“माललिया“ , भाग लिए
एक जमाने के “हैंडसेम रईस“ और देश के सबसे बडे शराब कारोबारी किंगफिशर के मालिक एवं राज्यसभा सदस्य विजय माल्या इन दिनों खूब सुर्खियों में हैं। देश के 17 बैकों का नौ हजार करोड़ रु डकारने के बाद विजय विट्ठल माल्या विदेश भाग गए और बैंक हाथ मलते रह गए। बैकों ने माल्या को विदेश जाने से रोकने और पैसा न लौटाने पर उन्हें गिरफ्तार कराने के लिए अदालत का दरवाजा खटखटा रखा है। बैंकों ने इग्लैंड की महशूर शराब बनाने वाली कंपनी डियाजियो से माल्या को मिले 515 करोड रु को जब्त करने की भी भरपूर कोशिश की। कर्ज वसूली ट्रिब्यूनल (डीआरटी) ने डियाजियो को माल्या को 7.5 करोड डॉलर ट्रांसफर करने पर भी रोक लगा दी मगर बाद में पता चला यह धन माल्या के खाते में पहले ही जमा हो चुका है। माल्या को युनाइटेड स्पिरिट्स का चेयरमैन पद छोडने के एवज में डियाजियो से यह पैसा मिला था। माल्या अपनी शराब बनाने की कंपनी इंग्लैड की डियाजियो को बेच चुके हैं। किंगफिशर एयरलाइंस चलाने के लिए विजय माल्या ने 17 बैंकों से नौ हजार करोड रु का कर्ज लिया था। इसमेंसे सात हजार करोड रु माल्या को अभी भी चुकाने हैं । सबसे ज्यादा स्टेट बैंक ऑफ इंडिया का 1600 करोड और पीएनबी तथा आईडीआईबी का 800-800 करोड फंसा है। 2012 के बाद माल्या ने बैंकों का ब्याज तक नहीं चुकाया, मूल धन लौटाना तो दीगर रहा। इसके अलावा माल्या किंगफिशर एयरलाइंस के कर्मचारियों की कई माह की तनख्वाह भी डकार गए। कर्मचारी न्यायालय की शरण में भी गए और उन्हें वहां से न्याय भी मिला मगर तनख्वाह नहीं मिली। स्टेट बैंक ने अपना पैसा वसूलने के लिए विजय माल्या के गोवा स्थित आलीशान बंगले को न्यायालय की मदद से हासिल भी कर लिया मगर एसबीआई आज तक इस बंगले को अपने कब्जे में नहीं ले पाया। माल्या ने इस बंगले को बतौर कोलेटर सिक्योरिटी स्टेट एसबीआई के पास गिरवी रखा था। एसबीआई की चैयरमैन अरुणधति भट्टाचार्य के अनुसार हाई कोर्ट ने कलेक्टर को तीन माह के भीतर इस बंगले को एसबीआई के सुपुर्द करने के आदेश दिए थे मगर संबंधित अधिकारी मामले को टालता रहा। आठ बार सुनवाई की और फिर छुट्टी चला गया। नियमानुसार ऐसे मामलों में कलेक्टर को सुनवाई का कोई अधिकार नहीं है और उसे अदालत के आदेशों का पालन करना पडता है। इस प्रसंग से पता चलता है कि देश में रसूखदार किस तरह से कानून को ठेंगा दिखाते हैं। बैंक पुलिस की मदद से कर्जा वसूलने के लिए गरीबों की संपति नीलाम करने में जरा भी देर नहीं लगाते, पर रसूखदारों से अदालत की मदद से भी कर्जा वसूल नहीं पाते। साफ है कि देश की भरष्ट शासकीय तंत्र रसूखदारों की खुलकर मदद करता है। माल्या को एसबीआई एक साल पहले पूरी तरह (टोटली) डिफॉल्टर घोषित कर चुका है। दो और बैंक भी ऐसा ही कर चुके हैं। माल्या के अलावा उनकी होल्डिंग कंपनी युनाइटेड ब्रीवरीज और किंगफिशर एयरलाइन को भी टोटली डिफॉल्टर घोषित किया जा चुका है। प्रवर्तन निदेशालय ने उनके खिलाफ मनी लॉड्रिंग का मामला दर्ज कर रखा है। प्रवर्तन निदेशालय इस बात की भी जाच कर रहा है कि माल्या ने कहीं विदेशी मुद्रा कानून का उल्लघंन तो नहीं किया है। सीबीआई भी इस मामले की जांच कर रही है। माल्या पर यह भी आरोप हैं कि उन्होंने बैंकों के लिए कर्ज से लगभग चार हजार करोड रु अपने विदेशी खातों में जमा किए हैं। जुलाई से सीबीआई इस मामले की भी जांच कर रही है। आश्चर्यजनक बात यह है कि बैंकों ने अभी तक माल्या को फ्रॉड घोषित नहीं किया है जबकि ऐसे मामले में आम आदमी के साथ फौरन ऐसा किया जाता है। इतना सब होने के बाबजूद माल्या दो मार्च को ही अपने निजी जहाज से बगैर रोक-टोक के विदेश चले गए? संबंधित एजेंसीज और बैंक्स हाथ मलते रह गए। माल्या की नीयत में खोट हैं, उनका विदेश भाग जाना यही दर्शाता है। कोई भी इज्जतदार व्यक्ति इन हालात में विदेश नहीं जाएगा। माल्या के पास विदेशों में इतनी संपत्ति है कि उन्हें बेचकर वे अपना सारा कर्ज चुका सकते हैं। माल्या प्रकरण से देश की वित्तीय संस्थाओं की नकारा रिकवरी व्यवस्था की कलई खोली है। इस व्यवस्था को और ज्यादा धारदार बनाने की जरुरत है।






