बुधवार, 16 मार्च 2016

मुद्रा -स्फीति घटी मगर महंगाई नहीं

                                         मुद्रा -स्फीति घटी  मगर महंगाई नहीं
देश में थोक मूल्य सूचकांक (होलसेल प्राइस इंडेक्स-डब्ल्यूपीआई) में पिछले सोलह माह से जारी लगातार गिरावट से लग रहा है कि महंगाई पर नियंत्रण पा लिया गया है और आम आदमी के “अच्छे दिन“ आ गए  हैं। सोमवार को जारी आंकडों के अनुसार थोक महंगाई दर  शून्य से नीचे है। इसकी वजह सब्जियों और दालों की कीमतों में गिरावट बताई जा रही है। दाल-सब्जी सस्ती हैं तो आम आदमी के अच्छे दिन माने जा सकते हैं। थोक मूल्य सूचकांक आधारित मुद्रा स्फीति जनवरी में शून्य से 0.90 फीसदी थी। पिछले साल जनवरी में यह शून्य से 2.17 फीसदी थी। नवंबर 2014, यानी मोदी सरकार के सत्ता में आने के छह माह बाद  से थोक मुद्रा स्फीति में लगातार गिरावट आ रही है।  इस साल जनवरी में मुद्रा-स्फीति पिछले साल की तुलना में कुछ बढी है। पिछले साल भी यही कहा गया था कि दाल-सब्जियां सस्ती होने से मुद्रा स्फीति दर कम होकर शून्य से नीचे चली गई है। इस हिसाब से देश  में महंगाई तो है ही नहीं । सरकारी आंकडों के अनुसार फरवरी में थोक खाद्य मुद्रा स्फीति तेजी से घटकर 3.35 रह गई है। जनवरी में यह 6.02 फीसदी थी।  अर्थात  फरवरी में थोक मुद्रा स्फीति में लगभग पौने तीन फीसदी की गिरावट आई है।  आंकडों के जरिए यह भी बताया गया है कि जनवरी में दाल-दलहनों की कीमतों में लगभग 39 फीसदी की गिरावट आई है। प्याज  13.22 फीसदी सस्ता हुआ है। सब्जियां 3.34 फीसदी और फल 1.95 फीसदी सस्ते हुए हैं। आंकडों के लिहाज से अगर थोक मुद्रा स्फीति  शून्य से नीचे ह, तोै महंगाई होनी ही नहीं चाहिए।  मगर जमीनी सच्चाई कुछ और ही बयां करती है। सरकारी आंकडे आम आदमी के पल्ले नहीं पडते हैं। दाल, सब्जियों के थोक भाव भले ही कम हो गए हों मगर परचून के भाव में कोई गिरावट नहीं आई है। इसके विपरीत पिछले साल की तुलना में दाल-सब्जी और फलों के दाम बढे हैं। सरकारी आंकडे यह भी बताते हैं कि जनवरी 2016 में ईयर-टू --ईयर  आधार पर  उपभोक्ता मूल्य में  5.18 फीसदी की बढोतरी दर्ज हुई। जनवरी में यह वृद्धि 5.69 फीसदी थी। इन आंकडों से साफ है कि थोक कीमतों में गिरावट का लाभ आम आदमी तक नहीं पहुंच रहा है। और अगर वाकई ही परचून कीमतों में गिरावट आती, थोक मूल्य सूचकांक और उपभोक्ता मूल्य सूचकांक  सूचकांक (कंज्यूमर प्राइस इंडेक्स-सीपीआई) में इतना बडा अंतर (पांच फीसदी से भी ज्यादा) नहीं होता। दोनों सूचकांक में ज्यादा से ज्यादा एक फीसदी का अंतर होना चाहिए।  लेकिन भारत में थोक मूल्य सूचकांक  और उपभोक्ता मूल्य सूचकांक के अलग-अलग मानदंड होने की वजह  से मुद्रा स्फीति को लेकर असंमजस बना रहता है।  पिछले एक साल में थोक मूल्य सूचकांक मे लगातार गिरावट आ रही है, तो  उपभोक्ता मूल्य सूचकांक बराबर बढ रहा है। दरअसल, थोक मूल्य सूचकांक में मैन्युफेक्चरिंग को ज्यादा वेटेज  दी  जाती  है, जबकि उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (कंज्यूमर प्राइस इंडेक्स) में खाद्य वस्तुओं को अधिक वेटेज दी जाती है। इस स्थिति में  डब्ल्यूपीआई और सीपीआई में भारी अतर होना स्वभाविक है। मोदी सरकार के सत्ता में आने के बाद से देश  में फ्यूल ( पेट्रोल-डीजल) की कीमतों में खासी गिरावट आई है। इससे मैन्युपैक्चरिंग सेक्टर की उत्पादन लागत में गिरावट आई है और मैन्युफेक्चरिंग से जुडी चीजें सस्ती हुई हैं हालांकि कर्ज  अभी भी महंगा है। दूसरी ओर  खाद्य वस्तुओं की कीमतों में बहुत ज्यादा गिरावट नहीं आने से उपभोक्ता मूल्य सूचकांक लगातार ऊपर जा रहा है। इन दो विपरीत स्थितियों से आम आदमी का भ्रमित रहना स्वभाविक है। इस भ्रामक स्थिति के बलबूते रिजर्व  बैंक ब्याज दरें घटाने को तैयार नहीं है। भारत में अभी भी प्रतियोगी एकीकृत मार्केट नहीं होने के कारण डब्ल्यूपीआई की तुलना में  सीपीआई का सही आकलन नहीं हो पाता है। प्रतियोगी एकीकृत मार्केट के अभाव में ही कच्चे माल, केपिटल और इंटरमीडिएट गुडस की कीमतों में उतार-चढाव का अंतिम उत्पाद में पता ही नहीं चल पाता। इस वजह सूचकांक का सही आकलन भी नहीं हो पाता है। निष्कर्ष  यह है कि भारत में मूल्य सूचकांक अभी भी वास्तविक स्थिति को नहीं दर्शा   पा रहे हैं। इससे आम आदमी ही नहीं नीति निर्धारक भी  भ्रमित हो रहे हैं।