देश में व्याप्त असहिष्णु माहौल में “आधार“ को अनिवार्य बनाने के लिए संसद में आनान-फानन में बिल पारित किए जाने से मोदी सरकार की “नीयत“ पर शक-सुबह होना स्वभाविक है। इस बिल को पारित करवाने के लिए “मनी बिल“ रुट का सहारा लेकर सरकार ने “जल्दबाजी“ दिखाई है। देश का सर्वोच्च न्यायालय व्यवस्था दे चुका है कि “आधार“ को ऐच्छिक बनाया जाना चाहिए, अनिवार्य नहीं। मामला अभी भी न्यायालय के विचाराधीन है। लेकिन मोदी सरकार को “आधार“ को अनिवार्य बनाने की इतनी जल्दी है कि राज्यसभा से बचने के लिए सरकार ने आधार संशोधन को “मनी बिल“ में समाहित करके लोकसभा से पारित करवा लिया। आधार संशोधन बिल चूंकि संविधान संशोधन बिल नहीं है, इसलिए इसे मनी बिल के साथ पेश किया जा सकता है। मनी निल को राज्यसभा से पारित करवाने की जरुरत नहीं पडती। मनी बिल टैक्स अथवा सरकार के खर्चे से संबंधित होता है, इसलिए इसे राज्यसभा में पारित करवाने की जरुरत नहीं मानी जाती। सरकार का तर्क है कि आधार सरकार द्वारा दी जा रही सब्सिडी अथवा खर्चों से संबंधित है, इसलिए इसे मनी बिल के रुप में पेश किया गया। सरकार के पास लोकसभा में खासा बहुमत है मगर राज्यसभा में बहुमत नहीं होने से सरकार ने:मनी रुट“ का रास्ता अपनाया। राज्यसभा ने बुधवार को इस बिल को पांच संषोधनों के साथ लोकसभा को लौटा दिया। नियमानुसार लोकसभा इस बिल पर राज्यसभा की सलाह मानने को बाध्य नहीं है। वह इसे पारित कर सकती है। बहरहाल, आधार बिल के तहत कुछ ऐसे प्रावधान है जिन पर विपक्ष के साथ-साथ जनमानस भी असहज महसूस कर रहा है। सरकार के पास देश के हर नागरिक की पूरी गोपनीय व्यक्तिगत जानकारी होगी। नेशनल सिक्योरिटी के नाम पर “आधार“ के तहत सरकार किसी भी तरह की गोपनीय-से-गोपनीय जानकारी एकत्र कर सकती है। आधार अथॉरिटी को स्वतः जानकारियां जुटाने का अधिकार दिया गया है। सियासी नेताओं, बुद्धिजीवियों और विद्धानों को संदेह है सरकार का भ्रष्ट तंत्र सिक्योरिटी के नाम पर लोगों की सुरक्षा को भी खतरे में डाल सकता है और “निरकुंश “ शासक इस तरह की जानकारियों का अपन विरोधियों के खिलाफ दुरुपयोग कर सकता है। आधार लोगों की निजता (प्राइवेसी) पर सीधा-सीधा दखल माना जा रहा है। दुनिया अमेरिका में नेशनल सिक्युरिटी एजेंसी (एनएसए) के पूर्व कर्मचारी एडवर्ड स्नोडन के 2013 के सनसनीखेज खुलासे को आज तक भूल नहीं पाई है। स्नोडन का कहना था कि अमेरिकी की एनएसए इंटरनेट से डाटा लेकर दुनिया के शीर्ष लोगों की जासूसी करती है। इस बात की कोई गारंटी नहीं है कि आधार अथॉरिटी द्वारा एकत्र बायोमेट्रिक डाटा, फिंगर प्रिंटस और आईआरआईएस स्कैन का दुरुपयोग नहीं होगा और महत्वपूर्ण जानकारियां दुश्मनो के हाथ नहीं लग पाएगा। आधार योजना मूलतः सात साल पहले संप्रग सरकार द्वारा सरकारी सब्सिडियों का युक्तिकरण करने के लिए शुरु की गई थी। और किसी सरकारी योजना से लाभान्वित होने के लिए “आधार“ को अनिवार्य बनाने से उसका युक्तिकरण होगा, इस बात में कोई दम नहीं है। इसके तहत पात्र व्यक्तियों का बायोमेट्रिक डाटा एकत्र करने का औचित्य हो सकता है मगर जो लोग सरकार की सब्सिडी नहीं ले रहे हैं, उनकी गोपनीय जानकारियां एकत्र करने का कोई औचित्य नहीं बनता है। विपक्ष को संदेह है कि मोदी सरकार देश में हिंदू एजेंडा लागू करने के लिए लोगों की गोपनीय जानकारियां एकत्र कर रही है। मोदी सरकार के सता में आने के बाद से देश के माहौल में बराबर “सांप्रदायिकता“ का जहर घोला जा रहा है। शिक्षा का भगवाकरण किया जा रहा है। देशप्रेम और राष्ट्रीयता की आड में “अभिव्यक्ति की आजादी“ पर अंकुश लगाने की कोशिश की जा रही है। हैरानी इस बाद की भाजपा (तत्कालीन जनसंघ) आपातकाल में जबरी परिवार नियोजन का यह कहकर मुखर विरोधी थी कि लोकतंत्र में कोई भी शासकीय काम “ जबरी“ अथवा अनिवार्य नहीं होना चाहिए। अब वही पार्टी आधार को अनिवार्य बनाकर लोकतंत्र परंपराओं का मखौल उडा रही है।
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