापार है। यूरोप में ब्रिटेन करीब-करीब अकेला पड चुका है। उसे मजबूत अर्थव्यवस्थाओं से सहयोग की जरुरत है। ब्रिटेन के कारोबारी डरे हुए हैं और उन्हें भी मार्केटस की दरकार है। भारत तेजी से उभरती अर्थव्यवस्था है और ब्रिटेन की तरह लोकतांत्रिक देश  भी। उसके पास बहुत बडा बाजार तो है ही, साथ में दुनिया का सबसे बडा  मानव संसाधन  खजाना भी है। अगर ब्रिटेन भारत में बाजार तलाष रहा है, तो भारत को भी ब्रिटेन में मुक्त आवाजाही की दरकार है और वीजा से जुडी सख्ती को नरम  करने की मांग कर रहा है। स्वदेश  लौटने से पहले ब्रिटेन की प्रधानमंत्री को अगर भारत से इस हाथ कुछ लेना है, तो उस हाथ देना भी होगा।