मंगलवार, 29 मार्च 2016

संवैधानिक पावर्स का दुरुपयोग ?

पूर्वोतर पहाडी राज्य अरुणाचल प्रदेश  में कांग्रेस की सरकार को गिराने के बाद अब मोदी सरकार ने उतराखंड में हरीश  रावत सरकार को चलता कर दिया है। केन्द्र सरकार ने संविधान के अनुच्छेद 356 में प्रदत पावर्स का प्रयोग या यूं कहा जाए दुरुपयोग करके,  उत्तरी भारत के पहाडी राज्य में भी राष्ट्र्पति  शासन लागू कर दिया है। मोदी सरकार का यह कदम दल-बदलू निरोधी कानून और लोकप्रिय जनादेश  का घोर अपमान है।  हैरानी इस बात की है कि केन्द्र-राज्यों (सेंटर-स्टेटस रिलेशसं) के संबंधों पर सरकारिया आयोग के सिफारिशों  की जोरदार पैरवीकार भाजपा ने इस बार खुद इनका (सिफारिषों)  निरादर किया है। सरकार आयोग की पुरजोर सिफारिश  थी कि केन्द्र को अनुच्छेद  356 का अत्याधिक संयम से इस्तेमाल करना चाहिए। एक जमाने में इस अनुच्छेद का सियासी फायदों के लिए इस्तेमाल करने पर  भाजपा, कांग्रेस को जी भर कर कोसा करती थी। अब वही काम मोदी सरकार कर रही है।  तीन माह से भी कम समय के दौरान  मोदी सरकार ने कांग्रेस की दूसरी सरकार गिरा दी  है। कांग्रेस के नौ विधायकों की बगावत से मोदी सरकार को राज्य में राष्ट्र्पति  शासन का बहाना मिल गया। हरीश  रावत सरकार की बर्खास्तगी के लिए  वित्त मंत्री अरुण जेटली का तर्क हास्यास्पद लगता है, जो गले नहीं उतर रहा है। बकौल जेटली उतराखंड के विधानसभा अध्यक्ष ने “मनी मिल“ को सदन  में पारित घोषित  कर अपनी शक्तियों का बेजा इस्तेमाल किया है जबकि सदन का बहुमत इस मामले पर वोटिंग के पक्ष में था। देश  के लोकतांत्रिक इतिहास में यह संभवतय पहला मौका है जब विधानसभा अध्यक्ष की कथित “असंवैेधानिक कार्यवाही“ के लिए राज्य में  राष्ट्रपति  शासन लगाना पडे। राज्यपाल ने  नौ विधायकों की बगावत के बाद मुख्यमंत्री हरीश रावत को सोमवार (28 मार्च) को विश्वास  मत हासिल करने को कहा  था। केन्द्र सरकार ने इसका भी इंतजार नहीं किया और विश्वास  मत से पहले ही राज्य में सरकार को बर्खास्त करने के लिए राष्ट्रपति  शासन लगा दिया। अब तक विधायकों की खरीद-फरोख्त चल रही थी।  बर्खास्त  मुख्यमंत्री हरीश  रावत पर भी विधायकों के खरीद-फरोख्त के संगीन आरोप लगाए गए और यह साबित करने के लिए स्टिंग ऑपरेशन तक किया गया। फॉरेंजिक जांच में  स्टिंग ऑपरेशन   को असली पाया गया। मोदी सरकार कह सकती है कि यह सब रोकने के लिए  राष्ट्रपति शासन  लगाना पडा मगर भाजपा भी इस प्रकरण में दूध की धुली नहीं है। कांग्रेस के बागी विधायकों ने सरेआम भाजपा का साथ देकर साबित कर दिया है कि “दाल में काफी कुछ काला“ है। बगैर किसी नफे के समकालीन नेता सीधी मुंह बात तक नहीं करते हैं । जाहिर है भारी लालच में विधायकों ने अपनी पार्टी से बगावत की है। 70 सदसयीय विधानसभा में कांग्रेस के 36 विधायक थे। नौ विधायकों की बगावत के बाद उसके पास केवल 27 विधायक ही रह गए हैं। कांग्रेस से ज्यादा भाजपा के पास 28 विधायक हैं। कांग्रेस के नौ बागी विधायकों के समर्थन से भाजपा आसानी से सरकार बना सकती थी मगर विधनसभा अध्यक्ष द्वारा बागियों को दल-बदलू घोषित  कर उन्हें अयोग्य ठहराए जाने से भाजपा की पूरी गेम ही बिगड गई। बागी विधायक विधानसभा अध्यक्ष की व्यवस्था के खिलाफ उच्च न्यायालय भी गए मगर वहां से भी उन्हें कोई राहत नहीं मिली। सर्वोच्च न्यायालय ने 1994 में रवि नाइक बनाम यूनियन ऑफ इंडिया में साफ व्यवस्था दी है कि अगर कोई विधायक अपनी मूल पार्टी के व्हिप का उल्लघंन करता है तो वह साफ जता  रहा है कि उसने पार्टी छोड दी है। जब भाजपा को लगा कि बागी विधायकों के समर्थन से सरकार नहीं बन सकती और हरीश  रावत निर्दलीय और क्षेत्रीय दल के समर्थन से विधानसभा में विष्वास मत जीत सकते हैं, मोदी सरकार ने राज्य में राष्ट्रपति  शासन थोप दिया।  संवैधानिक पावर्स का  सियासी फायदे के लिए इस्तेमाल करने से सरकार केवल संघीय ढांचे को ही कमजोर कर रही है। देश  में जिस तेजी से अलगाववाद और असहिष्णुता  फैल रही है, इसके मद्देनजर  केन्द्र सरकार को फूंक-फूंक कर कदम रखना होगा।  मोदी सरकार के ताजा कदम से सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच की दूरी और बढ सकती है। अतराखंड और अरुणाचल प्रदेश  के बाद अब हिमाचल प्रदेश  की बारी आ सकती है।  हिमाचल प्रदेश  के मुख्यमंत्री पर प्रर्वतन निदेशालय पहले ही सख्त कार्रवाई कर चुका है। कांग्रेस का एक वर्ग मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह का मुखर विरोधी है और उन्हें अपदस्थ करने के लिए मौके की तलाश  में है।