शनिवार, 12 मार्च 2016

चिंतामुक्त हो जाएं!

संसद द्वारा रियल एस्टेट बिल पारित किए जाने के साथ ही  मकान खरीदने वालों को बडी राहत मिली है।  राज्यसभा ने वीरवार को इस बिल को पारित कर दिया। सरकार के लिए इस बिल को पारित करवाना बडी चुनौती थी। कांग्रेस और अन्य विपक्षी दलों ने इस बिल पर सरकार से सहयोग किया। यह बिल पिछले पांच साल से लटका हुआ था। लोकसभा इसे पहले ही पारित कर चुकी है। रियल एस्टेट के लिए कानून बनने से देश  में बेलगाम बिल्डरों पर  नकेल कसी जा सकेगी। बिल में ऐसे प्रावधान हैं, जिनके माध्यम से रियलटी सेक्टर में काले धन को भी रोका जा सकेगा। अभी तक प्रॉपर्टी बाजार काले धन के बलबूते ही फलता-फूलता रहा है। इस बिल के कानून  बनने पर मकान खरीदने वालों को ही नहीं, बिल्डरों को भी फायदा होगा। राज्यों और केन्द्रीय  शासित क्षेत्रों में रियल एस्टेट रेगुलेटरी ऑथॉरिटी को गठित किए जाने से  रियल सेक्टर से संबंधित शिकायतों का जल्द  निपटान हो पाएगा। प्राधिकरण को साठ दिन के भीतर मामले का निपटान करना होगा। अभी तक मकान खरीदारों को बिल्डरों के खिलाफ शिकायतों के लिए कंज्युमर कोर्ट की शरण में जाना पडता है और इसमें काफी समय लग जाता है। रियल एस्टेट को रेगुलेट करने के लिए पुख्ता कानून नहीं होने के कारण रियल्टी सेक्टर में न तो किसी तरह के मानकीकरण का पालन होता है और न ही बिल्डरों के कारोबार में कोई पारदर्शिता  होती  है। लोगों को अभी तक मकान बनाने वालों की बदनीयत“ अथवा छल या कपट का पता भी नहीं चलता पाता था। नतीजतन, घटिया निर्माण, प्राइस मेन्युपुलेशन और प्रोजेक्ट में अत्याधिक विलंब आम बात है। बडे बिल्डरों के लिए तो राज्यों में पंजीकरण करवाना अथवा प्रोजेक्ट पास करवाना वैधानिक तौर पर अनिवार्य  है, मगर छोटे बिल्डरों और प्रॉपटी बाजार के लिए कोई पुख्ता कानून नहीं है। ताजा बिल के कानून बनने पर पांच सौ वर्ग मीटर और इससे ज्यादा जमीन पर मकान  अथवा आठ फ्लैट्स  से ज्यादा बनाने पर भवन निर्माता अथवा बिल्डर को  रियल एस्टेट रेगुलेटरी ऑथॉरिटी से अनुमति लेना अनिवार्य होगा।  और अगर किसी बिल्डर ने ऐसा नहीं किया तो उसे पेनल्टी भरनी पडेगी। दोबारा ऐसी गलती करने पर जेल भी हो सकती है। नए कानून के तहत बिल्डर को खरीदार से वसूला गई रकम का पचास फीसदी निर्माण के लिए अलग से सुरक्षित रखना पडेगा। राज्य इस सीमा को बढा तो सकते हैं मगर कम नहीं कर सकते। इस प्रावधान से बिल्डरों की एक प्रोजेक्ट का पैसा दूसरे में लगाने की प्रवृति पर रोक लग पाएगी। कारपेट  एरिया का स्पष्ट  निर्धारण किया गया है और इसमें रसोई और शौचालय को भी  शामिल किया गया है। अभी ऐसा नहीं है। अधिकांश  मामलों में बिल्डर बताते कुछ हैं और बाद में निकलता कुछ और है। इस बात के  दृष्टिगत  सरकार ने निर्माण संबंधी त्रृटियों (स्ट्रक्चरल) को दूर करने के लिए दो साल की जगह पांच साल की अवधि तय की है। बिल्डर को अब हाउसिंग प्रोजेक्ट को तय समय पर पूरा करना पडेगा, वरना खरीदारों को मुआवजा देने पडेगा। कुल मिला कर देश  में पहली बार रियल्टी सेक्टर के नियंत्रण लिए कानून बनाया जाना सुखद पहल है। भारत में हाउसिंग तेजी से उभरता सेक्टर है और तरक्की और खुशाहली के साथ-साथ आवास की मांग भी तेजी से बढ रही है। आजादी के लगभग सात दशक बाद भी भारत में औसतन अधिकतर परिवार छोटे से दस फीट-बाई-दस फीट के कमरे में गुजर-बसर करते हैं। यह औसत ग्रामीण क्षेत्रों 103 फीट और श हरी क्षेत्रों में  118 फीट आती है। चालीस करोड लोगों के पास आज भी शौचालय की सुविधा नहीं है। मोदी सरकार ने 2022 तक देश  के हर परिवार को अपना घर मुहैया कराने का लक्ष्य तय कर रखा है। और यह तभी संभव है जब बिल्डर निम्न तबकों को वास्तव में सस्ते आवास मुहैया कराएं। अभी तक बिल्डर बडे-बडे वायदे तो करते हैं मगर उन्हें पूरा नहीं करते। नए कानून से इस सब मामलों में पारदर्शिता  आने की उम्मीद की जा सकती है।