बुधवार, 23 मार्च 2016

संघीय ढांचे को कमजोर न करें?

हाल ही  के राजनीतिक घटनाक्रम देश  के नाजुक  संघीय ढांचे की सेहत के लिए सुखद नहीं माने जा सकते हैं। सीमावर्ती राज्य जम्मू-कश्मीर  में दो माह से भी अधिक समय से राजनीतिक शून्यता व्याप्त है। एक और सीमावर्ती राज्य अरुणाचल प्रदेश  में भाजपा ने दल-बदल करवाकर कांग्रेस की सरकार गिरा दी थी। अब वहां कांग्रेस के दल-बदलू भाजपा के साथ मिलकर सत्ता में है। देश  में दल-बदल रोधी कानून का इससे बडा मजाक और क्या हो सकता है? और अब दल-बदल का गंदा खेल पहाडी राज्य उत्तराखंड में खेला जा रहा है। इस राज्य में भी कांग्रेस की सरकार है और यहां भी कांग्रेस के नौ विधायक बगावत पर आमादा है। भाजपा बगावत की आग में अपनी राजनीतिक रोटियां सेंकने की फिराक में है। जम्मू-कश्मीर  में सता के बेहद करीब रहकर भी भाजपा इससे वंचित है। इस साल सात जनवरी को तत्कालीन मुख्यमंत्री मुफ्ती मोहम्मद सईद के निधन के बाद राज्य मे आज तक लोकप्रिय सरकार का गठन नहीं हो पाया है जबकि पीडीपी और भाजपा आसानी से सरकार बना सकती है। दिसंबर, 2014 के  विधानसभा चुनाव में त्रिशंकू जनादेश  मिलने पर मुफ्ती मोहम्मद सईद की क्षेत्रीय पार्टी पीडीपी और भाजपा ने मिलकर सरकार बनाई थी। सरकार आराम से चल भी रही थी मगर मुफ्ती के निधन से सब गडबडा गया।  मुफ्ती की उत्तराधिकारी उनकी पुत्री और पार्टी अध्यक्ष मेहबूबा मुफ्ती ने भाजपा को आंखें दिखानी  शुरु कर दी और मोल-तोल करने लग पडी। उन्हें सता में आने की कोई जल्दी नहीं है मगर भाजपा को है। पिछले दो माह से इस संवेदनशील राज्य में सियासी “लुका-छिपी“ का खेल जारी है। इस जमीनी सच्चाई से पूरी दुनिया वाकिफ है कि आतंक और अलगाववाद से पीडित जम्मू-कश्मीर  में राजनीतिक अस्थिरता से सीमा पार के दुश्मनों  की मन की मुराद पूरी हो रही है। राजनीतिक अस्थिरता और सियासी दलों की अवसरवादिता से कश्मीर  जैसे संवेदनषील राज्य का कोई भला नहीं हो रहा है। जनता ने भले ही त्रिशंकू जनादेश  दिया हो मगर राजनीतिक दलों की यह जिम्मेदारी बनती है कि वे इस जनादेश  को गठबंधन के धागे में पिरोकर राज्य के अवाम को स्थायी सरकार दें। जम्मू-कश्मीर  के हालात सामान्य नहीं है। अलगाववाद कश्मीर  घाटी में सर चढकर बोल रहा है।  लंबे समय से राज्य में सुरक्षा बलों की तैनाती से लोग-बाग राष्ट्रीय  मुख्यधारा से दूर होते जा रहे हैं। पीडीपी राज्य में सेना की तैनाती की मुखर विरोधी है पर भाजपा इसके पक्ष में है। और भी कई अहम मुद्दे हैं जिन पर दोनों दल का अलग-अलग स्टैंड है। इसके बावजूद दोनों दल सता के भागीदार रहे हैं। ताजा घटनाक्रम से लग रहा है कि पीडीपी राज्य में भाजपा के साथ मिलकर सरकार बनाने के लिए तैयार है। मंगलवार को पीडीपी अध्यक्ष मेहबूबा मुफ्ती की नई दिल्ली में प्रधानमंत्री से मुलाकात के बाद सरकार बनाने का रास्ता प्रशस्त हो गया है। मेहबूबा ने राज्य में भाजपा के साथ मिलकर सरकार बनाने के लिए ही प्रधानमंत्री से मुलाकात की थी। मेहबूबा ने वीरवार को श्रीनगर में पार्टी विधायकों की बैठक बुलाई है। उत्तराखंड में कांग्रेस के बागी विधायकों ने जमी-जमाई सरकार को अस्थिर कर दिया है। पूर्व  मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा के समर्थक विधायक मुख्यमंत्री को हटाने की मांग कर रहे हैं। बगावत कराने के आरोप में कांग्रेस ने विजय बहुगुणा के पुत्र साकेत बहुगुणा को पार्टी से बाहर का रास्ता दिखा दिया है। दल-बदल की प्रबल आशंका से मुख्यमंत्री हरीश  रावत ने विधायकों को जंगल में छिपा रखा है। 28 मार्च  को मुख्यमंत्री हरीश  रावत को विधानसभा में  विश्वाश  मत हासिल करना है। ताजा हालात यही संकेत दे रहे हैं कि बागी विधायक रावत का समर्थन नहीं करेंगे। भाजपा अरुणाचल प्रदेश  की तरह बागियों के साथ मिलकर कांग्रेस सरकार गिराने की फिराक में है। सत्ता में आते ही भाजपा वही कर रही है, जो कांग्रेस किया करती थी। यानी भाजपा का भी “कांग्रेसीकरण“ हो गया है। राज्यों में चुनी हुई सरकार को गिराने से संघीय ढांचा कमजोर हो रहा है।  यह  लोकप्रिय जनादेश  का सरासर अपमान है। इस तरह के घटनाक्रम लोगों को  अलगाववाद की ओर ले जाते हैं। कश्मीर  इसकी सबसे बडी मिसाल है। भाजपा को इतिहास से सबक सीखना चाहिए।