देश में सियासी दल वोट की खातिर सरकारी खजाने को किस तरह से लूटा रहें हैं, मंगलवार को पंजाब विधानसभा में अगले वित्तीय वर्ष (2016-17) के लिए पेश बजट यही दर्शाता है। पंजाब की माली हालात इतनी दयनीय है कि राज्य सरकार अपने कर्मचारियों को छठे वेतन आयोग का बकाया एरियर भुगतान भी बमुश्किल किश्तों में अदा कर पाई है। सरकार का खजाना पूरी तरह से खाली है। उसके पास लंबित बिलों के भुगतान के लिए भी पैसा नहीं है। इसी माह के शुरु में राज्य सरकार ने पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट में माना था कि राज्य सरकार के पास 1800 करोड रु के बिल लंबे समय से पेमेंट के लिए लंबित पडे हैं और खजाने में इतना भी पैसा नहीं है कि वह इनका भुगतान कर सके। इसके बावजूद बादल सरकार ने कर मुक्त बजट में तीन हजार करोड रु से भी अधिक की रियायतें बांटी है। 7561 करोड के घाटे वाले बजट में 1200 करोड रु की तीस बडी परियोजनाएं घोषित की गई हैं मगर कुछ शतों के साथ। इससे साफ जाहिर होता है कि ये सिर्फ लोक-लुभावनी घोषणाएं हैं। पांच एकड तक की जमीन के मालिक किसानों को 50,000 रु तक का ब्याज मुक्त फसली ऋण देने की घोषणा की गई है। किसानों को पहले ही मुफ्त बिजली मिल रही है। 35 हजार करोड रु कर्ज के बोझ में दबे किसानों के लिए प्रॉविडेंट फंड (पीएफ) स्कीम भी दी गई है। शहरी वोटरों के लिए स्टांप डयूटी में 50 फीसदी छूट के साथ-साथ नए हाउसिंग प्रोजेक्टस के लिए सीएलयू, ईडीसी और लाइसेंस फीस में 25 फीसदी की छूट दी गई है। छात्राओं को मुफ्त स्कूली बैग, स्टेशनरी और महिला मंडलों को मुफ्त बर्तन देने का भी ऐलान किया गया है। स्टार्टअप प्रोजेक्टस को ब्याज मुक्त सब्सिडी का तोहफा दिया गया है। यार्न पर टैक्स कम किया गया है। हर वर्ग को लुभाया गया है मगर बादल सरकार खाली खजाने से लोकलुभावने वायदों को कैसे पूरा करेगी, इसका बजट में कोई उल्लेख नहीं है। जाहिर है सरकार कर्जा लेकर इन वायदों को पूरा करेगी। यह बात दीगर है कि पंजाब अब तक पहले ही सवा लाख करोड रु से भी ज्यादा कर्ज ले चुका है। प्रति व्यक्ति कर्ज बोझ राज्य में सबसे ज्यादा है। बजट से एक दिन पहले राज्य विधानसभा में पेश महालेखाकार (सीएजी) की रिपोर्ट में भी खुलासा किया गया है कि पंजाब सरकार विभिन्न स्त्रोतों से लिए जा रहे ऋण मेंसे 70 फीसदी से भी ज्यादा पुराना कर्ज चुकाने में खर्च कर रही है। यह कर्ज राज्य में विकास के नाम लिया जाता है। इससे साफ है कि राज्य की माली हालत किस कद्र खराब है। सीएजी की इस रिपोर्ट से बादल सरकार के इन दावों की भी कलई खुल गई है कि सरकार की वित्तीय स्थिति काफी मजबूत है। रिपोर्ट के अनुसार बादल सरकार की आटा-दाल स्कीम चलाने के लिए भी 2025 करोड रु का कर्जा लिया गया जबकि भारी कर्ज से दबी बादल सरकार ने उधोग-व्यापार से 2500 करोड रु के बकाया शुल्क वसूलने का कोई प्रयास नहीं किया। अगले साल के शुरु में विधानसभा चुनाव होने है। इसलिए शिरोमणि अकाली दल-भारतीय जनता पार्टी गठबंधन का यह इस टर्म का आखिरी बजट था। इस बात के मद्देनजर इस बार बादल सरकार के बजट में लोकलुभावनी रियायतें अपेक्षित थी। अकाली-भाजपा सरकार मतदाताओं को लुभावने के लिए हरसंभव कोशिश करेगी, यह भी अपेक्षित था। लेकिन राज्य की माली हालात इस कद्र दयनीय है कि बजट की लोक-लुभावनी रियायतों को पूरा करने के लिए पैसा कहां से आएगा, इस पर अब जनमानस को भी भरोसा नहीं रह गया है। सरकार का हाथ तंग होने के कारण अधिकांश चुनावी वायदे या तो आधे-अधूरे रह जाते हैं या घोषणाओं तक ही सिमट कर रह जाते हैं। यही वजह है कि बादल सरकार पिछले साल के बजट में घोषित 17 परियोजनाओं मेंसे तीन को तो शुरु ही नहीं कर पाईं जबकि 10 अभी भी अधूरी पडी हैं। वेलफेयर स्टेट में जनमानस को रियायतें देना अच्छी बात है मगर उधारी लेकर न तो घर-गृहस्थी चलाई जा सकती है और न ही राज्य को । एक दिन ऐसा भी आता है जब उधारी भी बंद हो जाती है। यूनान इस बात की ताजा मिसाल है। कर्ज के मकडजाल में फंसे पंजाब में चुनावी रियायतों पर पैसा लुटाने की जरा भी गुजांइश नहीं है। कंगाली मे दरियादिली के कोई मायने नहीं होते हैं।
गुरुवार, 17 मार्च 2016
कंगाली में दरियादिली
