बजट के बाद अब मार्केट की उम्मीद रिजर्व बैंक की मौद्रिक नीति में रेट कट पर टिकी हैं। स्टॉक मार्केट बजट से ज्यादा उत्साहित नहीं हुआ। सोमवार को बाजार में मंदी व्याप्त रही और सेंसेक्स 152 अंक टूटा मगर मंगलवार कोे शेयर बाजार गुलजार रहा और सेंसेक्स 777 अंकों की उछाल से बंद हुआ। सात साल में यह सबसे बडा उछाल है। बजट में कृषि को खासी प्राथमिकता दिए जाने और राजकोषीय घाटे को नियंत्रित किए जाने के वायदे से मंगलवार को स्टॉक मार्केट में तेजी छाई रही। डॉलर के मुकाबले रुपया भी कुछ मजबूत हुआ। वित्त मंत्री ने बजट में ग्रामीण क्षेत्रों और फार्म सेक्टर को खासा बजट आवंटित करने के बाद भी राजकोषीय घाटे को अगले वित्त वर्ष में सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) का 3.5 फीसदी तक सीमित रखने का लक्ष्य रखा है। केन्द्र सरकार को अपने कर्मचारियों के लिए सातवें वेतन आयोग की सिफारिशों के अनुसार वेतन और पेंशन भी बढानी है। इसके साथ-साथ खाद्य और उर्वरक-फ्यूल सब्सिडी को भी अच्छा खासा बजट दिया गया है। इससे साफ संकेत हैं कि अर्थव्यवस्था के फंडामेंटल्स मजबूत हैं। इस स्थिति में बाजार को उम्मीद है कि रिजर्व बैंक के गर्वनर रघुराम राजन रेपो रेट को कम करके ब्याज दरों में नरमी लाएंगे। पिछले साल सितंबर के बाद रिजर्व बैंक ने ब्याज दरें नहीं घटाईं हैं। राजन ने वायदा भी कर रखा है कि अगर परिस्थितियां अनुकूल रहीं तो ब्याज दरें घटाईं भी जा सकती हैं। वैश्विक मंदी के दृष्टिगत मांग को मजबूत करने की जरुरत है और यह तभी संभव है जब कर्ज सस्ता हो। भारत में कर्ज अभी भी काफी महंगा है। चीन में ब्याज दरें 1996 में 10.98 फीसदी के उच्च स्तर को छूने के बाद अक्टूबर 2015 में 4.37 फीसदी के निम्न स्तर पर हैं। चीन की तुलना में भारत में अभी भी ब्याज दरें (प्राइम लैंडिग रेट) 10 फीसदी से ज्यादा हैं और इस कारण कर्ज अपेक्षाकृत महंगा है। महंगे कर्ज के चलते मांग दब कर रह गई है और लागत भी बढ रही है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमतें न्यूनतम रहने के बावजूद फ्यूल (डीजल) अभी भी काफी महंगा है। सरकार ने सोमवार को पेट्रोल तो तीन रु लीटर सस्ता कर दिया मगर डीजल के दाम लगभग डेढ रु बढा दिए हैं। डीजल के दाम बढने से ट्रांसर्पोटेशन लागत बढती है और इसका सीधा असर खाद्य वस्तुओं पर पडता है। महंगे कर्ज के कारण ही देश का रियल्टी सेक्टर मंदी से उभर नहीं पा रहा है। इस सेक्टर को मंदी से उभारने के लिए कर्ज को सस्ता करने की जरुरत है। इस शताब्दी के शुरुआती वर्षों में कर्ज सस्ता (लो इंट्रेस्ट रिजिम) होने के कारण रियल्टी सेक्टर में खासी तेजी बनी रही । महंगे कर्ज के कारण देश का मैन्युपैक्चरिंग सेक्टर भी मंदी से उभर नहीं पा रहा है। यह सेक्टर अर्थव्यवस्था की धुरी माना जाता है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी कई बार कह चुके हैं कि सरकार मैन्युपैक्चरिंग सेक्टर को उभारने के लिए वचनबद्ध है। ताजा रिपोर्ट के अनुुसार फरवरी माह में क्रेडिट ग्रोथ से मैन्युपैक्चरिंग सेक्टर में कुछ सुधार देखा गया। फरवरी में मैन्युपैक्चरिंग सेक्टर को क्रडिट ग्रोथ दस माह में सबसे ज्यादा रही है। स्पष्ट है कि क्रेडिट का प्रवाह बढने से उत्पादन बढता है। प्रधानमंत्री के “मेक इन इंडिया“ का मूल मकसद भी मैन्युपैक्चरिंग गतिविधियों को बढाना है। इसके तहत सरकार अंतरराष्ट्रीय स्तर की बडी कंपनियों को भारत में आने के लिए प्रोत्साहित तो कर रही है मगर अभी तक बहुत ज्यादा सकारातक परिणाम सामने नहीं आए हैं। यहां तक कि टोल मैन्युफेक्चरिंग रुट भी ज्यादा लोकप्रिय नहीं हो पाया है। इसकी वजह भी महंगा कर्ज बताई जा रही है। बडी कंपनियां वहीं जाएंगी जहां उन्हें सस्ता कर्ज मिलेगा। टैक्स से संबंधित बाधाएं भी बडी कंपनियों को भारत आने से रोकती हैं। चीन में भारत की अपेक्षा कर्ज भी सस्ता है और टैक्स बाधाएं भी नहीं है। बजट में इन सब बाधाओं को दूर करने का आश्वाशन दिया गया है। इससे स्टॉक मार्केट को रेट कट की उम्मीद नजर आ रही है। सस्ता कर्ज समय की मांग है।
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