दुनिया के सबसे ज्यादा खुशमिजाज शहर बेल्जियम की राजधानी ब्रसेल्स का मंगलवार सुबह ही मिजाज बिगड गया था। इस्लामिक स्टेट के आतंकियों ने ब्रसेल्स एयरपोर्ट पर आत्मघाती बम धमाके करके 14 लोगों को और इस घटना के कुछ देर बाद मेट्रो स्टेशन पर बम फोडकर 21 को बेमौत मार डाला। पेरिस हमले के आरोपी सालेह अब्देसलाम की गिरफ्तारी के मात्र चार दिन बाद ब्रसेल्स पर आतंकी हमले सीधे-सीधे यूरोप की सुरक्षा व्यवस्था को खुली चुनौती है। ब्रसेल्स हमले ने इस सच्चाई को फिर उजागर किया है कि इस्लामिक आतंकी कभी भी और कहीं भी हमले कर सकते हैं। आतंकी सालेह अब्देसलाम पिछले शुक्रवार (18 मार्च) को ही ब्रसेल्स से गिरफ्तार किया गया था। चार माह से वह मारा -मारा फिर रहा था और पुलिस उसे तलाश रही थी। पिछले साल पेरिस हमले के लिए असलाह जुटाने में अब्देसलाम की प्रमुख भूमिका रही है। उसकी गिरफ्तारी के फौरन बाद बेल्जियम की राजधानी पर पेरिस की तरह आतंकी हमले साफ-साफ बता रहे हैं कि यूरोप में मुकम्मल सुरक्षा व्यवस्था के दावों में कोई दम नहीं है। ब्रसेल्स पर हमला करके इस्लामिक स्टेट के आतंकियों ने अपनी ताकत और पहुंच भी दिखा दी है। फ्रांस की राजधानी पेरिस और बेल्जियम की राजधानी ब्रसेल्स की गणना यूरोप के उम्दा सुरक्षित शहरों में की जाती है और इन्हें अपेक्षाकृत शान्ति का प्रतीक माना जाता है। इसीलिए, इस्लामिक स्टेट के आतंकियों ने जानबूझकर पेरिस और ब्रसेल्स को हमले के लिए चुना। ब्रसेल्स यूरोपियन यूनियन का मुख्यालय भी है। मीडिया की ताजा रिपोर्टस में खुलासा किया गया है कि ब्रसेल्स पर आतंकी हमलों के लिए खालिद और ब्राहीम अल-बकरावी नाम के दो भाई प्रमुख रुप से जिम्मेदार हैं। ब्राहीम अल-बकरावी मे ब्रसेल्स के जैवेनटेम हवाई अड्डे पर आत्मघाती हमले किए और उसके भाई खालिद ने मेट्रो स्टेशन पर आत्मघाती विस्फोट किए। पहले नाजिम लाचारावी नाम के एक तीसरे आतंकी का नाम आया था। हमले से ठीक पहले की सीसीटीवी फुटेज में नाजिम को देखा गया था। ब्रसेल्स पुलिस ने अब इसका नाम वापस ले लिया है। बहरहाल, सवाल यह है कि अत्याधुनिक तकनीक से लैस सुरक्षा एजेसिंयों को हमले से पहले दहशतगर्ताओं की गतिविधियों की भनक क्यों नहीं लग पाती? बेल्जियम के गृहमंत्री ने माना है कि सालेह अब्देसलाम की गिरफ्तारी के बाद खुफिया सूचनाएं मिलीं थी कि आतंकी बदले की कार्रवाई कर सकते हैं। इसके बावजूद सुरक्षा व्यवस्था को चाक-चौबंद नहीं किए जाने से जनमानस में असुरक्षा की भावना घर जाना स्वभाविक है। इन हमलों से यह भी पता चलता है कि विभिन्न सुरक्षा एजेसिंयों में अभी भी तालमेल की भारी कमी है और न ही इंटेलीजेंस शेयरिंग, सर्विलेंस और तसल्लीबक्श मॉनिटरिंग हो पा रही है। आतंक से निपटने के लिए यह सब बेहद जरुरी है। पेरिस और ब्रसेल्स हमलों ने यूरोप की सास्कृतिक विविधता (मल्टी कल्चरिज्म) एवं उदारवादी (लिबरलिज्म) नीतियों पर भी सवाल खडा कर दिया है। विगत एक दशक के दौरान यूरोप पर जितने भी आतंकी हमले हुए हैं, उन सब में स्थानीय लोग शामिल हैं। उदारवादी नीतियों और सांस्कृतिक विविधता के कारण ही यूरोप शरणार्थियों के संकट से जूझ रहा है। इसी वजह यूरोप और अमेरिका में दक्षिणपंथी और ज्यादा ताकतवर भी हो रहे हैं। अमेरिका में रिपलिकन पार्टी की राष्ट्रपति उम्मीदवारी दौड में सबसे आगे चल रहे डोनाल्ड ट्रंप पहले ही मुस्लिम विरोधी बातें कर रहे हैं। यह उनका प्रमुख चुनावी मुद्दा है। ताजा हमले यूरोप को शरणार्थी संकट से निपटने के लिए नये सिरे से सोचने पर विवश कर सकता है। आतंक से निपटने के लिए साझा रणनीति की अविलंब जरुरत है। भारत लंबे समय से आतंक से निपटने के लिए विश्वव्यापी रणनीति बनाने पर जोर दे रहा है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी 30 मार्च को बेल्जियम के दौरे पर जा रहे हैं। उनकी बेलिज्यम यात्रा के दौरान यूरोपियन नेताओं से बातचीत में आतंक प्रमुख मुद्दा हो सकता है।
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