यह कहां का इंसाफ ?
जीवन भर की बचत पर कर लगाकर वित्त मंत्री अरुण जेटली ने अर्थशास्त्र के मान्य सिद्धांतों का उल्लघंन किया है। अर्थशास्त्र का सीधा-साधा सिद्धांत है कि बजट प्रोगेसिव होना चाहिए, रेग्ररेसिव नहीं। कर व्यवस्था से बचत और उत्पादन को प्रोत्साहन मिलना चाहिए। और जिस बजट में बचत पर ही टैक्स लगाया जाए, ऐसे बजट को प्रोगेसिव नहीं माना जा सकता। अमूमन, बचत को बढावा देने के लिए करों में छूट दी जाती है। इस बार वित मंत्री ने तीन हजार की मामूली छूट देने के साथ ही प्रॉविडेंट फंड से पैसे की निकासी को कर के दायरे में लाया है। पूरे देश में इस कर का मुखर विरोध हो रहा है। अब तक एक लाख से ज्यादा लोग सोशल मीडिया पर विरोध दर्ज कर चुके हैं। बजट के तुरंत बाद वित्त मंत्री के इस प्रस्ताव पर मोदी सरकार को स्पष्टीकरण तक देना पडा। बजट के दूसरे ही दिन सरकार ने तीन बार सफाई दी कि ईपीएफ की निकासी पर नहीं, बल्कि उसके ब्याज की साठ फीसदी रकम पर टैक्स लगाया गया है। भाजपा के अधिकांश सदस्य भी पीएफ पर टैक्स लगाने के खिलाफ हैं और वित्त मंत्री पर इसे रोल बैक करने का दबाव डाल रहे हैं। वित्त मंत्री ने अब गेंद प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के पाले में डाल दी है। वित्त मंत्री के बजट दर्शन को लेकर कुछ चिंता व्यक्त की जा रही है। भाजपा को सर्विस सेक्टर फ्रेंडली माना जाता है और सर्विसिस क्लास को भाजपा से करों में रियायतें मिलने की उम्मीद रहती है। मगर इस बार का बजट मिडिल क्लास फ्रेंडली नहीं है। अभी तक यह स्पष्ट नहीं है कि ईपीएफ की पूरी निकासी पर टैक्स लगेगा या ब्याज पर। सरसरी गणना के अनुसार अप्रैल, 2016 से दस हजार बेसिक वेतन पाने वाले को 58 की सेवानिवृति पर लगभग डेढ करोड मूल रकम और एक करोड रु ब्याज से मिलेंगे। अभी यह स्पष्ट नहीं है कि सरकार एक करोड रु के ब्याज को टैक्स करेगी या पूरी रकम (ब्याज प्लस मूल) पर। ब्याज पर टैक्स लगाना सर्विस क्लास की जेब पर डाका है। प्रत्यक्ष करों से मिलने वाले लगभग पौने दो लाख करोड रु आयकर के अलावा सरकार को अन्य प्रत्यक्ष करों से बमुश्किल सात सौ करोड रु मिलते हैं। इस बात के दृश्टिगत सर्विस क्लास की उम्र भर की बचत के ब्याज पर टैक्स से सरकार को बहुत ज्यादा कमाई नहीं होने जा रही है। सुखद स्थिति यह है कि नेशनल पेंशन स्कीम की निकासी को प्रस्तावित टैक्स से मुक्त रखा गया है। इस साल और अगले साल संपन्न होने वाले विधानसभा चुनावों को ध्यान में रखते हुए बजट में कृषि और सोशल सेक्टर को खासी प्राथमिकता दी गई है। अगले साल जनवरी-फरवरी में उत्तर प्रदेश , उत्तराखंड, पंजाब समेत कुछ राज्यों में विधानसभा चुनाव होने है। उत्तर प्रदेश और पंजाब में किसानों का वर्चस्व है और सरकार बनाने में इनकी महत्वपूर्ण भूमिका रहती है। उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनाव इस बार भाजपा के लिए खास महत्व रखता है। इसीलिए बजट को प्रो-किसान और प्रो-पुअर का फेस दिया गया है। अमल में किसानों को कितना उत्थान होगा, इसकी कोई गारंटी नहीं है। सरकार की बजटीय घोषणा कितनी असरदार साबित होती हैं, गंगा की सफाई के लिए घोषित योजना इसका प्रमाण है। पिछले साल बजट में गंगा की तत्काल सफाई की जोश -खरोश से घोषणा की गई मगर सफाई तो दीगर रही, बजट का पांच फीसदी भी सफाई पर खर्च नहीं हो पाया है। वस्तुतः, पिछले कई सालों से गंगा की सफाई के लिए दो चरणों में पचीस हजार करोड रु का प्रावधान किया जा चुका है मगर गंगा आज भी वैसी की वैसी मैली और गंदी है। इसी तरह बजट में काले धन को बाहर लाने के लिए स्वैच्छिक घोषणा स्कीम का ऐलान किया गया है। 1997 में इस तरह की स्कीम से सरकार मात्र दस हजार करोड रु जुटा पाई थी। इस स्कीम के तहत काले धन को सफेद बनाने के लिए 30 फीसदी टैक्स और 7.5 फीसदी पैनल्टी देनी पडेगी। देश के मध्यम वर्ग को इस बात की हैरानी है कि मोदी सरकार टैक्स की चोरी करके देश के साथ गद्दारी करने वाले धन्ना सेठों को तो पुरुस्कृत (एमेनेस्टी) कर रही है, मगर ईमानदारी से टेक्स देने वालों को टैक्स लगाकर रिटायरमेंट पर भी दंडित किया जा रहा है। यह कहाँ का इन्साफ है ?
