बुधवार, 9 मार्च 2016

Don't Tax Savings, Extend Social Security To All

भारी दबाव के समक्ष नतमस्तक होकर अततः वित्त मंत्री अरुण जेटली ने कर्मचारी भविष्य  निधि अथवा ईपीएफ पर प्रस्तावित टैक्स वापस ले लिया। मंगलवार को संसद में इस आशय की घोषणा करते हुए वित्त मंत्री ने कहा कि ईपीएफ निकासी पर  टैक्स का प्रस्ताव फिलहाल टाल दिया गया है। सरकार की इस घोषणा से लगता है कि कर्मचारियों की भविष्य निधि पर टैक्स पुनः लगाया जा सकता है। पिछले दिनों प्रधानमंत्री ने वित्त मंत्री से इस टैक्स पर पुनर्विचार करने को कहा था। इससे  इस टैक्स के रोल बैक किए जाने की संभावनाएं बढ गईं थी। भविष्य निधि पर प्रस्तावित टैक्स लगने से लगभग छह करोड कर्मचारी प्रभावित होने वाले थे। बजट में अप्रैल 2016 के बाद कर्मचारी भविष्य निधि से 40 फीसदी पैसा निकालने पर टैक्स लगाया गया था। इतना ही नहीं सरकार ने कर्मचारी भविष्य निधि में  जमा होने वाले नियोक्ता (इम्पलॉयर) अंशदान पर भी टैक्स लगाया था।  देश  भर में इस प्रस्ताव के खिलाफ आवाज उठी थी। सोशल मीडिया पर एक लाख से अधिक लोगों ने ह्स्ताक्षरयुक्त ऑनलाइन याचिका भी अपलोड की थी और “रोलबैक ईपीएफ हेशटैग“ कई दिनों तक चलता रहा। भाजपा के अधिकांश  सांसद भी इस टैक्स के खिलाफ थे। सरकार का तर्क  था कि नेशनल पेंशन फंड को प्रोत्साहित करने के मकसद से कर्मचारी भविष्य निधि से पैसा निकालने पर टैक्स लगाया था। इस बात में कोई दम नहीं है। कर्मचारी भविष्य निधि कॉंट्रिब्युटरी  फंड है और इसमें नियोक्ता का  बराबर  (न्यूनतम 10 से 12 फीसदी) योगदान  वैधानिक तौर पर अनिवार्य है। नेशनल पेंशन फंड में ऐसा कोई प्रावधान नहीं है। केन्द्र सरकार ने 2011-12 से पांच साल के लिए (2016-17 तक) नेशनल पेंशन योजना में अपनी तरफ से अधिकतम हर माह एक हजार जमा  कराने की “स्वालंबन योजना “ चला रखी है मगर यह असंगठित क्षेत्र के कर्मचारियों के लिए  है। संगठित क्षेत्र के कर्मचारी इसकी जद से बाहर हैं। सरकार अगर नेशनल पेंशन स्कीम (एनपीएस)  को प्रोत्साहित करना ही चाहती है, तो कर्मचारी भविष्य निधि को बंद करके इसे एनपीएस में क्यों नहीं मिला देती? नेशनल पेंशन स्कीम में दो तरह के विकल्प भी हैं और कर्मचारी अपनी सुविधानुसार इन विकल्पों को चुन सकते हैं। इन विकल्पों में मध्यावधि अथवा जरुरत पडने पर पैसा निकालना शामिल हैं।  सरकार के इस तर्क  में भी कोई दम नहीं है कि ईपीएफ पर टैक्स लगाए जाने से लोग एकमुश्त  पैसा निकालने के प्रति हतोत्साहित होंगे। ईपीएफ से अत्यावश्यक  जरुरत अथवा रिटायरमेंट  के समय पैसा निकाला जाता है और दोनों ही परिस्थितियों में कर्मचारी टैक्स लगने पर भी पैसा निकालने के लिए विवश हैं । सरकार को अगर वाकई ही निजी क्षेत्र के कर्मचारियों की इतनी ही चिंता है तो भविष्य निधि पर टैक्स लगाने की बजाय उन्हें सामाजिक सुरक्षा मुहैया क्यों नहीं कराती? निजी क्षेत्र के अधिकतर कर्मचारी रिटायरमेंट तक बच्चों की  शिक्षा, विवाह और अन्य जिमेदारियां निभाते-निभातेे अपनी बचत का बडा हिस्सा खर्च कर देते हैं। इन जिम्मेदारियों को निभाने के लिए उन्हें भविष्य निधि से भी पैसा निकालना पडता है।  एक अध्ययन के मुताबिक 70 फीसदी से ज्यादा कर्मचारी रिटायरमेंट तक ईपीएफ से काफी पैसा निकाल लेते हैं। विकसित देशों  में बुजुर्गों को वृद्धावस्था में पेंशन और मेडिकल सुविधा समेत प्रर्याप्त सामाजिक सुरक्षा दी जाती है। उन्हें रिटायरमेंट की  चिंता करने की जरुरत  ही नहीं पड़ती । फिर भारत में ऐसा क्यों नहीं? देश  के लॉमेकर्स अपने लिए  हर तरह की सुविधा जुटा लेते हैं। सांसदों और विधायकों को पेंशन की सुविधा है। उन्हें आयकर भी नहीं देना पडता है और सस्ता आवास और वाहन खरीदने के लिए कर्ज भी मिलता है । हाल ही में सरकार ने सांसदों  को टोल टैक्स से भी फ्री करा दिया  है ।  मगर उस गरीब जनता का क्या जो उन्हें इन सब का हकदार बनाती है? मोदी सरकार को अगर कर्मचारियों की बचत पर टैक्स ही लगाना है, तो इसे  देश  के हर बुजुर्ग को साठ साल के बाद पेंशन देने के लिए लगाया जाना चाहिए। शिक्षा के लिए धन जुटाने के वास्ते अगर  शुल्क लगाया जा सकता है, तो सामाजिक सुरक्षा से महरुम बुजुर्गों को भी पेंशन सुविधा देने के लिए टैक्स लगाया जा सकता है। इस तरह की पहल का कोई भी मुखर विरोध नहीं करेगा। दुख इस बात है कि हर तरह की सुविधाओं से संपन्न देश  के लॉमेकर्स को गरीब और बेसहारा लोगों की कोई चिंता नहीं है।