पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर (पोक) में चीनी सैनिकों की उपस्थिति भारत के लिए खतरे की घंटी है। खुफिया एजेंसियों की रिपोर्टस के अनुसार नौगाम सेक्टर के दूसरी तरफ पाकिस्तान अधिकृत क्षेत्र में चीनी सैनिकों को देखा गया। सैनिकों में वरिष्ठ अफसर भी शामिल हैं। पाकिस्तानी सेना अफसरों की बातचीत भी रिकॉर्ड हुई है और इससे पता चलता है कि चीनी सेना लोप घाटी में कुछ सुरगों का निर्माण कर रही है। चीन की एक हाइड्रो कंपनी भारत की सीमा के साथ लगते पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर में झेलम नदी पर 970 मेगावट परियोजना का निर्माण भी कर रही है। इस जल-विद्युत परियोजना का निर्माण भारत की किशनगंगा परियोजना के जबाव में किया जा रहा है। लेकिन पाक अधिकृत कषमीर में चीनी सैनिकों की उपस्थिति नई घटना नहीं है। पिछले कई सालों से चीन पाक अधिकृत कश्मीर में गिलगिट-बाल्टिस्तान क्षेत्र में अपनी सामरिक जरुरतों के लिए कई परियोजनाएं चला रहा है और इन सभी में चीनी सैनिकों को इस्तेमाल किया जा रहा है।गिलगिट-बाल्टिस्तान विवादित क्षेत्र है और भारत इस पर अपना दावा जताता है। इस स्थिति के मद्देनजर चीन की इस सामरिक नीति से पाकिस्तान को बैठे-बिठाए भारत को छकाने का हथियार मिला हुआ है। सबसे अधिक चिंताजनक बात पाकिस्तान और चीन के बीच बढता सैन्य एवं आर्थिक सहयोग है। पाकिस्तान और चीन मिलकर 46 अरब डॉलर की लागत से इकोनॉमिक कॉरिडोर बना रहे हैं। यह कॉरिडोर चीन के झिजियांग प्रांत को काराकोरम हाईवे के जरिए पाकिस्तान की ग्वादर बंदरगाह से जोडेगा। पाकिस्तान के ग्वादर में चीन ने बंदरगाह बना रखी है। काराकोरम हाईवे वारतीय उपमहाद्धीप और एशिया के बीच सेतु का काम करता है। ईसिस हाइवे के कारण भारत, पाकिस्तान, चीन, अफगानिस्तान और तजाकिस्तान एक-दूसरे से 250 किमी के दायरे में आ जाते हैं। 1300 किमी लंबा काराकोरम हाईवे गिलगिट-बाल्टिस्तान को पाकिस्तान से जोडने का एकमात्र अ़ाल-वैदर मार्ग है। यह हाईवे चीन के साथ-साथ पाकिस्तान के लिए भी सामरिक दृष्टि से अति महत्वपूर्ण है। इकोनॉमिक कॉरिडोर से पाकिस्तान और चीन दोनों को फायदा हो रहा है। इस हाईवे के खुलने से भारत , चीन और पाकिस्तान दोनों की राडार पर आ गया है। चीन पाकिस्तान की मदद से भारत को घेरने के लिए हर विकल्प को आजमा रहा है। चीन के बारे यह बात जगत प्रसिद्ध है कि उसकी कूटनीति “मुंह में राम-राम, बगल में छुरी जैसी है“। चीन एक ओर भारत से दोस्ती का हाथ बढाता है, तो दूसरी ओर उसके सैनिक सीमा पर लगाताार घुसपैठ करते रहते हैं। भारत और चीन मे बीच लगभग चार हजार किलोमीटर लंबी सीमा को लेकर दशकों से विवाद चल रहा है। आजादी से पहले फिरंगी शासन और तिब्बत के बीच 1914 का शिमला कन्वेंशन करार सीमाओं का निर्धारण करता था मगर तिब्बत हथियाने के बाद चीन ने इस करार को खारिज कर दिया। इसी वजह आज तक दोनों देशों में सीमाओं का निर्धारण नहीं हो पाया है। जिसके कब्जे में जितना क्षेत्र है, वही सीमा का निर्धारण कर रहा है। 1962 में भारत पर अचानक हमला करके चीन ने भारत का काफी बडा क्षेत्र हथिया लिया था। चीन ने हाल ही में भारत को चौतरफा घेर लिया है। पाकिस्तान से दोस्ती करके चीन भारत के सबसे बडे दुश्मन को अपने साथ मिला लिया है। नेपाल से भी चीन की निकटता बढ रही है। पूरी दुनिया में भारत के अलावा नेपाल एकमात्र हिदू आबादी बहुल देश है मगर पिछले कुछ समय से यह भी भारत से दूर होता जा रहा है। म्यांमार का सैन्य शासन भारत की अपेक्षा चीन के अधिक निकट है। पडोसियों से मिल-जुलकर रहना हर देश की सामरिक जरुरत होती है। पाकिस्तान, चीन और नेपाल से मधुर संबंध रखना भारत की सामरिक विवशता है। खुदा-ना-खास्ता अगर चीन और पाकिस्तान मिलकर हमला करते हैं , तो भारत इन दोनों का मुकाबला नहीं कर सकता। वैसे भी अगला युद्ध परमाणु अस्त्र-शस्त्रों से लडा जाएगा और इस मामले में अकेला चीन ही भारत पर काफी भारी पडता है। पाकिस्तान भी परमाणु हथियार में भारत से कम नहीं है। हाल ही में भारतीय वायु सेना ने यह सच्चाई कबूली है कि भारत, चीन और पाकिस्तान का मिलकर मुकाबला नहीं कर सकता। यह स्थिति भारत के लिए बेहद चिंता जनक है। अमेरिका पर ज्यादा भरोसा नहीं किया जा सकता। अमेरिका की “बनिया“ फितरत उसे व्यापारिक हितों की खातिर किसी ओर भी ले जा सकती है। भारत के लिए राहत की बात यह है कि रुस आज भी उसका भरोसामंद मित्र है। सोवियत संघ के बिखराव के बाद से भले ही रुस चीन के मुकाबले कमजोर पडता है, तथापि, भारत और रुस मिलकर किसी भी सैन्य गठजोड का मुकाबला कर सकते हैं ।
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