जीवन भर की बचत पर कर लगाकर वित्त मंत्री अरुण जेटली ने अर्थशास्त्र के मान्य सिद्धांतों का उल्लघंन किया है। अर्थशास्त्र का सीधा-साधा सिद्धांत है कि बजट प्रोगेसिव होना चाहिए, रेग्ररेसिव नहीं। कर व्यवस्था से बचत और उत्पादन को प्रोत्साहन मिलना चाहिए। और जिस बजट में बचत पर ही टैक्स लगाया जाए, ऐसे बजट को प्रोगेसिव नहीं माना जा सकता। अमूमन, बचत को बढावा देने के लिए करों में छूट दी जाती है। इस बार वित मंत्री ने तीन हजार की मामूली छूट देने के साथ ही प्रॉविडेंट फंड से पैसे की निकासी को कर के दायरे में लाया है। पूरे देश में इस कर का मुखर विरोध हो रहा है। अब तक एक लाख से ज्यादा लोग सोशल मीडिया पर विरोध दर्ज कर चुके हैं। बजट के तुरंत बाद वित्त मंत्री के इस प्रस्ताव पर मोदी सरकार को स्पष्टीकरण तक देना पडा। बजट के दूसरे ही दिन सरकार ने तीन बार सफाई दी कि ईपीएफ की निकासी पर नहीं, बल्कि उसके ब्याज की साठ फीसदी रकम पर टैक्स लगाया गया है। भाजपा के अधिकांश सदस्य भी पीएफ पर टैक्स लगाने के खिलाफ हैं और वित्त मंत्री पर इसे रोल बैक करने का दबाव डाल रहे हैं। वित्त मंत्री ने अब गेंद प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के पाले में डाल दी है। वित्त मंत्री के बजट दर्शन को लेकर कुछ चिंता व्यक्त की जा रही है। भाजपा को सर्विस सेक्टर फ्रेंडली माना जाता है और सर्विसिस क्लास को भाजपा से करों में रियायतें मिलने की उम्मीद रहती है। मगर इस बार का बजट मिडिल क्लास फ्रेंडली नहीं है। अभी तक यह स्पष्ट नहीं है कि ईपीएफ की पूरी निकासी पर टैक्स लगेगा या ब्याज पर। सरसरी गणना के अनुसार अप्रैल, 2016 से दस हजार बेसिक वेतन पाने वाले को 58 की सेवानिवृति पर लगभग डेढ करोड मूल रकम और एक करोड रु ब्याज से मिलेंगे। अभी यह स्पष्ट नहीं है कि सरकार एक करोड रु के ब्याज को टैक्स करेगी या पूरी रकम (ब्याज प्लस मूल) पर। ब्याज पर टैक्स लगाना सर्विस क्लास की जेब पर डाका है। प्रत्यक्ष करों से मिलने वाले लगभग पौने दो लाख करोड रु आयकर के अलावा सरकार को अन्य प्रत्यक्ष करों से बमुश्किल सात सौ करोड रु मिलते हैं। इस बात के दृश्टिगत सर्विस क्लास की उम्र भर की बचत के ब्याज पर टैक्स से सरकार को बहुत ज्यादा कमाई नहीं होने जा रही है। सुखद स्थिति यह है कि नेशनल पेंशन स्कीम की निकासी को प्रस्तावित टैक्स से मुक्त रखा गया है। इस साल और अगले साल संपन्न होने वाले विधानसभा चुनावों को ध्यान में रखते हुए बजट में कृषि और सोशल सेक्टर को खासी प्राथमिकता दी गई है। अगले साल जनवरी-फरवरी में उत्तर प्रदेश , उत्तराखंड, पंजाब समेत कुछ राज्यों में विधानसभा चुनाव होने है। उत्तर प्रदेश और पंजाब में किसानों का वर्चस्व है और सरकार बनाने में इनकी महत्वपूर्ण भूमिका रहती है। उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनाव इस बार भाजपा के लिए खास महत्व रखता है। इसीलिए बजट को प्रो-किसान और प्रो-पुअर का फेस दिया गया है। अमल में किसानों को कितना उत्थान होगा, इसकी कोई गारंटी नहीं है। सरकार की बजटीय घोषणा कितनी असरदार साबित होती हैं, गंगा की सफाई के लिए घोषित योजना इसका प्रमाण है। पिछले साल बजट में गंगा की तत्काल सफाई की जोश -खरोश से घोषणा की गई मगर सफाई तो दीगर रही, बजट का पांच फीसदी भी सफाई पर खर्च नहीं हो पाया है। वस्तुतः, पिछले कई सालों से गंगा की सफाई के लिए दो चरणों में पचीस हजार करोड रु का प्रावधान किया जा चुका है मगर गंगा आज भी वैसी की वैसी मैली और गंदी है। इसी तरह बजट में काले धन को बाहर लाने के लिए स्वैच्छिक घोषणा स्कीम का ऐलान किया गया है। 1997 में इस तरह की स्कीम से सरकार मात्र दस हजार करोड रु जुटा पाई थी। इस स्कीम के तहत काले धन को सफेद बनाने के लिए 30 फीसदी टैक्स और 7.5 फीसदी पैनल्टी देनी पडेगी। देश के मध्यम वर्ग को इस बात की हैरानी है कि मोदी सरकार टैक्स की चोरी करके देश के साथ गद्दारी करने वाले धन्ना सेठों को तो पुरुस्कृत (एमेनेस्टी) कर रही है, मगर ईमानदारी से टेक्स देने वालों को टैक्स लगाकर रिटायरमेंट पर भी दंडित किया जा रहा है। यह कहाँ का इन्साफ है ?






