बुधवार, 2 नवंबर 2016

भोपाल जेल प्रकरण: खंडवा से भी सबक नहीं सीखा

मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल की जेल से दीवाली की रात भागे सभी 8 आतंकियों को चंद घंटों में मार गिराकर राज्य पुलिस भले ही अपनी पीठ थपपथाए मगर यह घटना अपने पीछे कई सवाल छोड गई है। भोपाल की जेल देश के सबसे सुरक्षित  कारागारों में  शुमार है। फिर भी, स्टूडेंटस इस्लामिक मूवमेंट ऑफ इंडिया (सिमी) से संबंधित 8 आतंकी रविवार रात जेल के एक  सिपाही का गला रेतकर और दूसरे के हाथ-पांव बांधकर  30 फीट ऊंची दीवार फांदकर फरार हो गए ।  आठ घंटों के भीतर पुलिस की एंटी टेर्रिस्ट स्क्वैड (एटीएस) ने  सभी फरार आतंकियों को ढेर कर दिया। मारे गए आतकियों में दो तीन साल पहले के खंडवा जेल ब्रेक में भी संलिप्त थे । इन आतंकियों पर  हत्या, विध्वसंक गतिविधियों में संलिप्तता एव देशद्रोह जैसे संगीन मामले चल रहे थे। 1977 में स्थापित  स्टूडेंटस इस्लामिक मूवमेंट ऑफ इंडिया (सिमी)  को सरकार ने 2001 में प्रतिबंधित कर दिया था। इस पूरे प्रकरण पर कई सवाल उठ रहे हैं। त्योहारी सीजन के  दृष्टिगत केन्द्र ने पूरे देश में हाई अलर्ट जारी किया था और दीवाली के पर्व पर खासतौर पर सतर्क रहने को कहा गया था। मगर भोपाल की जेल में मात्र दो सुरक्षाकर्मी ही तैनात थे जबकि  इस कारागार में दुर्दांत आतंकी बंद थे। जेल मैन्युलस के अनुसार किसी भी जेल में 8 से ज्यादा खूखांर अपराधियों को नहीं रखा जा सकता। इसके बावजूद भोपाल की जेल में  35 दुर्दांत आतंकी रखे गए थे। भोपाल के मुख्य जेलर एलकेस भदौरिया ने खुद माना है कि “यह तो होना ही था“। 35 आतंकियों को एक साथ एक ही जेल में रखा जाए, ऐसी घटना तो होगी ही। यह भारी सुरक्षा चूक है। जेल प्रशासन इस बारे सरकार को कई बार आगाह कर चुका था मगर उनकी बात पर ध्यान नहीं दिया गया। जिस जेल में  35 दुर्दांत आतंकियों को रखा गया हो, वहां मात्र दो पुलिसकर्मी को तैनात किया जाए, इससे तो यही संदेश जाता है कि राज्य सरकार सिमी के आतंकियों को भागने का  अवसर देना चाहती थी हालांकि  इससे पहले सिमी के आतंकी 2013 में खंडवा जेल से भी फरार हो चुके थे। राज्य सरकार ने इस घटना से भी कोई सबक नहीं सीखा। इसके क्या अभिप्राय लगाए जाएं? राज्य पुलिस के आईजी का यह बयान भी काफी दिलचस्प है कि आतंकियों से सात हथियार मिले हैं। इससे पहले कहा गया था कोई हथियार नहीं मिले। यह विरोधाभास क्यों? इसने कई आशंकाओं को जन्म दिया है। सवाल किया जा रहा है कि सिमी के आतंकियों को हथियार कहां से मिले? जेल से फरार होते समय आतंकियों के पास हथियार के नाम पर केवल चमच थे, बाहर आते ही वे गन्स से कैसे लैस हो गए? यह बात भी काफी रहस्यपूर्ण है कि जेल से फरार होने के आठ घंटों तक आतंकी भोपाल के समीप ही जमे रहे जबकि इतने समय में वे काफी दूर निकल सकते थे। इस दौरान सोशल मीडिया पर कुछ वीडियो दिखाए गए हैं, जिनसे एटीएस के आतंकियों को मुठभेड में मार गिराने के दावों की  पुष्टि नहीं होती है। निसंदेह, देश में आतंक फैलाकर उसकी अखंडता पर प्रहार करने वाले देशद्रोही किसी भी तरह की दया के पात्र नहीं है और इन्हें सख्त से सख्त सजा मिलनी चाहिए। जेल के सुरक्षाकर्मियों की हत्या करके फरार होना और  भी संगीन अपराध है मगर लोकतंत्र और सभ्य समाज में अपराधियों के  फैसले सडकों पर मुठभेड से नहीं किए जाते। अपराधियों को सजा देना न्यायपालिका का काम है। सुरक्षा में हुई भारी चूक को  मध्य प्रदेश सरकार सिमी के आठ आतंकियों को मार गिराने का श्रेय लेकर पूरा नहीं कर सकती। और न ही इस चूक को यह कहकर छिपाया जा सकता है कि आतंक से जुडे मामलों पर राजनीति नहीं होनी चाहिए।  आतंकियों को मार गिराना पुलिस की डयूटी है। ऐसे मामलों में बार-बार भारी चूक होना यही  दर्शाता है कि देश में पुलिस का भारी-भरकम अमला अब किसी काम नहीं रह गया है।