Posted on 9:25 am by mnfaindia.blogspot.com/
देश में सियासी दल वोट की खातिर सरकारी खजाने को किस तरह से लूटा रहें हैं, मंगलवार को पंजाब विधानसभा में अगले वित्तीय वर्ष (2016-17) के लिए पेश बजट यही दर्शाता है। पंजाब की माली हालात इतनी दयनीय है कि राज्य सरकार अपने कर्मचारियों को छठे वेतन आयोग का बकाया एरियर भुगतान भी बमुश्किल किश्तों में अदा कर पाई है। सरकार का खजाना पूरी तरह से खाली है। उसके पास लंबित बिलों के भुगतान के लिए भी पैसा नहीं है। इसी माह के शुरु में राज्य सरकार ने पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट में माना था कि राज्य सरकार के पास 1800 करोड रु के बिल लंबे समय से पेमेंट के लिए लंबित पडे हैं और खजाने में इतना भी पैसा नहीं है कि वह इनका भुगतान कर सके। इसके बावजूद बादल सरकार ने कर मुक्त बजट में तीन हजार करोड रु से भी अधिक की रियायतें बांटी है। 7561 करोड के घाटे वाले बजट में 1200 करोड रु की तीस बडी परियोजनाएं घोषित की गई हैं मगर कुछ शतों के साथ। इससे साफ जाहिर होता है कि ये सिर्फ लोक-लुभावनी घोषणाएं हैं। पांच एकड तक की जमीन के मालिक किसानों को 50,000 रु तक का ब्याज मुक्त फसली ऋण देने की घोषणा की गई है। किसानों को पहले ही मुफ्त बिजली मिल रही है। 35 हजार करोड रु कर्ज के बोझ में दबे किसानों के लिए प्रॉविडेंट फंड (पीएफ) स्कीम भी दी गई है। शहरी वोटरों के लिए स्टांप डयूटी में 50 फीसदी छूट के साथ-साथ नए हाउसिंग प्रोजेक्टस के लिए सीएलयू, ईडीसी और लाइसेंस फीस में 25 फीसदी की छूट दी गई है। छात्राओं को मुफ्त स्कूली बैग, स्टेशनरी और महिला मंडलों को मुफ्त बर्तन देने का भी ऐलान किया गया है। स्टार्टअप प्रोजेक्टस को ब्याज मुक्त सब्सिडी का तोहफा दिया गया है। यार्न पर टैक्स कम किया गया है। हर वर्ग को लुभाया गया है मगर बादल सरकार खाली खजाने से लोकलुभावने वायदों को कैसे पूरा करेगी, इसका बजट में कोई उल्लेख नहीं है। जाहिर है सरकार कर्जा लेकर इन वायदों को पूरा करेगी। यह बात दीगर है कि पंजाब अब तक पहले ही सवा लाख करोड रु से भी ज्यादा कर्ज ले चुका है। प्रति व्यक्ति कर्ज बोझ राज्य में सबसे ज्यादा है। बजट से एक दिन पहले राज्य विधानसभा में पेश महालेखाकार (सीएजी) की रिपोर्ट में भी खुलासा किया गया है कि पंजाब सरकार विभिन्न स्त्रोतों से लिए जा रहे ऋण मेंसे 70 फीसदी से भी ज्यादा पुराना कर्ज चुकाने में खर्च कर रही है। यह कर्ज राज्य में विकास के नाम लिया जाता है। इससे साफ है कि राज्य की माली हालत किस कद्र खराब है। सीएजी की इस रिपोर्ट से बादल सरकार के इन दावों की भी कलई खुल गई है कि सरकार की वित्तीय स्थिति काफी मजबूत है। रिपोर्ट के अनुसार बादल सरकार की आटा-दाल स्कीम चलाने के लिए भी 2025 करोड रु का कर्जा लिया गया जबकि भारी कर्ज से दबी बादल सरकार ने उधोग-व्यापार से 2500 करोड रु के बकाया शुल्क वसूलने का कोई प्रयास नहीं किया। अगले साल के शुरु में विधानसभा चुनाव होने है। इसलिए शिरोमणि अकाली दल-भारतीय जनता पार्टी गठबंधन का यह इस टर्म का आखिरी बजट था। इस बात के मद्देनजर इस बार बादल सरकार के बजट में लोकलुभावनी रियायतें अपेक्षित थी। अकाली-भाजपा सरकार मतदाताओं को लुभावने के लिए हरसंभव कोशिश करेगी, यह भी अपेक्षित था। लेकिन राज्य की माली हालात इस कद्र दयनीय है कि बजट की लोक-लुभावनी रियायतों को पूरा करने के लिए पैसा कहां से आएगा, इस पर अब जनमानस को भी भरोसा नहीं रह गया है। सरकार का हाथ तंग होने के कारण अधिकांश चुनावी वायदे या तो आधे-अधूरे रह जाते हैं या घोषणाओं तक ही सिमट कर रह जाते हैं। यही वजह है कि बादल सरकार पिछले साल के बजट में घोषित 17 परियोजनाओं मेंसे तीन को तो शुरु ही नहीं कर पाईं जबकि 10 अभी भी अधूरी पडी हैं। वेलफेयर स्टेट में जनमानस को रियायतें देना अच्छी बात है मगर उधारी लेकर न तो घर-गृहस्थी चलाई जा सकती है और न ही राज्य को । एक दिन ऐसा भी आता है जब उधारी भी बंद हो जाती है। यूनान इस बात की ताजा मिसाल है। कर्ज के मकडजाल में फंसे पंजाब में चुनावी रियायतों पर पैसा लुटाने की जरा भी गुजांइश नहीं है। कंगाली मे दरियादिली के कोई मायने नहीं होते हैं।






